भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 579, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 579

वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य निश्चय ही वाजपेययज्ञका फल प्राप्त करता है और सब पापोंसे शुद्ध हो उत्तम गतिका भागी होता है ॥ ९१ ॥ ततो गच्छेत वडवां त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् । पश्चिमायां तु संध्यायामुपस्पृश्य यथाविधि ॥ ९२ ॥ चरुं सप्तार्चिषे राजन् यथाशक्ति निवेदयेत् । पितॄणामक्षयं दानं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ९३ ॥ वहाँसे त्रिभुवनविख्यात वडवातीर्थको जाय। वहाँ पश्चिम संध्याके समय विधिपूर्वक स्नान और आचमन करके अग्निदेवको यथाशक्ति चरु निवेदन करे। वहाँ पितरोंके लिये दिया हुआ दान अक्षय होता है; ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ ९२-९३ ॥ ऋषयः पितरो देवा गन्धर्वाप्सरसां गणाः । गुह्यकाः किन्नरा यक्षाः सिद्धा विद्याधरा नराः ॥ ९४ ॥ राक्षसा दितिजा रुद्रा ब्रह्मा च मनुजाधिप । नियतः परमां दीक्षामास्थायाब्दसहस्रिकीम् ॥ ९५ ॥ विष्णोः प्रसादनं कुर्वंश्चरुं च श्रपयंस्तथा । सप्तभिः सप्तभिश्चैव ऋग्भिस्तुष्टाव केशवम् ॥ ९६ ॥ राजन्! वहाँ देवता, ऋषि, पितर, गन्धर्व, अप्सरा, गुह्यक, किन्नर, यक्ष, सिद्ध, विद्याधर, मनुष्य, राक्षस, दैत्य, रुद्र और ब्रह्मा—इन सबने नियमपूर्वक सहस्र वर्षोंके लिये उत्तम दीक्षा ग्रहण करके भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये चरु अर्पण किया। ऋग्वेदके सात-सात मन्त्रोंद्वारा सबने चरुकी सात-सात आहुतियाँ दीं और भगवान् केशवको प्रसन्न किया ॥ ९४—९६ ॥ ददावष्टगुणैश्वर्यं तेषां तुष्टस्तु केशवः । यथाभिलषितानन्यान् कामान् दत्त्वा महीपते ॥ ९७ ॥ तत्रैवान्तर्दधे देवो विद्युदभ्रेषु वै यथा । नाम्ना सप्तचरुं तेन ख्यातं लोकेषु भारत ॥ ९८ ॥ गवां शतसहस्रेण राजसूयशतेन च । अश्वमेधसहस्रेण श्रेयान् सप्तार्चिषे चरुः ॥ ९९ ॥ ततो निवृत्तो राजेन्द्र रुद्रं पदमथाविशेत् । अर्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ॥ १०० ॥ उनपर प्रसन्न होकर भगवान्ने उन्हें अष्टगुण-ऐश्वर्य अर्थात् अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ प्रदान कीं। महाराज! तत्पश्चात् उनकी इच्छाके अनुसार अन्यान्य वर देकर भगवान् केशव वहाँसे उसी प्रकार अन्तर्धान हो गये, जैसे मेघोंकी घटामें बिजली तिरोहित हो जाती है। भारत! इसीलिये वह तीर्थ तीनों लोकोंमें सप्तचरुके नामसे विख्यात है। वहाँ अग्निके लिये दिया हुआ चरु एक लाख गोदान, सौ राजसूययज्ञ और सहस्र अश्वमेधयज्ञसे

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