महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंपरंतु भूपाल! दरिद्र मनुष्य उन यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं कर सकते; क्योंकि उनमें बहुत-सी सामग्रियोंकी आवश्यकता होती है। नाना प्रकारके साधनोंका संग्रह होनेसे उनमें विस्तार बहुत बढ़ जाता है॥ १४॥ प्राप्यन्ते पार्थिवैरेते समृद्धैर्वा नरैः क्वचित्। नार्थन्यूनैर्नावगणैरेकात्मभिरसाधनैः॥ १५॥ अतः राजालोग अथवा कहीं-कहीं कुछ समृद्धिशाली मनुष्य ही यज्ञोंका अनुष्ठान कर सकते हैं। जिनके पास धनकी कमी और सहायकोंका अभाव है, जो अकेले और साधनशून्य हैं, उनके द्वारा यज्ञोंका अनुष्ठान नहीं हो सकता॥ १५॥ यो दरिद्रैरपि विधिः शक्यः प्राप्तुं नरेश्वर। तुल्यो यज्ञफलैः पुण्यैस्तं निबोध युधां वर॥ १६॥ योद्धाओंमें श्रेष्ठ नरेश्वर! जो सत्कर्म दरिद्रलोग भी कर सकें और जो अपने पुण्योंद्वारा यज्ञोंके समान फलप्रद हो सके, उसे बताता हूँ, सुनो॥ १६॥ ऋषीणां परमं गुह्यमिदं भरतसत्तम। तीर्थाभिगमनं पुण्यं यज्ञैरपि विशिष्यते॥ १७॥ भरतश्रेष्ठ! यह ऋषियोंका परम गोपनीय रहस्य है। तीर्थयात्रा बड़ा पवित्र सत्कर्म है। वह यज्ञोंसे भी बढ़कर है॥ १७॥ अनुपोष्य त्रिरात्राणि तीर्थान्यनभिगम्य च। अदत्त्वा काञ्चनं गाश्च दरिद्रो नाम जायते॥ १८॥ मनुष्य इसलिये दरिद्र होता है कि वह (तीर्थोंमें) तीन राततक उपवास नहीं करता, तीर्थोंकी यात्रा नहीं करता और सुवर्णदान और गोदान नहीं करता॥ १८॥ अग्निष्टोमादिभिर्यज्ञैरिष्ट्वा विपुलदक्षिणैः। न तत् फलमवाप्नोति तीर्थाभिगमनेन यत्॥ १९॥ मनुष्य तीर्थयात्रासे जिस फलको पाता है, उसे प्रचुर दक्षिणावाले अग्निष्टोम आदि यज्ञोंद्वारा यजन करके भी नहीं पा सकता॥ १९॥ नृलोके देवदेवस्य तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम्। पुष्करं नाम विख्यातं महाभागः समाविशेत्॥ २०॥ मनुष्यलोकमें देवाधिदेव ब्रह्माजीका त्रिलोक-विख्यात तीर्थ है, जो 'पुष्कर' नामसे प्रसिद्ध है। उसमें कोई बड़भागी मनुष्य ही प्रवेश कर पाता है॥ २०॥ दशकोटिसहस्राणि तीर्थानां वै महामते। सांनिध्यं पुष्करे येषां त्रिसंध्यं कुरुनन्दन॥ २१॥ महामते कुरुनन्दन! पुष्करमें तीनों समय दस सहस्र कोटि (दस अरब) तीर्थोंका निवास रहता है॥ आदित्या वसवो रुद्राः साध्याश्च समरुद्गणाः।