भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 587

भरतश्रेष्ठ! वह कुरुक्षेत्रका विख्यात द्वार है। उसकी परिक्रमा करके तीर्थयात्री मनुष्य एकाग्रचित्त हो पुष्करतीर्थके तुल्य उस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंकी पूजा करे। राजन्! इससे तीर्थयात्री कृतकृत्य होता और अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त करता है। उत्तम श्रेणीके महात्मा जमदग्निनन्दन परशुरामने उस तीर्थका निर्माण किया है॥ २४-२५ १/२॥

ततो रामह्रदान् गच्छेत् तीर्थसेवी समाहितः ॥ २६ ॥
तदनन्तर तीर्थयात्री एकाग्रचित्त हो परशुराम-कुण्डोंपर जाय ॥ २६ ॥

तत्र रामेण राजेन्द्र तरसा दीप्ततेजसा ।
क्षत्रमुत्साद्य वीरेण ह्रदाः पञ्च निवेशिताः ॥ २७ ॥
राजेन्द्र! वहाँ उद्दीप्त तेजस्वी वीरवर परशुरामने सम्पूर्ण क्षत्रियकुलका वेगपूर्वक संहार करके पाँच कुण्ड स्थापित किये थे॥ २७॥

पूरयित्वा नरव्याघ्र रुधिरेणेति विश्रुतम् ।
पितरस्तर्पिताः सर्वे तथैव प्रपितामहाः ॥ २८ ॥
पुरुषसिंह! उन कुण्डोंको उन्होंने रक्तसे भर दिया था, ऐसा सुना जाता है। उसी रक्तसे परशुरामजीने अपने पितरों और प्रपितामहोंका तर्पण किया ॥ २८ ॥

ततस्ते पितरः प्रीता राममूचुर्नराधिप ।
राजन्! तब वे पितर अत्यन्त प्रसन्न हो परशुरामजीसे इस प्रकार बोले— ॥ २८ १/२ ॥

पितर ऊचुः

राम राम महाभाग प्रीताः स्म तव भार्गव ॥ २९ ॥
अनया पितृभक्त्या च विक्रमेण च ते विभो ।
वरं वृणीष्व भद्रं ते किमिच्छसि महाद्युते ॥ ३० ॥
पितरोंने कहा—महाभाग राम! परशुराम! भृगुनन्दन! विभो! हम तुम्हारी इस पितृभक्तिसे और तुम्हारे पराक्रमसे भी बहुत प्रसन्न हुए हैं। महाद्युते! तुम्हारा कल्याण हो। तुम कोई वर माँगो। बोलो, क्या चाहते हो? ॥ २९-३० ॥

एवमुक्तः स राजेन्द्र रामः प्रहरतां वरः ।
अब्रवीत् प्राञ्जलिर्वाक्यं पितॄन् स गगने स्थितान् ॥ ३१ ॥
भवन्तो यदि मे प्रीता यद्यनुग्राह्यता मयि ।
पितृप्रसादमिच्छेयं तप आप्यायनं पुनः ॥ ३२ ॥
राजेन्द्र! उनके ऐसा कहनेपर योद्धाओंमें श्रेष्ठ परशुरामने हाथ जोड़कर आकाशमें खड़े हुए उन पितरोंसे कहा—'पितृगण! यदि आपलोग मुझपर प्रसन्न हैं और यदि मैं आपका अनुग्रहपात्र होऊँ तो मैं आपका कृपा-प्रसाद चाहता हूँ। पुनः मेरी तपस्या पूरी हो जाय॥ ३१-३२॥