भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 578

तदनन्तर शौच-संतोष आदि नियमोंका पालन और नियमित भोजन करते हुए पंचनदतीर्थमें जाकर मनुष्य पंचमहायज्ञोंका फल पाता है जो कि शास्त्रोंमें क्रमशः बतलाये गये हैं॥ ८३॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र भीमायाः स्थानमुत्तमम्।
तत्र स्नात्वा तु योन्यां वै नरो भरतसत्तम॥ ८४॥
देव्याः पुत्रो भवेद् राजंस्तप्तकुण्डलविग्रहः।
गवां शतसहस्रस्य फलं प्राप्नोति मानवः॥ ८५॥
राजेन्द्र! वहाँसे भीमाके उत्तम स्थानकी यात्रा करे! भरतश्रेष्ठ! वहाँ योनितीर्थमें स्नान करके मनुष्य देवीका पुत्र होता है। उसकी अंगकान्ति तपाये हुए सुवर्णकुण्डलके समान होती है। राजन्! उस तीर्थके सेवनसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है॥ ८४-८५॥
श्रीकुण्डं तु समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्।
पितामहं नमस्कृत्य गोसहस्रफलं लभेत्॥ ८६॥
त्रिभुवनविख्यात श्रीकुण्डमें जाकर ब्रह्माजीको नमस्कार करनेसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ विमलं तीर्थमुत्तमम्।
अद्यापि यत्र दृश्यन्ते मत्स्याः सौवर्णराजताः॥ ८७॥
धर्मज्ञ! वहाँसे परम उत्तम विमलतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ आज भी सोने और चाँदीके रंगकी मछलियाँ दिखायी देती हैं॥ ८७॥
तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं वासवं लोकमाप्नुयात्।
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम्॥ ८८॥
उसमें स्नान करनेसे मनुष्य शीघ्र ही इन्द्रलोकको प्राप्त होता है और सब पापोंसे शुद्ध हो परमगति प्राप्त कर लेता है॥ ८८॥
वितस्तां च समासाद्य संतर्प्य पितृदेवताः।
नरः फलमवाप्नोति वाजपेयस्य भारत॥ ८९॥
भारत! वितस्तातीर्थ (झेलम)-में जाकर वहाँ देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्यको वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है॥ ८९॥
काश्मीरेष्वेव नागस्य भवनं तक्षकस्य च।
वितस्ताख्यमिति ख्यातं सर्वपापप्रमोचनम्॥ ९०॥
काश्मीरमें ही नागराज तक्षकका वितस्ता नामसे प्रसिद्ध भवन है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है॥ ९०॥
तत्र स्नात्वा नरो नूनं वाजपेयमवाप्नुयात्।
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेच्च परमां गतिम्॥ ९१॥