महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंकुरुनन्दन! वहाँसे कुमारकोटितीर्थमें जाकर वहाँ नियमपूर्वक स्नान करे और देवता तथा पितरोंके पूजनमें तत्पर रहे ॥ ११७ ॥
गवामयुतमाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् । ततो गच्छेत धर्मज्ञ रुद्रकोटिं समाहितः ॥ ११८ ॥ पुरा यत्र महाराज मुनिकोटीः समागता । हर्षेण महताविष्टा रुद्रदर्शनकाङ्क्षया ॥ ११९ ॥ अहं पूर्वमहं पूर्वं द्रक्ष्यामि वृषभध्वजम् । एवं सम्प्रस्थिता राजन्नृषयः किल भारत ॥ १२० ॥
ऐसा करनेसे मनुष्य दस हजार गोदानका फल पाता है और अपने कुलका उद्धार कर देता है। धर्मज्ञ! वहाँसे एकाग्रचित्त हो रुद्रकोटितीर्थमें जाय। महाराज! रुद्रकोटि वह स्थान है, जहाँ पूर्वकालमें एक करोड़ मुनि बड़े हर्षमें भरकर भगवान् रुद्रके दर्शनकी अभिलाषासे आये थे। भारत! 'भगवान् वृषभध्वजका दर्शन पहले मैं करूँगा, मैं करूँगा' ऐसा संकल्प करके वे महर्षि वहाँके लिये प्रस्थित हुए थे ॥ ११८–१२० ॥
ततो योगेश्वरेणापि योगमास्थाय भूपते । तेषां मन्युप्रणाशार्थमृषीणां भावितात्मनाम् ॥ १२१ ॥ सृष्टा कोटीति रुद्राणामृषीणामग्रतः स्थिता । मया पूर्वतरं दृष्ट इति ते मेनिरे पृथक् ॥ १२२ ॥ तेषां तुष्टो महादेवो मुनीनां भावितात्मनाम् । भक्त्या परमया राजन् वरं तेषां प्रदिष्टवान् ॥ १२३ ॥
राजन्! तब योगेश्वर भगवान् शिवने भी योगका आश्रय ले, उन शुद्धात्मा महर्षियोंके शोककी शान्तिके लिये करोड़ों शिवलिंगोंकी सृष्टि कर दी, जो उन सभी ऋषियोंके आगे उपस्थित थे; इससे उन सबने अलग-अलग भगवान्का दर्शन किया। राजन्! उन शुद्धचेता मुनियोंकी उत्तम भक्तिसे संतुष्ट हो महादेवजीने उन्हें वर दिया ॥ १२१–१२३ ॥
अद्य प्रभृति युष्माकं धर्मवृद्धिर्भविष्यति । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र रुद्रकोट्यां नरः शुचिः ॥ १२४ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।
महर्षियो! आजसे तुम्हारे धर्मकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहेगी। नरश्रेष्ठ! उस रुद्रकोटिमें स्नान करके शुद्ध हुआ मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ १२४½ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र संगमं लोकविश्रुतम् ॥ १२५ ॥ सरस्वत्या महापुण्यं केशवं समुपासते । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ १२६ ॥