महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
कुरुनन्दन! वहाँसे कुमारकोटितीर्थमें जाकर वहाँ नियमपूर्वक स्नान करे और देवता तथा पितरोंके पूजनमें तत्पर रहे ॥ ११७ ॥
गवामयुतमाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् । ततो गच्छेत धर्मज्ञ रुद्रकोटिं समाहितः ॥ ११८ ॥ पुरा यत्र महाराज मुनिकोटीः समागता । हर्षेण महताविष्टा रुद्रदर्शनकाङ्क्षया ॥ ११९ ॥ अहं पूर्वमहं पूर्वं द्रक्ष्यामि वृषभध्वजम् । एवं सम्प्रस्थिता राजन्नृषयः किल भारत ॥ १२० ॥
ऐसा करनेसे मनुष्य दस हजार गोदानका फल पाता है और अपने कुलका उद्धार कर देता है। धर्मज्ञ! वहाँसे एकाग्रचित्त हो रुद्रकोटितीर्थमें जाय। महाराज! रुद्रकोटि वह स्थान है, जहाँ पूर्वकालमें एक करोड़ मुनि बड़े हर्षमें भरकर भगवान् रुद्रके दर्शनकी अभिलाषासे आये थे। भारत! 'भगवान् वृषभध्वजका दर्शन पहले मैं करूँगा, मैं करूँगा' ऐसा संकल्प करके वे महर्षि वहाँके लिये प्रस्थित हुए थे ॥ ११८–१२० ॥
ततो योगेश्वरेणापि योगमास्थाय भूपते । तेषां मन्युप्रणाशार्थमृषीणां भावितात्मनाम् ॥ १२१ ॥ सृष्टा कोटीति रुद्राणामृषीणामग्रतः स्थिता । मया पूर्वतरं दृष्ट इति ते मेनिरे पृथक् ॥ १२२ ॥ तेषां तुष्टो महादेवो मुनीनां भावितात्मनाम् । भक्त्या परमया राजन् वरं तेषां प्रदिष्टवान् ॥ १२३ ॥
राजन्! तब योगेश्वर भगवान् शिवने भी योगका आश्रय ले, उन शुद्धात्मा महर्षियोंके शोककी शान्तिके लिये करोड़ों शिवलिंगोंकी सृष्टि कर दी, जो उन सभी ऋषियोंके आगे उपस्थित थे; इससे उन सबने अलग-अलग भगवान्का दर्शन किया। राजन्! उन शुद्धचेता मुनियोंकी उत्तम भक्तिसे संतुष्ट हो महादेवजीने उन्हें वर दिया ॥ १२१–१२३ ॥
अद्य प्रभृति युष्माकं धर्मवृद्धिर्भविष्यति । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र रुद्रकोट्यां नरः शुचिः ॥ १२४ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।
महर्षियो! आजसे तुम्हारे धर्मकी उत्तरोत्तर वृद्धि होती रहेगी। नरश्रेष्ठ! उस रुद्रकोटिमें स्नान करके शुद्ध हुआ मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ १२४½ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र संगमं लोकविश्रुतम् ॥ १२५ ॥ सरस्वत्या महापुण्यं केशवं समुपासते । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ १२६ ॥
राजेन्द्र! तदनन्तर परम पुण्यमय लोकविख्यात सरस्वतीसंगमतीर्थमें जाय, जहाँ ब्रह्मा आदि देवता और तपस्याके धनी महर्षि भगवान् केशवकी उपासना करते हैं ।।
अभिगच्छन्ति राजेन्द्र चैत्रशुक्लचतुर्दशीम् ।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विन्देद् बहुसुवर्णकम् ।
सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं च गच्छति ।। १२७ ।।
राजेन्द्र! वहाँ लोग चैत्र शुक्ल चतुर्दशीको विशेषरूपसे जाते हैं। पुरुषसिंह! वहाँ स्नान करनेसे प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है और सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर मनुष्य ब्रह्मलोकको जाता है ।। १२७ ।।
ऋषीणां यत्र सत्राणि समाप्तानि नराधिप ।
तत्रावसानमासाद्य गोसहस्रफलं लभेत् ।। १२८ ।।
नरेश्वर! जहाँ ऋषियोंके सत्र समाप्त हुए हैं, वहाँ अवसानतीर्थमें जाकर मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ।। १२८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां
द्व्यशीतितमोऽध्यायः ।। ८२ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें पुलस्त्यकथिततीर्थयात्राविषयक बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८२ ।।
* यद्यपि यहाँ पुलस्त्यजी भीष्मजीको यह प्रसंग सुना रहे हैं, तथापि इस संवादको नारदजीने युधिष्ठिरके समक्ष उपस्थित किया है; अतः नारदजी युधिष्ठिरको सम्बोधित करें, इसमें कोई अनुपपत्ति नहीं है।
कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन
त्र्यशीतितमोऽध्यायः
कुरुक्षेत्रकी सीमामें स्थित अनेक तीर्थोंकी महत्ताका वर्णन
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेत राजेन्द्र कुरुक्षेत्रमभिष्टुतम् ।
पापेभ्यो यत्र मुच्यन्ते दर्शनात् सर्वजन्तवः ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी कहते हैं—राजेन्द्र! तदनन्तर ऋषियोंद्वारा प्रशंसित कुरुक्षेत्रकी यात्रा करे, जिसके दर्शनमात्रसे सब जीव पापोंसे मुक्त हो जाते हैं ॥ १ ॥
कुरुक्षेत्रं गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् ।
य एवं सततं ब्रूयात् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ २ ॥
'मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा, कुरुक्षेत्रमें निवास करूँगा।' इस प्रकार जो सदा कहा करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २ ॥
पांसवोऽपि कुरुक्षेत्रे वायुना समुदीरिताः ।
अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् ॥ ३ ॥
वायुद्वारा उड़ाकर लायी हुई कुरुक्षेत्रकी धूल भी शरीरपर पड़ जाय, तो वह पापी मनुष्यको भी परमगतिकी प्राप्ति करा देती है ॥ ३ ॥
दक्षिणेन सरस्वत्या दृषद्वत्युत्तरेण च ।
ये वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे ॥ ४ ॥
जो सरस्वतीके दक्षिण और दृषद्वतीके उत्तर कुरुक्षेत्रमें वास करते हैं, वे मानो स्वर्गलोकमें ही रहते हैं ॥ ४ ॥
तत्र मासं वसेद् धीरः सरस्वत्यां युधिष्ठिर ।
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयः सिद्धचारणाः ॥ ५ ॥
गन्धर्वाप्सरसो यक्षाः पन्नगाश्च महीपते ।
ब्रह्मक्षेत्रं महापुण्यमभिगच्छन्ति भारत ॥ ६ ॥
