महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसिद्धिं समभिसम्प्राप्ताः पुण्येन महतान्विताः ॥ २६ ॥ महाभाग! पुष्करमें पहले देवता तथा ऋषि महान् पुण्यसे सम्पन्न हो सिद्धि प्राप्त कर चुके हैं ॥ २६ ॥
तत्राभिषेकं यः कुर्यात् पितृदेवार्चने रतः । अश्वमेधाद् दशगुणं फलं प्राहुर्मनीषिणः ॥ २७ ॥ जो वहाँ स्नान करता तथा देवताओं और पितरोंकी पूजामें संलग्न रहता है, उस पुरुषको अश्वमेधसे दस गुना फल प्राप्त होता है; ऐसा मनीषीगण कहते हैं ॥ २७ ॥
अप्येकं भोजयेद् विप्रं पुष्करारण्यमाश्रितः । तेनासौ कर्मणा भीष्म प्रेत्य चेह च मोदते ॥ २८ ॥ भीष्म! पुष्करमें जाकर कम-से-कम एक ब्राह्मणको अवश्य भोजन कराये। उस पुण्यकर्मसे मनुष्य इहलोक और परलोकमें भी आनन्दका भागी होता है ॥ २८ ॥
शाकैर्मूलैः फलैर्वापि येन वर्तयते स्वयं । तद् वै दद्याद् ब्राह्मणाय श्रद्धावाननसूयकः ॥ २९ ॥ मनुष्य साग, फल तथा मूल जिसके द्वारा स्वयं प्राणयात्राका निर्वाह करता है, वही श्रद्धाभावसे दूसरोंके दोष न देखते हुए ब्राह्मणको दान करे ॥ २९ ॥
तेनैव प्राप्नुयात् प्राज्ञो हयमेधफलं नरः । ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्रा वा राजसत्तम ॥ ३० ॥ न वै योनौ प्रजायते स्नातास्तीर्थे महात्मनः । उसीसे विद्वान् पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता है। नृपश्रेष्ठ! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य अथवा शूद्र जो कोई भी महात्मा ब्रह्माजीके तीर्थमें स्नान कर लेते हैं, वे फिर किसी योनिमें जन्म नहीं लेते हैं ॥ ३० १/२ ॥
कार्तिकीं तु विशेषेण योऽभिगच्छति पुष्करम् ॥ ३१ ॥ प्राप्नुयात् स नरो लोकान् ब्रह्मणः सदनेऽक्षयान् । विशेषतः कार्तिकमासकी पूर्णिमाको जो पुष्करतीर्थमें स्नानके लिये जाता है, वह मनुष्य ब्रह्मधाममें अक्षय लोकोंको प्राप्त होता है ॥ ३१ १/२ ॥
सायं प्रातः स्मरेद् यस्तु पुष्कराणि कृताञ्जलिः ॥ ३२ ॥ उपस्पृष्टं भवेत् तेन सर्वतीर्थेषु भारत । भारत! जो सायंकाल और प्रातःकाल हाथ जोड़कर तीनों पुष्करोंका स्मरण करता है, उसने मानो सब तीर्थोंमें स्नान एवं आचमन कर लिया ॥ ३२ १/२ ॥
जन्मप्रभृति यत् पापं स्त्रिया वा पुरुषेण वा ॥ ३३ ॥ पुष्करे स्नातमात्रस्य सर्वमेव प्रणश्यति । स्त्री अथवा पुरुषने जन्मसे लेकर वर्तमान अवस्थातक जितने भी पाप किये हैं, पुष्करतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे वे सब पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ३३ १/२ ॥