महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 573, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंजम्बूमार्गादुपावृत्य गच्छेत् तन्दुलिकाश्रमम् । न दुर्गतिमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ ४३ ॥ जम्बूमार्गसे लौटकर मनुष्य तन्दुलिकाश्रमको जाय। इससे वह दुर्गतिमें नहीं पड़ता और अन्तमें ब्रह्मलोकको चला जाता है ॥ ४३ ॥ आगस्त्यं सर आसाद्य पितृदेवार्चने रतः । त्रिरात्रोपोषितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ४४ ॥ राजन्! जो अगस्त्यसरोवर जाकर देवताओं और पितरोंके पूजनमें तत्पर हो तीन रात उपवास करता है, वह अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ ४४ ॥ शाकवृत्तिः फलैर्वापि कौमारं विन्दते परम् । कण्वाश्रमं ततो गच्छेच्छ्रीजुष्टं लोकपूजितम् ॥ ४५ ॥ जो शाकाहार या फलाहार करके वहाँ रहता है, वह परम उत्तम कुमारलोक (कार्तिकेयके लोक)-में जाता है। वहाँसे लोकपूजित कण्वके आश्रममें जाय, जो भगवती लक्ष्मीके द्वारा सेवित है ॥ ४५ ॥ धर्मारण्यं हि तत् पुण्यमाद्यं च भरतर्षभ । यत्र प्रविष्टमात्रो वै सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ४६ ॥ भरतश्रेष्ठ! वह धर्मारण्य कहलाता है, उसे परम पवित्र एवं आदितीर्थ माना गया है। उसमें प्रवेश करनेमात्रसे मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ अर्चयित्वा पितॄन् देवान् नियतो नियताशनः । सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य फलमश्नुते ॥ ४७ ॥ जो वहाँ नियमपूर्वक मिताहारी होकर देवता और पितरोंकी पूजा करता है, वह सम्पूर्ण कामनाओंसे सम्पन्न यज्ञका फल पाता है ॥ ४७ ॥ प्रदक्षिणं ततः कृत्वा ययातिपतनं व्रजेत् । हयमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति तत्र वै ॥ ४८ ॥ तदनन्तर उस तीर्थकी परिक्रमा करके वहाँसे ययातिपतन नामक तीर्थमें जाय। वहाँ जानेसे यात्रीको अवश्य ही अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ॥ ४८ ॥ महाकालं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः । कोटितीर्थमुपस्पृश्य हयमेधफलं लभेत् ॥ ४९ ॥ वहाँसे महाकालतीर्थको जाय। वहाँ नियम-पूर्वक रहकर नियमित भोजन करे। वहाँ कोटितीर्थमें आचमन (एवं स्नान) करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ४९ ॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञः स्थाणोस्तीर्थमुमापतेः । नाम्ना भद्रवटं नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ ५० ॥ वहाँसे धर्मज्ञ पुरुष उमावल्लभ भगवान् स्थाणु (शिव)-के उस तीर्थमें जाय, जो तीनों लोकोंमें 'भद्रवट' के नामसे प्रसिद्ध है ॥ ५० ॥