(नारदजी कहते हैं—) युधिष्ठिर! वहाँ सरस्वतीके तटपर धीर पुरुष एक मासतक निवास करे; क्योंकि महाराज! ब्रह्मा आदि देवता, ऋषि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, अप्सरा, यक्ष और नाग भी उस परम पुण्यमय ब्रह्मक्षेत्रको जाते हैं ॥ ५-६ ॥
मनसाप्यभिकामस्य कुरुक्षेत्रं युधिष्ठिर ।
पापानि विप्रणश्यन्ति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ ७ ॥
युधिष्ठिर! जो मनसे भी कुरुक्षेत्रमें जानेकी इच्छा करता है, उसके सब पाप नष्ट हो जाते हैं और वह ब्रह्मलोकको जाता है ॥ ७ ॥
गत्वा हि श्रद्धया युक्तः कुरुक्षेत्रं कुरूद्वह ।
फलं प्राप्नोति च तदा राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ८ ॥
कुरुश्रेष्ठ! श्रद्धासे युक्त होकर कुरुक्षेत्रकी यात्रा करनेपर मनुष्य राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है ॥ ८ ॥
ततो मचक्रुकं नाम द्वारपालं महाबलम् ।
यक्षं समभिवाद्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९ ॥
तदनन्तर, वहाँ मचक्रुक नामवाले द्वारपाल महाबली यक्षको नमस्कार करनेमात्रसे सहस्र गोदानका फल मिल जाता है ॥ ९ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ।
सततं नाम राजेन्द्र यत्र संनिहितो हरिः ॥ १० ॥
धर्मज्ञ राजेन्द्र! तत्पश्चात् भगवान् विष्णुके परम उत्तम सतत नामक तीर्थस्थानमें जाय, जहाँ श्रीहरि सदा निवास करते हैं ॥ १० ॥
तत्र स्नात्वा च नत्वा च त्रिलोकप्रभवं हरिम् ।
अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥ ११ ॥
ततः पारिप्लवं गच्छेत् तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति भारत ॥ १२ ॥
वहाँ स्नान और त्रिलोकभावन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। इसके बाद त्रिभुवनविख्यात पारिप्लव नामक तीर्थमें जाय। भारत! वहाँ स्नान करनेसे अग्निष्टोम और अतिरात्रयज्ञोंका फल प्राप्त होता है ॥ ११-१२ ॥
पृथिवितीर्थमासाद्य गोसहस्रफलं लभेत् ।
ततः शालूकिनीं गत्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥ १३ ॥
दशाश्वमेधे स्नात्वा च तदेव फलमाप्नुयात् ।
सर्पदेवीं समासाद्य नागानां तीर्थमुत्तमम् ॥ १४ ॥
अग्निष्टोममवाप्नोति नागलोकं च विन्दति ।
ततो गच्छेत धर्मज्ञ द्वारपालं तरन्तुकम् ॥ १५ ॥
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ।
ततः पञ्चनदं गत्वा नियतो नियताशनः ॥ १६ ॥
कोटितीर्थमुपस्पृश्य हयमेधफलं लभेत् ।
अश्विनोस्तीर्थमासाद्य रूपवानभिजायते ॥ १७ ॥
महाराज! वहाँसे पृथिवितीर्थमें जाकर स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है। राजन्! वहाँसे तीर्थसेवी मनुष्य शालूकिनीमें जाकर दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करनेसे उसी फलका भागी होता है। सर्पदेवीमें जाकर उत्तम नागतीर्थका सेवन करनेसे मनुष्य अग्निष्टोमका फल पाता और नागलोकमें जाता है। धर्मज्ञ! वहाँसे तरन्तुक नामक
द्वारपालके पास जाय। वहाँ एक रात निवास करनेसे सहस्र गोदानका फल होता है। वहाँसे नियमपूर्वक नियमित भोजन करते हुए पंचनदतीर्थमें जाय और वहाँ कोटितीर्थमें स्नान करे। इससे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। अश्विनीतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य रूपवान् होता है ॥ १३—१७ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ वाराहं तीर्थमुत्तमम् ।
विष्णुर्वराहरूपेण पूर्वं यत्र स्थितोऽभवत् ॥ १८ ॥
तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ अग्निष्टोमफलं लभेत् ।
धर्मज्ञ! वहाँसे परम उत्तम वाराहतीर्थको जाय, जहाँ भगवान् विष्णु पहले वाराहरूपसे स्थित हुए थे। नरश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करनेसे अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १८ १/२ ॥
ततो जयन्त्यां राजेन्द्र सोमतीर्थं समाविशेत् ॥ १९ ॥
स्नात्वा फलमवाप्नोति राजसूयस्य मानवः ।
राजेन्द्र! तदनन्तर जयन्तीमें सोमतीर्थके निकट जाय, वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य राजसूययज्ञका फल पाता है ॥ १९ १/२ ॥
एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २० ॥
कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप ।
पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेच्च सः ॥ २१ ॥
एकहंसतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है। नरेश्वर! कृतशौचतीर्थमें जाकर तीर्थसेवी मनुष्य पुण्डरीकयागका फल पाता और शुद्ध हो जाता है ॥ २०-२१ ॥
ततो मुञ्जवटं नाम स्थाणोः स्थानं महात्मनः ।
उपोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ २२ ॥
तदनन्तर महात्मा स्थाणुके मुञ्जवट नामक स्थानमें जाय। वहाँ एक रात रहनेसे मानव गणपतिपद प्राप्त करता है ॥ २२ ॥
तत्रैव च महाराज यक्षिणीं लोकविश्रुताम् ।
स्नात्वाभिगम्य राजेन्द्र सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ २३ ॥
महाराज! वहीं लोकविख्यात यक्षिणीतीर्थ है। राजेन्द्र! उसमें जानेसे और स्नान करनेसे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति होती है ॥ २३ ॥
कुरुक्षेत्रस्य तद् द्वारं विश्रुतं भरतर्षभ ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य तीर्थसेवी समाहितः ॥ २४ ॥
सम्मितं पुष्कराणां च स्नात्वार्च्य पितृदेवताः ।
जामदग्न्येन रामेण कृतं तत् सुमहात्मना ॥ २५ ॥
कृतकृत्यो भवेद् राजन्नश्वमेधं च विन्दति ।
