भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 545

पूर्वं ह्यपि सखा मेऽसि सम्बन्धी च जनाधिप । अत ऊर्ध्वं तु भूयस्त्वं प्रीतिमाहर्तुमर्हसि ॥ १५ ॥ जनेश्वर! आप पहले भी मेरे सखा और सम्बन्धी थे और इसके बाद भी आपको मुझपर अधिक-से-अधिक प्रेम रखना चाहिये ॥ १५ ॥

सर्वकामैः सुविहितैः सुखमस्म्युषितस्त्वयि । न तथा स्वगृहे राजन् यथा तव गृहे सदा ॥ १६ ॥ राजन्! मेरी समस्त कामनाएँ वहाँ अच्छी तरह पूर्ण की गयीं और इसके कारण मैं सदा आपके यहाँ सुखी रहा। महाराज! आपके भवनमें मुझे जैसा आराम मिला, वैसा अपने घरमें भी नहीं मिला ॥ १६ ॥

इदं चैव हयज्ञानं त्वदीयं मयि तिष्ठति । तदुपाकर्तुमिच्छामि मन्यसे यदि पार्थिव । एवमुक्त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णाय नैषधः ॥ १७ ॥ आपका अश्वविज्ञान मेरे पास धरोहरके रूपमें पड़ा है। राजन्! यदि आप ठीक समझें तो मैं उसे आपको देनेकी इच्छा रखता हूँ। ऐसा कहकर निषधराज नलने ऋतुपर्णको अश्वविद्या प्रदान की ॥ १७ ॥

स च तां प्रतिजग्राह विधिदृष्टेन कर्मणा । गृहीत्वा चाश्वहृदयं राजन् भाङ्गासुरिर्नृपः ॥ १८ ॥