महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 549, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ें‘शत्रुओंके साथ जूआ खेलनेसे मुझे कभी तृप्ति ही नहीं होती। आज श्रेष्ठ अंगोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी दमयन्तीको जीतकर मैं कृतार्थ हो जाऊँगा; क्योंकि वह सदा मेरे हृदयमन्दिरमें निवास करती है’ ।। १५½ ।।
श्रुत्वा तु तस्य वा वाचो बह्वबद्धप्रलापिनः ॥ १६ ॥
इयेष स शिरश्छेत्तुं खड्गेन कुपितो नलः ।
स्मयंस्तु रोषताम्राक्षस्तमुवाच नलो नृपः ॥ १७ ॥
इस प्रकार बहुत-से असम्बद्ध प्रलाप करनेवाले पुष्करकी ये बातें सुनकर राजा नलको बड़ा क्रोध हुआ। उन्होंने तलवारसे उसका सिर काट लेनेकी इच्छा की। रोषसे उनकी आँखें लाल हो गयीं तो भी राजा नलने हँसते हुए उससे कहा— ॥ १६-१७ ॥
पणावः किं व्याहरसे जितो न व्याहरिष्यसि ।
ततः प्रावर्तत द्यूतं पुष्करस्य नलस्य च ॥ १८ ॥
एकपाणेन वीरेण नलेन स पराजितः ।
स रत्नकोशनिच्यैः प्राणेन पणितोऽपि च ॥ १९ ॥
‘अब हम दोनों जूआ प्रारम्भ करें, तुम अभी व्यर्थ बकवाद क्यों करते हो? हार जानेपर ऐसी बातें न कर सकोगे।’ तदनन्तर पुष्कर तथा राजा नलमें एक ही दाँव लगानेकी शर्त रखकर जूएका खेल प्रारम्भ हुआ। तब वीर नलने पुष्करको हरा दिया। पुष्करने रत्न, खजाना तथा प्राणोंतककी बाजी लगा दी थी ॥ १८-१९ ॥
जित्वा च पुष्करं राजा प्रहसन्निदमब्रवीत् ।
मम सर्वमिदं राज्यमव्यग्रं हतकण्टकम् ॥ २० ॥
वैदर्भी न त्वया शक्या राजापसद वीक्षितुम् ।
तस्यास्त्वं सपरीवारो मूढ दासत्वमागतः ॥ २१ ॥
पुष्करको परास्त करके राजा नलने हँसते हुए उससे कहा—‘नृपाधम! अब यह शान्त और अकण्टक सारा राज्य मेरे अधिकारमें आ गया। विदर्भकुमारी दमयन्तीकी ओर तू आँख उठाकर देख भी नहीं सकता। मूर्ख! आजसे तू परिवारसहित दमयन्तीका दास हो गया ॥ २०-२१ ॥
न त्वया तत् कृतं कर्म येनाहं विजितः पुरा ।
कलिना तत् कृतं कर्म त्वं च मूढ न बुध्यसे ॥ २२ ॥
‘पहले तेरे द्वारा जो मैं पराजित हो गया था, उसमें तेरा कोई पुरुषार्थ नहीं था। मूढ़! वह सब कलियुगकी करतूत थी, जिसे तू नहीं जानता है ॥ २२ ॥
नाहं परकृतं दोषं त्वय्याधास्ये कथंचन ।
यथासुखं वै जीव त्वं प्राणानवसृजामि ते ॥ २३ ॥
‘दूसरे (कलियुग)-के किये हुए अपराधको मैं किसी तरह तेरे मत्थे नहीं मढूँगा। तू सुखपूर्वक जीवित रह। मैं तेरे प्राण तुझे वापस देता हूँ ॥ २३ ॥