भरतश्रेष्ठ! वह कुरुक्षेत्रका विख्यात द्वार है। उसकी परिक्रमा करके तीर्थयात्री मनुष्य एकाग्रचित्त हो पुष्करतीर्थके तुल्य उस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंकी पूजा करे। राजन्! इससे तीर्थयात्री कृतकृत्य होता और अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है। उत्तम श्रेणीके महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामने उस तीर्थका निर्माण किया है॥ २४-२५ १/२॥
ततो रामह्रदान् गच्छेत् तीर्थसेवी समाहितः ॥ २६ ॥
तदनन्तर तीर्थयात्री एकाग्रचित्त हो परशुराम-कुण्डोंपर जाय ॥ २६ ॥
तत्र रामेण राजेन्द्र तरसा दीप्ततेजसा ।
क्षत्रमुत्साद्य वीरेण ह्रदाः पञ्च निवेशिताः ॥ २७ ॥
राजेन्द्र! वहाँ उद्दीप्त तेजस्वी वीरवर परशुरामने सम्पूर्ण क्षत्रियकुलका वेगपूर्वक संहार करके पाँच कुण्ड स्थापित किये थे॥ २७॥
पूरयित्वा नरव्याघ्र रुधिरेणेति विश्रुतम् ।
पितरस्तर्पिताः सर्वे तथैव प्रपितामहाः ॥ २८ ॥
पुरुषसिंह! उन कुण्डोंको उन्होंने रक्तसे भर दिया था, ऐसा सुना जाता है। उसी रक्तसे परशुरामजीने अपने पितरों और प्रपितामहोंका तर्पण किया ॥ २८ ॥
ततस्ते पितरः प्रीता राममूचुर्नराधिप ।
राजन्! तब वे पितर अत्यन्त प्रसन्न हो परशुरामजीसे इस प्रकार बोले— ॥ २८ १/२ ॥
पितर ऊचुः
राम राम महाभाग प्रीताः स्म तव भार्गव ॥ २९ ॥
अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते किमिच्छसि महाद्युते ॥ ३० ॥
पितरोंने कहा—महाभाग राम! परशुराम! भृगुनन्दन! विभो! हम तुम्हारी इस पितृभक्तिसे और तुम्हारे पराक्रमसे भी बहुत प्रसन्न हुए हैं। महाद्युते! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। बोलो, क्या चाहते हो? ॥ २९-३० ॥
एवमुक्तः स राजेन्द्र रामः प्रहरतां वरः ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं पितॄन् स गगने स्थितान् ॥ ३१ ॥
भवन्तो यदि मे प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि ।
पितृप्रसादमिच्छेयं तप आप्यायनं पुनः ॥ ३२ ॥
राजेन्द्र! उनके ऐसा कहनेपर योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामने हाथ जोड़कर आकाशमें खड़े हुए उन पितरोंसे कहा—'पितृगण! यदि आपलोग मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मैं आपका अनुग्रहपात्र होऊँ तो मैं आपका कृपा-प्रसाद चाहता हूँ। पुनः मेरी तपस्या पूरी हो जाय॥ ३१-३२॥
यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं मया ।
ततश्च पापान्मुच्येयं युष्माकं तेजसाप्यहम् ॥ ३३ ॥
ह्रदाश्च तीर्थभूता मे भवेयुर्भुवि विश्रुताः ।
'मैंने जो रोषके वशीभूत होकर सारे क्षत्रियकुलका संहार कर दिया है, आपके प्रभावसे मैं उस पापसे मुक्त हो जाऊँ तथा मेरे ये कुण्ड भूमण्डलमें विख्यात तीर्थस्वरूप हो जायँ ॥ ३३ १/२ ॥
एतच्छ्रुत्वा शुभं वाक्यं रामस्य पितरस्तदा ॥ ३४ ॥
प्रत्यूचुः परमप्रीता रामं हर्षसमन्विताः ।
तपस्ते वर्धतां भूयः पितृभक्त्या विशेषतः ॥ ३५ ॥
परशुरामजीका यह शुभ वचन सुनकर उनके पितर बड़े प्रसन्न हुए और हर्षमें भरकर बोले—'वत्स! तुम्हारी तपस्या इस विशेष पितृभक्तिसे पुनः बढ़ जाय ॥ ३४-३५ ॥
यच्च रोषाभिभूतेन क्षत्रमुत्सादितं त्वया ।
ततश्च पापान्मुक्तस्त्वं पतितास्ते स्वकर्मभिः ॥ ३६ ॥
'तुमने जो रोषमें भरकर क्षत्रियकुलका संहार किया है, उस पापसे तुम मुक्त हो गये। वे क्षत्रिय अपने ही कर्मसे मरे हैं ॥ ३६ ॥
ह्रदाश्च तव तीर्थत्वं गमिष्यन्ति न संशयः ।
ह्रदेषु तेषु यः स्नात्वा पितॄन् संतर्पयिष्यति ॥ ३७ ॥
पितरस्तस्य वै प्रीता दास्यन्ति भुवि दुर्लभम् ।
ईप्सितं च मनःकामं स्वर्गलोकं च शाश्वतम् ॥ ३८ ॥
'तुम्हारे बनाये हुए ये कुण्ड तीर्थस्वरूप होंगे, इसमें संशय नहीं है। जो इन कुण्डोंमें नहाकर पितरोंका तर्पण करेंगे, उन्हें तृप्त हुए पितर ऐसा वर देंगे, जो इस भूतलपर दुर्लभ है। वे उसके लिये मनोवाञ्छित कामना और सनातन स्वर्गलोक सुलभ कर देंगे' ॥ ३७-३८ ॥
एवं दत्त्वा वरान् राजन् रामस्य पितरस्तदा ।
आमन्त्र्य भार्गवं प्रीत्या तत्रैवान्तर्हितास्ततः ॥ ३९ ॥
एवं रामह्रदाः पुण्या भार्गवस्य महात्मनः ।
स्नात्वा ह्रदेषु रामस्य ब्रह्मचारी शुभव्रतः ॥ ४० ॥
राममभ्यर्च्य राजेन्द्र लभेद बहुसुवर्णकम् ।
वंशमूलकमासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह ॥ ४१ ॥
स्ववंशमुद्धरेद् राजन् स्नात्वा वै वंशमूलके ।
कायशोधनमासाद्य तीर्थं भरतसत्तम ॥ ४२ ॥
शरीरशुद्धिः स्नातस्य तस्मिंस्तीर्थे न संशयः ।
शुद्धदेहश्च संयाति शुभाँल्लोकाननुत्तमान् ॥ ४३ ॥
राजन्! इस प्रकार वर देकर परशुरामजीके पितर प्रसन्नतापूर्वक उनसे अनुमति ले वहीं अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार भृगुनन्दन महात्मा परशुरामके वे कुण्ड बड़े पुण्यमय माने गये हैं। राजन्! जो उत्तम व्रत एवं ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए परशुरामजीके उन कुण्डोंके जलमें स्नान करके उनकी पूजा करता है, उसे प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है। कुरुश्रेष्ठ! तदनन्तर तीर्थसेवी मनुष्य वंशमूलकतीर्थमें जाय। राजन्! वंशमूलकमें स्नान करके मनुष्य अपने कुलका उद्धार कर देता है। भरतश्रेष्ठ! कायशोधनतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे शरीरकी शुद्धि होती है, इसमें संशय नहीं। शरीर शुद्ध होनेपर मनुष्य परम उत्तम कल्याणमय लोकोंमें जाता है ॥ ३९—४३ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
लोका यत्रोद्धताः पूर्वं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ४४ ॥
लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम् ।
