महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 548, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें'जूएके दाँवमें दूसरेका राज्य या धन जीतकर रख लिया जाय तो उसे यदि वह पुनः खेलना चाहे तो प्रतिपण (बदलेका दाव) देना चाहिये, यह परम धर्म कहा गया है ॥ ७ ॥ न चेद् वाञ्छसि त्वं द्यूतं युद्धद्यूतं प्रवर्त्तताम् । द्वैरथेनास्तु वै शान्तिस्तव वा मम वा नृप ॥ ८ ॥ 'यदि तुम पासोंसे जूआ खेलना न चाहो तो बाणोंद्वारा युद्धका जूआ प्रारम्भ होना चाहिये। राजन्! द्वैरथयुद्धके द्वारा तुम्हारी अथवा मेरी शान्ति हो जाय ॥ ८ ॥ वंशभोज्यमिदं राज्यमर्थितव्यं यथा तथा । येन केनाप्युपायेन वृद्धानामिति शासनम् ॥ ९ ॥ 'यह राज्य हमारी वंशपरम्पराके उपभोगमें आनेवाला है। जिस-किसी उपायसे भी जैसे-तैसे इसका उद्धार करना चाहिये; ऐसा वृद्ध पुरुषोंका उपदेश है ॥ ९ ॥ द्वयोरेकतरे बुद्धिः क्रियतामद्य पुष्कर । कैतवेनाक्षवत्यां तु युद्धे वा ना ताम्यतां धनुः ॥ १० ॥ 'पुष्कर! आज तुम दोमेंसे एकमें मन लगाओ। छलपूर्वक जूआ खेलो अथवा युद्धके लिये धनुषपर प्रत्यञ्चा चढ़ाओ' ॥ १० ॥ नैषधेनैवमुक्तस्तु पुष्करः प्रहसन्निव । ध्रुवमात्मजयं मत्वा प्रत्याह पृथिवीपतिम् ॥ ११ ॥ निषधराज नलके ऐसा कहनेपर पुष्करने अपनी विजयको अवश्यम्भावी मानकर हँसते हुए उनसे कहा— ॥ ११ ॥ दिष्ट्या त्वयार्जितं वित्तं प्रतिपाणाय नैषध । दिष्ट्या च दुष्कृतं कर्म दमयन्त्याः क्षयं गतम् ॥ १२ ॥ 'नैषध! सौभाग्यकी बात है कि तुमने दाँवपर लगानेके लिये धनका उपार्जन कर लिया है। यह भी आनन्दकी बात है कि दमयन्तीके दुष्कर्मोंका क्षय हो गया ॥ १२ ॥ दिष्ट्या च ध्रियसे राजन् सदारोऽद्य महाभुज । धनेनानेन वै भैमी जितेन समलंकृता ॥ १३ ॥ मामुपस्थास्यति व्यक्तं दिवि शक्रमिवाप्सराः । नित्यशो हि स्मरामि त्वां प्रतीक्षेऽपि च नैषध ॥ १४ ॥ 'महाबाहु नरेश! सौभाग्यसे तुम पत्नीसहित अभी जीवित हो। इसी धनको जीत लेनेपर दमयन्ती शृंगार करके निश्चय ही मेरी सेवामें उपस्थित होगी, ठीक उसी तरह, जैसे स्वर्गलोककी अप्सरा देवराज इन्द्रकी सेवामें जाती है। नैषध! मैं प्रतिदिन तुम्हारी याद करता हूँ और तुम्हारी राह भी देखा करता हूँ ॥ १३-१४ ॥ देवनेन मम प्रीतिर्न भवत्यसुहृद्रणैः । जित्वा त्वद्य वरारोहां दमयन्तीमनिन्दिताम् ॥ १५ ॥ कृतकृत्यो भविष्यामि सा हि मे नित्यशो हृदि ।