महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंगन्धर्वाप्सरसश्चैव नित्यं संनिहिता विभो ॥ २२ ॥ विभो! वहाँ आदित्य, वसु, रुद्र, साध्य, मरुद्गण, गन्धर्व और अप्सराओंकी भी नित्य संनिधि रहती है ॥
यत्र देवास्तपस्तप्त्वा दैत्या ब्रह्मर्षयस्तथा । दिव्ययोगा महाराज पुण्येन महतान्विताः ॥ २३ ॥ महाराज! वहाँ तप करके देवता, दैत्य और ब्रह्मर्षि महान् पुण्यसे सम्पन्न दिव्य योगसे युक्त होते हैं ॥ २३ ॥
मनसाप्यभिकामस्य पुष्कराणि मनस्विनः । पूयन्ते सर्वपापानि नाकपृष्ठे च पूज्यते ॥ २४ ॥ जो मनस्वी पुरुष मनसे भी पुष्कर तीर्थमें जानेकी इच्छा करता है, उसके स्वर्गके प्रतिबन्धक सारे पाप मिट जाते हैं और वह स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥
तस्मिंस्तीर्थे महाराज नित्यमेव पितामहः । उवास परमप्रीतो भगवान् कमलासनः ॥ २५ ॥ महाराज! उस तीर्थमें कमलासन भगवान् ब्रह्माजी नित्य ही बड़ी प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं ॥ २५ ॥
पुष्करेषु महाभाग देवाः सर्षिगणाः पुरा ।