स्नात्वा तीर्थवरे राजँल्लोकानुद्धरते स्वकान् ॥ ४५ ॥
धर्मज्ञ! तदनन्तर त्रिभुवनविख्यात लोकोद्धारतीर्थमें जाय, जो तीनों लोकोंमें पूजित है। वहाँ पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने कितने ही लोकोंका उद्धार किया था। राजन्! लोकोद्धारमें जाकर उस उत्तम तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य आत्मीय जनोंका उद्धार करता है ॥ ४४-४५ ॥
श्रीतीर्थं च समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः ।
अर्चयित्वा पितॄन् देवान् विन्दते श्रियमुत्तमाम् ॥ ४६ ॥
मनको वशमें करके श्रीतीर्थमें जाकर स्नान करके देवताओं और पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य उत्तम सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ ४६ ॥
कपिलातीर्थमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन् स्वान् दैवतान्यपि ॥ ४७ ॥
कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः ।
कपिला-तीर्थमें जाकर ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ स्नान और देवता-पितरोंका पूजन करके मानव सहस्र कपिला गौओंके दानका फल प्राप्त करता है ॥ ४७½ ॥
सूर्यतीर्थं समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः ॥ ४८ ॥
अर्चयित्वा पितॄन् देवानुपवासपरायणः ।
अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ॥ ४९ ॥
मनको वशमें करके सूर्यतीर्थमें जाकर स्नान और देवता-पितरोंका अर्चन करके उपवास करनेवाला मनुष्य अग्निष्टोमयक़ा फल पाता और सूर्यलोकमें जाता है ॥ ४८-४९ ॥
गवां भवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम् ।
तत्राभिषेकं कुर्वाणो गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५० ॥
तदनन्तर तीर्थसेवी क्रमशः गोभवनतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे। इससे उसको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ५० ॥
शङ्खिनीतीर्थमासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह ।
देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तीर्थयात्री पुरुष शांखिनीतीर्थमें जाकर वहाँ देवीतीर्थमें स्नान करनेसे उत्तम रूप प्राप्त करता है ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र द्वारपालमरन्तुकम् ।
तच्च तीर्थं सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मनः ॥ ५२ ॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ।
राजेन्द्र! तदनन्तर अरन्तुक नामक द्वारपालके पास जाय। महात्मा यक्षराज कुबेरका वह तीर्थ सरस्वती नदीमें है। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ५२ ½ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मावर्तं नरोत्तमः ॥ ५३ ॥
ब्रह्मावर्ते नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ।
राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ मानव ब्रह्मावर्ततीर्थको जाय। ब्रह्मावर्तमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ ५३ ½ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र सुतीर्थकमनुत्तमम् ॥ ५४ ॥
तत्र संनिहिता नित्यं पितरो दैवतैः सह ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ॥ ५५ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति पितृलोकं च गच्छति ।
राजेन्द्र! वहाँसे परम उत्तम सुतीर्थमें जाय। वहाँ देवतालोग पितरोंके साथ सदा विद्यमान रहते हैं। वहाँ पितरों और देवताओंके पूजनमें तत्पर हो स्नान करे। इससे तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और पितृलोकमें जाता है ॥ ५४-५५ ½ ॥
ततोऽम्बुमतयां धर्मज्ञ सुतीर्थकमनुत्तमम् ॥ ५६ ॥
धर्मज्ञ! वहाँसे अम्बुमतीमें, जो परम उत्तम तीर्थ है, जाय ॥ ५६ ॥
काशीश्वरस्य तीर्थेषु स्नात्वा भरतसत्तम ।
सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ५७ ॥
भरतश्रेष्ठ! काशीश्वरके तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य सब रोगोंसे मुक्त हो जाता और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ५७ ॥
मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भारत ।
प्रजा विवर्धते राजन्नतन्वीं श्रियमश्नुते ॥ ५८ ॥
भरतवंशी महाराज! वहीं मातृतीर्थ है, जिसमें स्नान करनेवाले पुरुषकी संतति बढती है और वह कभी क्षीण न होनेवाली सम्पत्तिका उपभोग करता है ॥
ततः सीतवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।
तीर्थं तत्र महाराज महदन्यत्र दुर्लभम् ॥ ५९ ॥
तदनन्तर नियमसे रहकर नियमित भोजन करते हुए सीतवनमें जाय। महाराज! वहाँ महान् तीर्थ है, जो अन्यत्र दुर्लभ है ॥ ५९ ॥
पुनाति गमनादेव दृष्टमेकं नराधिप ।
केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन् पूतो भवति भारत ॥ ६० ॥
नरेश्वर! वह तीर्थ एक बार जाने या दर्शन करनेसे ही पवित्र कर देता है। भारत! उसमें केशोंको धो लेने मात्रसे ही मनुष्य पवित्र हो जाता है ॥ ६० ॥
तीर्थं तत्र महाराज श्वाविल्लोमापहं स्मृतम् ।
यत्र विप्रा नरव्याघ्र विद्वांसस्तीर्थतत्पराः ॥ ६१ ॥
प्रीतिं गच्छन्ति परमां स्नात्वा भरतसत्तम ।
श्वाविल्लोमापनयने तीर्थे भरतसत्तम ॥ ६२ ॥
प्राणायामैर्निर्हरन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमाः ।
पूतात्मानश्च राजेन्द्र प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ ६३ ॥
