भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 572

यथा सुराणां सर्वेषामादिस्तु मधुसूदनः ॥ ३४ ॥ तथैव पुष्करं राजंस्तीर्थानामादिरुच्यते । राजन्! जैसे भगवान् मधुसूदन (विष्णु) सब देवताओंके आदि हैं, वैसे ही पुष्कर सब तीर्थोंका आदि कहा जाता है ॥ ३४ १/२ ॥ उषित्वा द्वादश वर्षाणि पुष्करे नियतः शुचिः ॥ ३५ ॥ क्रतून् सर्वानवाप्नोति ब्रह्मलोकं स गच्छति । पुष्करमें पवित्रतापूर्वक संयम-नियमके साथ बारह वर्षोंतक निवास करके मानव सम्पूर्ण यज्ञोंका फल पाता और ब्रह्मलोकको जाता है ॥ ३५ १/२ ॥ यस्तु वर्षशतं पूर्णमग्निहोत्रमुपासते ॥ ३६ ॥ कार्तिकीं वा वसेदेकां पुष्करे सममेव तत् ॥ ३७ ॥ जो पूरे सौ वर्षोंतक अग्निहोत्र करता है और जो कार्तिककी एक ही पूर्णिमाको पुष्करमें वास करता है, दोनोंका फल बराबर है ॥ ३६-३७ ॥ त्रीणि शृङ्गाणि शुभ्राणि त्रीणि प्रस्रवणानि च । पुष्कराण्यादिसिद्धानि न विद्मस्तत्र कारणम् ॥ ३८ ॥ तीन शुभ्र पर्वतशिखर, तीन सोते और तीन पुष्कर—ये आदिसिद्ध तीर्थ हैं। ये कब किस कारणसे तीर्थ माने गये? इसका हमें पता नहीं है ॥ ३८ ॥ दुष्करं पुष्करे गन्तुं दुष्करं पुष्करे तपः । दुष्करं पुष्करे दानं वस्तुं चैव सुदुष्करम् ॥ ३९ ॥ पुष्करमें जाना अत्यन्त दुर्लभ है, पुष्करमें तप अत्यन्त दुर्लभ है, पुष्करमें दान देनेका सुयोग तो और भी दुर्लभ है और उसमें निवासका सौभाग्य तो अत्यन्त ही दुष्कर है ॥ ३९ ॥ उष्य द्वादशरात्रं तु नियतो नियताशनः । प्रदक्षिणमुपावृत्य जम्बूमार्गं समाविशेत् ॥ ४० ॥ वहाँ इन्द्रियसंयम और नियमित आहार करते हुए बारह रात रहकर तीर्थकी परिक्रमा करनेके पश्चात् जम्बूमार्गको जाय ॥ ४० ॥ जम्बूमार्गं समाविश्य देवर्षिपितृसेवितम् । अश्वमेधमवाप्नोति सर्वकामसमन्वितः ॥ ४१ ॥ जम्बूमार्ग देवताओं, ऋषियों तथा पितरोंसे सेवित तीर्थ है। उसमें जाकर मनुष्य समस्त मनोवांछित भोगोंसे सम्पन्न हो अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ४१ ॥ तत्रोष्य रजनीः पञ्च पूतात्मा जायते नरः । न दुर्गतिमवाप्नोति सिद्धिं प्राप्नोति चोत्तमाम् ॥ ४२ ॥ वहाँ पाँच रात निवास करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण पवित्र हो जाता है। उसे कभी दुर्गति नहीं प्राप्त होती, वह उत्तम सिद्धि पा लेता है ॥ ४२ ॥