भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 551

स तथा सत्कृतो राज्ञा मासमुष्य तदा नृप । प्रययौ पुष्करो हृष्टःस्वपुरं स्वजनावृतः ॥ २९ ॥ महत्या सेनया सार्धं विनीतैः परिचारकैः । भ्राजमान इवादित्यो वपुषा पुरुषर्षभ ॥ ३० ॥ नरश्रेष्ठ युधिष्ठिर! राजा नलके द्वारा इस प्रकार सत्कार पाकर पुष्कर एक मासतक वहाँ टिका रहा और फिर आत्मीय जनोंके साथ प्रसन्नतापूर्वक अपनी राजधानीको चला गया। उसके साथ विशाल सेना और विनयशील सेवक भी थे। वह शरीरसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित हो रहा था ॥ २९-३० ॥

प्रस्थाप्य पुष्करं राजा वित्तवन्तमनामयम् । प्रविवेश पुरं श्रीमानत्यर्थमुपशोभिताम् ॥ ३१ ॥ पुष्करको धन—वित्तके साथ सकुशल घर भेजकर श्रीमान् राजा नलने अपने अत्यन्त शोभासम्पन्न नगरमें प्रवेश किया ॥ ३१ ॥

प्रविश्य सान्त्वयामास पौरांश्च निषधाधिपः । पौरा जानपदाश्चापि सम्प्रहृष्टतनूरुहाः ॥ ३२ ॥