महाराज! वहाँ श्वाविल्लोमापह नामक तीर्थ है। नरव्याघ्र! उसमें तीर्थपरायण हुए विद्वान् ब्राह्मण स्नान करके बड़े प्रसन्न होते हैं। भरतसत्तम! श्वाविल्लोमापनयनतीर्थमें प्राणायाम (योगकी क्रिया) करनेसे श्रेष्ठ द्विज अपने रोएँ झाड़ देते हैं तथा राजेन्द्र! वे शुद्धचित्त होकर परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१—६३ ॥
दशाश्वमेधिकं चैव तस्मिंस्तीर्थे महीपते ।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र गच्छेत परमां गतिम् ॥ ६४ ॥
भूपाल! वहीं दशाश्वमेधिकतीर्थ भी है। पुरुषसिंह! उसमें स्नान करके मनुष्य उत्तम गति प्राप्त करता है ॥ ६४ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र मानुषं लोकविश्रुतम् ।
यत्र कृष्णमृगा राजन् व्याधेन शरपीडिताः ॥ ६५ ॥
विगाह्य तस्मिन् सरसि मानुषत्वमुपागताः ।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ६६ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते ।
राजेन्द्र! तदनन्तर लोकविख्यात मानुषतीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ व्याधके बाणोंसे पीडित हुए कृष्णमृग उस सरोवरमें गोते लगाकर मनुष्य-शरीर पा गये थे, इसीलिये उसका नाम मानुषतीर्थ है। ब्रह्मचर्यपालन-पूर्वक एकाग्रचित्त हो उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मानव सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ६५-६६ ½ ॥
मानुषस्य तु पूर्वेण क्रोशमात्रे महीपते ।। ६७ ।।
आपगा नाम विख्याता नदी सिद्धनिषेविता ।
श्यामाकं भोजने तत्र यः प्रयच्छति मानवः ।। ६८ ।।
देवान् पितॄन् समुद्दिश्य तस्य धर्मफलं महत् ।
एकस्मिन् भोजिते विप्रे कोटिर्भवति भोजिता ।। ६९ ।।
राजन्! मानुषतीर्थसे पूर्व एक कोसकी दूरीपर आपगा नामसे विख्यात एक नदी है, जो सिद्धपुरुषोंसे सेवित है। जो मनुष्य वहाँ देवताओं और पितरोंके उद्देश्यसे भोजन कराते समय श्यामाक (साँवा) नामक अन्न देता है, उसे महान् धर्मफलकी प्राप्ति होती है। वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर एक करोड़ ब्राह्मणोंको भोजन करानेका फल मिलता है ।। ६७—६९ ।।
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन् वै देवतानि च ।
उषित्वा रजनीमेकामग्निष्टोमफलं लभेत् ।। ७० ।।
वहाँ स्नान करके देवताओं और पितरोंके पूजनपूर्वक एक रात निवास करनेसे अग्निष्टोमयागका फल मिलता है ।। ७० ।।
ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणः स्थानमुत्तमम् ।
ब्रह्मोदुम्बरमित्येव प्रकाशं भुवि भारत ।। ७१ ।।
भरतवंशी राजेन्द्र! तदनन्तर ब्रह्माजीके उत्तम स्थानमें जाय, जो इस पृथ्वीपर ब्रह्मोदुम्बरतीर्थके नामसे प्रसिद्ध है ।। ७१ ।।
तत्र सप्तर्षिकुण्डेषु स्नातस्य नरपुङ्गव ।
केदारे चैव राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनः ।। ७२ ।।
ब्रह्माणमधिगम्याथ शुचिः प्रयतमानसः ।
सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ।। ७३ ।।
कपिलस्य च केदारं समासाद्य सुदुर्लभम् ।
अन्तर्धानमवाप्नोति तपसा दग्धकिल्बिषः ।। ७४ ।।
वहाँ सप्तर्षिकुण्ड है। नरश्रेष्ठ महाराज! उन कुण्डोंमें तथा महात्मा कपिलके केदारतीर्थमें स्नान करनेसे पुरुषको महान् पुण्यकी प्राप्ति होती है। वह मनुष्य ब्रह्माजीके निकट जाकर उनका दर्शन करनेसे शुद्ध, पवित्रचित्त एवं सब पापोंसे रहित होकर ब्रह्मलोकमें जाता है। कपिलका केदार भी अत्यन्त दुर्लभ है। वहाँ जानेसे तपस्याद्वारा सब पाप नष्ट हो जानेके कारण मनुष्यको अन्तर्धानविद्याकी प्राप्ति हो जाती है ।।
ततो गच्छेत राजेन्द्र सरकं लोकविश्रुतम् ।
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामभिगम्य वृषध्वजम् ।। ७५ ।।
लभेत सर्वकामान् हि स्वर्गलोकं च गच्छति ।
राजेन्द्र! तदनन्तर लोकविख्यात सरकतीर्थमें जाय। वहाँ कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको भगवान् शंकरका दर्शन करनेसे मनुष्य सब कामनाओंको प्राप्त कर लेता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ७५ ½ ।।
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां सरके कुरुनन्दन ।। ७६ ।।
कुरुनन्दन! सरकमें तीन करोड़ तीर्थ हैं ।। ७६ ।।
रुद्रकोट्यां तथा कूपे ह्रदेषु च महीपते ।
इलास्पदं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम ।। ७७ ।।
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च दैवतानि पितॄनथ ।
न दुर्गतिमवाप्नोति वाजपेयं च विन्दति ।। ७८ ।।
राजन्! ये सब तीर्थ रुद्रकोटिमें, कूपमें और कुण्डोंमें हैं। भरतशिरोमणे! वहीं इलास्पदतीर्थ है, जिसमें स्नान और देवता-पितरोंका पूजन करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और वाजपेययज्ञका फल पाता है ।। ७७-७८ ।।
किंदाने च नरः स्नात्वा किंजप्ये च महीपते ।
अप्रमेयमवाप्नोति दानं जप्यं च भारत ।। ७९ ।।
महीपते! वहाँ किंदान और किंजप्य नामक तीर्थ भी हैं। भारत! उनमें स्नान करनेसे मनुष्य दान और जपका असीम फल पाता है ।। ७९ ।।
कलश्यां वार्युपस्पृश्य श्रद्दधानो जितेन्द्रियः ।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ।। ८० ।।
कलशीतीर्थमें जलका आचमन करके श्रद्धालु और जितेन्द्रिय मानव अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ।।
सरकस्य तु पूर्वेण नारदस्य महात्मनः ।
तीर्थं कुरुकुलश्रेष्ठ अम्बाजन्मेति विश्रुतम् ।। ८१ ।।
कुरुकुलश्रेष्ठ! सरकतीर्थके पूर्वमें महात्मा नारदका तीर्थ है, जो अम्बाजन्मके नामसे विख्यात है ।। ८१ ।।
तत्र तीर्थे नरः स्नात्वा प्राणानुत्सृज्य भारत ।
नारदेनाभ्यनुज्ञातो लोकान् प्राप्नोत्यनुत्तमान् ।। ८२ ।।
