भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 574

तत्राभिगम्य चेशानं गोसहस्रफलं लभेत् । महादेवप्रसादाच्च गाणपत्यं च विन्दति ॥ ५१ ॥ समृद्धमसपत्नं च श्रिया युक्तं नरोत्तमः । वहाँ भगवान् शिवका निकटसे दर्शन करके नरश्रेष्ठ यात्री एक हजार गोदानका फल पाता है और महादेवजीके प्रसादसे वह गणोंका आधिपत्य प्राप्त कर लेता है, जो आधिपत्य भारी समृद्धि और लक्ष्मीसे सम्पन्न तथा शत्रुजनित बाधासे रहित होता है ॥ ५१ ½ ॥ नर्मदां तु समासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् ॥ ५२ ॥ तर्पयित्वा पितॄन् देवानग्निष्टोमफलं लभेत् । वहाँसे त्रिभुवनविख्यात नर्मदा नदीके तटपर जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ५२ ½ ॥ दक्षिणं सिन्धुमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ॥ ५३ ॥ अग्निष्टोममवाप्नोति विमानं चाधिरोहति । इन्द्रियोंको काबूमें रखकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए दक्षिण समुद्रकी यात्रा करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम-यज्ञका फल और विमानपर बैठनेका सौभाग्य पाता है ॥ ५३ ½ ॥ चर्मण्वतीं समासाद्य नियतो नियताशनः । रन्तिदेवाभ्यनुज्ञातमग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ५४ ॥ इन्द्रियसंयम या शौच-संतोष आदिके पालनपूर्वक नियमित आहारका सेवन करते हुए चर्मण्वती (चंबल) नदीमें स्नान आदि करनेसे राजा रन्तिदेवद्वारा अनुमोदित अग्निष्टोम-यज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ५४ ॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ हिमवत्सुतमर्बुदम् । पृथिव्यां यत्र वै छिद्रं पूर्वमासीद् युधिष्ठिर ॥ ५५ ॥ धर्मज्ञ युधिष्ठिर*! वहाँसे आगे हिमालयपुत्र अर्बुद (आबू)-की यात्रा करे, जहाँ पहले पृथ्वीमें विवर था ॥ ५५ ॥ तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः । तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५६ ॥ वहाँ महर्षि वसिष्ठका त्रिलोकविख्यात आश्रम है, जिसमें एक रात रहनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ५६ ॥ पिङ्गतीर्थमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । कपिलानां नरश्रेष्ठ शतस्य फलमश्नुते ॥ ५७ ॥ नरश्रेष्ठ! पिंगतीर्थमें स्नान एवं आचमन करके ब्रह्मचारी एवं जितेन्द्रिय मनुष्य सौ कपिलाओंके-दानका फल प्राप्त कर लेता है ॥ ५७ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र प्रभासं तीर्थमुत्तमम् ।