महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंभी अधिक कल्याणकारी है। राजेन्द्र! वहाँसे लौटकर रुद्रपद नामक तीर्थमें जाय। वहाँ महादेवजीकी पूजा करके तीर्थयात्री पुरुष अश्वमेधका फल पाता है ॥ ९७—१०० ॥ मणिमन्तं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । एकरात्रोषितो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ १०१ ॥ राजन्! एकाग्रचित्त हो ब्रह्मचर्य-पालनपूर्वक मणिमान् तीर्थमें जाय और वहाँ एक रात निवास करे। इससे अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ १०१ ॥ अथ गच्छेत राजेन्द्र देविकां लोकविश्रुताम् । प्रसूतिर्यत्र विप्राणां श्रूयते भरतर्षभ ॥ १०२ ॥ भरतवंशशिरोमणे! राजेन्द्र! वहाँसे लोकविख्यात देविकातीर्थकी यात्रा करे, जहाँ ब्राह्मणोंकी उत्पत्ति सुनी जाती है ॥ १०२ ॥ त्रिशूलपाणेः स्थानं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । देविकायां नरः स्नात्वा समभ्यर्च्य महेश्वरम् ॥ १०३ ॥ यथाशक्ति चरुं तत्र निवेद्य भरतर्षभ । सर्वकामसमृद्धस्य यज्ञस्य लभते फलम् ॥ १०४ ॥ वहाँ त्रिशूलपाणि भगवान् शिवका स्थान है, जिसकी तीनों लोकोंमें प्रसिद्धि है। देविकामें स्नान करके भगवान् महेश्वरका पूजन और उन्हें यथाशक्ति चरु निवेदन करके सम्पूर्ण कामनाओंसे समृद्ध यज्ञके फलकी प्राप्ति होती है ॥ १०३-१०४ ॥ कामाख्यं तत्र रुद्रस्य तीर्थं देवनिषेवितम् । तत्र स्नात्वा नरः क्षिप्रं सिद्धिं प्राप्नोति भारत ॥ १०५ ॥ वहाँ भगवान् शंकरका देवसेवित कामतीर्थ है। भारत! उसमें स्नान करके मनुष्य शीघ्र मनोवाञ्छित सिद्धि प्राप्त कर लेता है ॥ १०५ ॥ यजनं याजनं चैव तथैव ब्रह्म बालुकाम् । पुष्पाम्भश्च उपस्पृश्य न शोचेन्मरणं गतः ॥ १०६ ॥ वहाँ यजन, याजन तथा वेदोंका स्वाध्याय करके अथवा वहाँकी बालू, पुष्प एवं जलका स्पर्श करके मृत्युको प्राप्त हुआ पुरुष शोकसे पार हो जाता है ॥ १०६ ॥ अर्धयोजनविस्तारा पञ्चयोजनमायता । एतावती वेदिका तु पुण्या देवर्षिसेविता ॥ १०७ ॥ वहाँ पाँच योजन लंबी और आधा योजन चौड़ी पवित्र वेदिका है, जिसका देवता तथा ऋषि-मुनि भी सेवन करते हैं ॥ १०७ ॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ दीर्घसत्रं यथाक्रमम् । तत्र ब्रह्मादयो देवाः सिद्धाश्च परमर्षयः ॥ १०८ ॥ धर्मज्ञ! वहाँसे क्रमशः 'दीर्घसत्र' नामक तीर्थमें जाय। वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, सिद्ध और महर्षि रहते हैं ॥