भारत! उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य प्राणत्यागके पश्चात् नारदजीकी आज्ञाके अनुसार परम उत्तम लोकोंमें जाता है ।। ८२ ।।
शुक्लपक्षे दशम्यां च पुण्डरीकं समाविशेत् ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् पुण्डरीकफलं लभेत् ।। ८३ ।।
शुक्लपक्षकी दशमी तिथिको पुण्डरीकतीर्थमें प्रवेश करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको पुण्डरीकयागका फल प्राप्त होता है ।। ८३ ।।
ततस्त्रिविष्टपं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रणाशिनी ॥ ८४ ॥
तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात त्रिविष्टपतीर्थमें जाय। वहाँ वैतरणी नामक पुण्यमयी
पापनाशिनी नदी है ॥
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् ।
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ॥ ८५ ॥
उसमें स्नान करके शूलपाणि भगवान् शंकरकी पूजा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे
शुद्धचित्त हो परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ८५ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र फलकीवनमुत्तमम् ।
तत्र देवाः सदा राजन् फलकीवनमाश्रिताः ॥ ८६ ॥
तपश्चरन्ति विपुलं बहु वर्षसहस्रकम् ।
दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८७ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ।
तीर्थे च सर्वदेवानां स्नात्वा भरतसत्तम ॥ ८८ ॥
गोसहस्रस्य राजेन्द्र फलं विन्दति मानवः ।
पाणिखाते नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८९ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ।
राजसूयमवाप्नोति ऋषिलोकं च विन्दति ॥ ९० ॥
राजेन्द्र! वहाँसे फलकीवन नामक उत्तम तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! देवतालोग
फलकीवनमें सदा निवास करते हैं और अनेक सहस्र वर्षोंतक वहाँ भारी तपस्यामें लगे रहते
हैं। भारत! दृषद्वतीमें स्नान करके देवता-पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और
अतिरात्र यज्ञोंका फल पाता है। भरतसत्तम राजेन्द्र! सर्वदेवतीर्थमें स्नान करनेसे मानव
सहस्र गोदानका फल पाता है। भारत! पाणिखाततीर्थमें स्नान करके देवता-पितरोंका तर्पण
करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्रयज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त कर लेता है; साथ
ही वह राजसूययज्ञका फल पाता एवं ऋषिलोकमें जाता है ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र मिश्रकं तीर्थमुत्तमम् ।
तत्र तीर्थानि राजेन्द्र मिश्रितानि महात्मना ॥ ९१ ॥
व्यासेन नृपशार्दूल द्विजार्थमिति नः श्रुतम् ।
सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ॥ ९२ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् परम उत्तम मिश्रकतीर्थमें जाय। महाराज! वहाँ महात्मा व्यासने
द्विजोंके लिये सभी तीर्थोंका सम्मिश्रण किया है; यह बात मेरे सुननेमें आयी है। जो मनुष्य
मिश्रकतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान सभी तीर्थोंमें स्नान करनेके समान
है ॥ ९१-९२ ॥
ततो व्यासवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।
मनोजवे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९३ ॥ तत्पश्चात् नियमपूर्वक रहते हुए मिताहारी होकर व्यासवनकी यात्रा करे। वहाँ मनोजवतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९३ ॥
गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थे नरः शुचिः । तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन् देवांश्च पूरुषः ॥ ९४ ॥ स देव्या समनुज्ञातो गोसहस्रफलं लभेत् । मधुवटीमें जाकर देवीतीर्थमें स्नान करके पवित्र हुआ मानव वहाँ देवता-पितरोंकी पूजा करके देवीकी आज्ञाके अनुसार सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९४ १/२ ॥
कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्याश्च भारत ॥ ९५ ॥ स्नाति वै नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते । भारत! कौशिकी और दृषद्वतीके संगममें जो स्नान करता है तथा नियमपालनपूर्वक संयमित भोजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ९५ १/२ ॥
ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता ॥ ९६ ॥ पुत्रशोकाभितप्तेन देहत्यागे कृता मतिः । ततो देवैस्तु राजेन्द्र पुनरुत्थापितस्तदा ॥ ९७ ॥ अभिगत्वा स्थलीं तस्य गोसहस्रफलं लभेत् । तत्पश्चात् व्यासस्थलीमें जाय, जहाँ परम बुद्धिमान् व्यासने पुत्रशोकसे संतप्त हो शरीर त्याग देनेका विचार किया था। राजेन्द्र! उस समय उन्हें देवताओंने पुनः उठाया था। उस स्थलमें जानेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ९६-९७ १/२ ॥
किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च ॥ ९८ ॥ गच्छेत परमां सिद्धिमृणैर्मुक्तः कुरुद्वह । वेदीतीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९९ ॥ किंदत्त नामक कूपके समीप जाकर एक प्रस्थ अर्थात् सोलह मुट्ठी तिल दान करे। कुरुश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो परम सिद्धिको प्राप्त होता है। वेदीतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९८-९९ ॥
अहश्च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते । तयोः स्नात्वा नरव्याघ्र सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥ १०० ॥ अहन् और सुदिन—ये दो लोकविख्यात तीर्थ हैं। नरश्रेष्ठ! उन दोनोंमें स्नान करके मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है ॥ १०० ॥
