महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 550, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतथैव सर्वसम्भारं स्वमंशं वितरामि ते । तथैव च मम प्रीतिस्त्वयि वीर न संशयः ॥ २४ ॥ ‘तेरा सारा सामान और तेरे हिस्सेका धन भी तुझे लौटाये देता हूँ। वीर! तेरे ऊपर मेरा पूर्ववत् प्रेम बना रहेगा, इसमें संशय नहीं है ॥ २४ ॥ सौहार्दं चापि मे त्वत्तो न कदाचित् प्रहास्यति । पुष्कर त्वं हि मे भ्राता संजीव शरदः शतम् ॥ २५ ॥ ‘तेरे प्रति जो मेरा सौहार्द रहा है, वह कभी मेरे हृदयसे दूर नहीं होगा। पुष्कर! तू मेरा भाई है, जा, सौ वर्षोंतक जीवित रह’ ॥ २५ ॥ एवं नलः सान्त्वयित्वा भ्रातरं सत्यविक्रमः । स्वपुरं प्रेषयामास परिष्वज्य पुनः पुनः ॥ २६ ॥ इस प्रकार सत्यपराक्रमी राजा नलने अपने भाई पुष्करको सान्त्वना दे बार-बार हृदयसे लगाकर उसकी राजधानीको भेज दिया ॥ २६ ॥ सान्त्वितो नैषधेनैवं पुष्करः प्रत्युवाच तम् । पुण्यश्लोकं तदा राजन्नभिवाद्य कृताञ्जलिः ॥ २७ ॥ कीर्तिरस्तु तवाक्षय्या जीव वर्षशतं सुखी । यो मे वितरसि प्राणानधिष्ठानं च पार्थिव ॥ २८ ॥ राजन्! निषधराजके इस प्रकार सान्त्वना देनेपर पुष्करने पुण्यश्लोक नलको हाथ जोड़कर प्रणाम किया और इस प्रकार कहा—‘पृथ्वीनाथ! आप जो मुझे प्राण और निवासस्थान भी वापस दे रहे हैं, इससे आपकी अक्षय कीर्ति बनी रहे। आप सौ वर्षोंतक जीयें और सुखी रहें’ ॥ २७-२८ ॥