मृगधूमं ततो गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां नृपसत्तम ॥ १०१ ॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात मृगधूम-तीर्थमें जाय और वहाँ गंगाजीमें स्नान करे ॥ १०१ ॥
अर्च्चयित्वा महादेवमश्वमेधफलं लभेत् ।
देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १०२ ॥
वहाँ महादेवजीकी पूजा करके मनुष्य अश्वमेध-यज्ञका फल पाता है। देवीतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १०२ ॥
ततो वामनकं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
तत्र विष्णुपदे स्नात्वा अर्चयित्वा च वामनम् ॥ १०३ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा विष्णुलोकं स गच्छति ।
कुलम्पुने नरः स्नात्वा पुनाति स्वकुलं ततः ॥ १०४ ॥
तत्पश्चात् त्रिलोकविख्यात वामनतीर्थमें जाय। वहाँ विष्णुपदमें स्नान और वामनदेवताका पूजन करनेसे मनुष्य सब पापोंसे शुद्ध हो भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। कुलम्पुनतीर्थमें स्नान करके मानव अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ १०३-१०४ ॥
पवनस्य ह्रदे स्नात्वा मरुतां तीर्थमुत्तमम् ।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र विष्णुलोके महीयते ॥ १०५ ॥
नरव्याघ्र! तदनन्तर पवनह्रदमें स्नान करे। वह मरुद्गणोंका उत्तम तीर्थ है। वहाँ स्नान करनेसे मानव विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १०५ ॥
अमराणां ह्रदे स्नात्वा समभ्यर्च्यामराधिपम् ।
अमराणां प्रभावेण स्वर्गलोके महीयते ॥ १०६ ॥
अमरह्रदमें स्नान करके अमरेश्वर इन्द्रका पूजन करे। ऐसा करके मनुष्य अमरोंके प्रभावसे स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १०६ ॥
शालिहोत्रस्य तीर्थे च शालिसूर्ये यथाविधि ।
स्नात्वा नरवरश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १०७ ॥
नरश्रेष्ठ! शालिहोत्रके शालिसूर्य नामक तीर्थमें विधिपूर्वक स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ १०७ ॥
श्रीकुञ्जं च सरस्वत्यास्तीर्थं भरतसत्तम ।
तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ १०८ ॥
भरतसत्तम नरश्रेष्ठ! श्रीकुंज नामक सरस्वतीतीर्थमें स्नान करनेसे मानव अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त कर लेता है ॥ १०८ ॥
ततो नैमिषकुञ्जं च समासाद्य कुरूद्वह ।
ऋषयः किल राजेन्द्र नैमिषेयास्तपस्विनः ॥ १०९ ॥
तीर्थयात्रां पुरस्कृत्य कुरुक्षेत्रं गताः पुरा ।
ततः कुञ्जः सरस्वत्याः कृतो भरतसत्तम ॥ ११० ॥
कुरुश्रेष्ठ! तत्पश्चात् नैमिषकुञ्जकी यात्रा करे। राजेन्द्र! कहते हैं, नैमिषारण्यके निवासी तपस्वी ऋषि पहले कभी तीर्थयात्राके प्रसंगसे कुरुक्षेत्रमें गये थे। भरतश्रेष्ठ! उसी समय
उन्होंने सरस्वतीकुंजका निर्माण किया था (वही नैमिषकुंज कहलाता है) ।। १०९-११० ।। ऋषीणामवकाशः स्याद् यथा तुष्टिकरो महान् । तस्मिन् कुञ्जे नरः स्नात्वा अग्निष्टोमफलं लभेत् ।। १११ ।। वह ऋषियोंका स्थान है, जो उनके लिये महान् संतोषजनक है। उस कुंजमें स्नान करके मनुष्य अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ।। १११ ।। ततो गच्छेत धर्मज्ञ कन्यातीर्थमनुत्तमम् । कन्यातीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।। ११२ ।। धर्मज्ञ! तदनन्तर परम उत्तम कन्यातीर्थकी यात्रा करे। कन्यातीर्थमें स्नान करनेसे मानव सहस्र गोदानका फल पाता है ।। ११२ ।। ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणस्तीर्थमुत्तमम् । तत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः ।। ११३ ।। ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् । राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करनेसे ब्राह्मणेतर वर्णका मनुष्य भी ब्राह्मणत्व लाभ करता है। ब्राह्मण होनेपर शुद्धचित्त हो वह परम गतिको प्राप्त कर लेता है ।। ११३ १/२ ।। ततो गच्छेनरश्रेष्ठ सोमतीर्थमनुत्तमम् ।। ११४ ।। तत्र स्नात्वा नरो राजन् सोमलोकमवाप्नुयात् । नरश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उत्तम सोमतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव सोमलोकको जाता है ।। ११४ १/२ ।। सप्तसारस्वतं तीर्थं ततो गच्छेन्नराधिप ।। ११५ ।। यत्र मङ्कणकः सिद्धो महर्षिर्लोकविश्रुतः । पुरा मङ्कणको राजन् कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् ।। ११६ ।। क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् । स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टःप्रनृत्तवान् ।। ११७ ।। नरेश्वर! इसके बाद सप्तसारस्वत नामक तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात महर्षि मंकणकको सिद्धि प्राप्त हुई थी। राजन्! हमारे सुननेमें आया है कि पहले कभी महर्षि मंकणकके हाथमें कुशका अग्रभाग गड़ गया, जिससे उनके हाथमें घाव हो गया। महाराज! उस समय उस हाथसे शाकका रस चूने लगा। शाकका रस चूता देख महर्षि हर्षवेशसे मतवाले हो नृत्य करने लगे ।। ११५—११७ ।। ततस्तस्मिन् प्रनृत्ते तु स्थावरं जंगमं च यत् । प्रनृत्तमुभयं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ।। ११८ ।। वीर! उनके नृत्य करते समय उनके तेजसे मोहित हो सारा चराचर जगत् नृत्य करने लगा ।। ११८ ।।
ब्रह्मादिभिः सुरै राजन्नृषिभिश्च तपोधनैः ।
विज्ञाप्तो वै महादेव ऋषेरर्थे नराधिप ॥ ११९ ॥
राजन्! नरेश्वर! उस समय ब्रह्मा आदि देवता तथा तपोधन महर्षिगण—सबने मंकणक मुनिके विषयमें महादेवजीसे निवेदन किया— ॥ ११९ ॥
नायं नृत्येद यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि ।
तं प्रनृत्तं समासाद्य हर्षाविष्टेन चेतसा ।
सुराणां हितकामार्थमृषिं देवोऽभ्यभाषत ॥ १२० ॥
‘देव! आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे इनका यह नृत्य बंद हो जाय।’ महादेवजी देवताओंके हितकी इच्छासे हर्षविशसे नाचते हुए मुनिके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ १२० ॥
भो भो महर्षे धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् ।
हर्षस्थानं किमर्थं वा तवाद्य मुनिपुङ्गव ॥ १२१ ॥
‘धर्मज्ञ महर्षे! मुनिप्रवर! आप किसलिये नृत्य कर रहे हैं? आज आपके इस हर्षातिरेकका क्या कारण है?’ ॥
ऋषिरुवाच
तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम ।
किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम् ॥ १२२ ॥
यं दृष्ट्वा सम्प्रनृत्तोऽहं हर्षेण महतान्वितः ।
ऋषिने कहा—द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! मैं धर्मके मार्गपर स्थिर रहनेवाला तपस्वी हूँ। मेरे हाथसे यह शाकका रस चू रहा है। क्या आप इसे नहीं देखते? इसीको देखकर मैं महान् हर्षसे नाच रहा हूँ ॥ १२२½ ॥
तं प्रहस्याब्रवीद् देव ऋषिं रागेण मोहितम् ॥ १२३ ॥
महर्षि रागसे मोहित हो रहे थे। महादेवजीने उनकी बात सुनकर हँसते हुए कहीं— ॥ १२३ ॥
अहं तु विस्मयं विप्र न गच्छामीति पश्य माम् ।
एवमुक्त्वा नरश्रेष्ठ महादेवेन धीमता ॥ १२४ ॥
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वाङ्गुष्ठस्ताडितोऽनघ ।
ततो भस्म क्षताद् राजन् निर्गतं हिमसंनिभम् ॥ १२५ ॥
‘विप्रवर! मुझे तो यह देखकर कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है। मेरी ओर देखिये।’
नरश्रेष्ठ! निष्पाप राजेन्द्र! ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् महादेवजीने अंगुलीके अग्रभागसे अपने अँगूठेको ठोंका। राजन्! उनके चोट करनेपर उस अँगूठेसे बर्फके समान सफेद भस्म गिरने लगा ॥ १२४-१२५ ॥
तद् दृष्ट्वा व्रीडितो राजन् स मुनिः पादयोर्गतः ।
नान्यद् देवात् परं मेने रुद्रात् परतरं महत् ॥ १२६ ॥
महाराज! यह अद्भुत बात देखकर मुनि लज्जित हो महादेवजीके चरणोंमें पड़ गये और उन्होंने दूसरे किसी देवताको महादेवजीसे बढ़कर नहीं माननेका निश्चय किया ॥ १२६ ॥
सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृक् ।
त्वया सर्वमिदं सृष्टं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ १२७ ॥
वे बोले—‘भगवन्! देवता और असुरोंसहित सम्पूर्ण जगत्के आश्रय आप ही हैं। त्रिशूलधारी महेश्वर! आपने ही चराचर जीवोंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको उत्पन्न किया है ॥ १२७ ॥
त्वमेव सर्वान् ग्रससि पुनरेव युगक्षये ।
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया ॥ १२८ ॥
‘फिर प्रलयकाल आनेपर आप ही सब जीवोंको अपना ग्रास बना लेते हैं। देवता भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते, फिर मेरी तो बात ही क्या? ॥ १२८ ॥
त्वयि सर्वे प्रदृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ ।
सर्वस्त्वमसि लोकानां कर्ता कारयिता च ह ॥ १२९ ॥
अध्याय (पृष्ठ 600)
भगवान् शंकरका मंकणक मुनिको नृत्य करनेसे रोकना
'अनघ! ब्रह्मा आदि सब देवता आपहीमें दिखायी देते हैं। इस जगत्के करने और करानेवाले सब कुछ आप ही हैं ।। १२९ ।। त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभयाः । एवं स्तुत्वा महादेवमृषिर्वचनमब्रवीत् ॥ १३० ॥ 'आपके प्रसादसे सब देवता यहाँ निर्भय और प्रसन्न रहते हैं।' इस प्रकार स्तुति करके ऋषिने फिर महादेवजीसे कहा— ।। १३० ।। त्वत्प्रसादान्महादेव तपो मे न क्षरेत वै । ततो देवः प्रहृष्टात्मा ब्रह्मर्षिमिदमब्रवीत् ॥ १३१ ॥ 'महादेव! आपकी कृपासे मेरी तपस्या नष्ट न हो।' तब महादेवजीने प्रसन्नचित्त हो महर्षिसे कहा— ।। १३१ ।। तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा । आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सह महामुने ॥ १३२ ॥ 'ब्रह्मन्! मेरे प्रसादसे आपकी तपस्या हजारगुनी बढ़े। महामुने! मैं तुम्हारे साथ इस आश्रममें रहूँगा ।। १३२ ।। सप्तसारस्वते स्नात्वा अर्चयिष्यन्ति ये तु माम् । न तेषां दुर्लभं किंचिदिहलोके परत्र च ॥ १३३ ॥ 'जो सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके मेरी पूजा करेंगे, उनके लिये इहलोक और परलोकमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होगी ।। १३३ ।। सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः । एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १३४ ॥ 'इतना ही नहीं, वे सरस्वतीके लोकमें जायँगे, इसमें संशय नहीं है।' ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये ।। १३४ ।। ततस्त्वौशनसं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ १३५ ॥ तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात औशनसतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा तपस्वी ऋषि रहते हैं ।। १३५ ।। कार्तिकेयश्च भगवांस्त्रिसंध्यं किल भारत । सांनिध्यमकरोन्नित्यं भार्गवप्रियकाम्यया ॥ १३६ ॥ भारत! शुक्राचार्यजीका प्रिय करनेके लिये भगवान् कार्तिकेय भी वहाँ सदा तीनों संध्याओंके समय उपस्थित रहते हैं ।। १३६ ।। कपालमोचनं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम् । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १३७ ॥