भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 586

द्वारपालके पास जाय। वहाँ एक रात निवास करनेसे सहस्र गोदानका फल होता है। वहाँसे नियमपूर्वक नियमित भोजन करते हुए पंचनदतीर्थमें जाय और वहाँ कोटितीर्थमें स्नान करे। इससे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है। अश्विनीतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य रूपवान् होता है ॥ १३—१७ ॥

ततो गच्छेत धर्मज्ञ वाराहं तीर्थमुत्तमम् ।
विष्णुर्वराहरूपेण पूर्वं यत्र स्थितोऽभवत् ॥ १८ ॥
तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ अग्निष्टोमफलं लभेत् ।
धर्मज्ञ! वहाँसे परम उत्तम वाराहतीर्थको जाय, जहाँ भगवान् विष्णु पहले वाराहरूपसे स्थित हुए थे। नरश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करनेसे अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १८ १/२ ॥

ततो जयन्त्यां राजेन्द्र सोमतीर्थं समाविशेत् ॥ १९ ॥
स्नात्वा फलमवाप्नोति राजसूयस्य मानवः ।
राजेन्द्र! तदनन्तर जयन्तीमें सोमतीर्थके निकट जाय, वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य राजसूययज्ञका फल पाता है ॥ १९ १/२ ॥

एकहंसे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ २० ॥
कृतशौचं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप ।
पुण्डरीकमवाप्नोति कृतशौचो भवेच्च सः ॥ २१ ॥
एकहंसतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है। नरेश्वर! कृतशौचतीर्थमें जाकर तीर्थसेवी मनुष्य पुण्डरीकयागका फल पाता और शुद्ध हो जाता है ॥ २०-२१ ॥

ततो मुञ्जवटं नाम स्थाणोः स्थानं महात्मनः ।
उपोष्य रजनीमेकां गाणपत्यमवाप्नुयात् ॥ २२ ॥
तदनन्तर महात्मा स्थाणुके मुञ्जवट नामक स्थानमें जाय। वहाँ एक रात रहनेसे मानव गणपतिपद प्राप्त करता है ॥ २२ ॥

तत्रैव च महाराज यक्षिणीं लोकविश्रुताम् ।
स्नात्वाभिगम्य राजेन्द्र सर्वान् कामानवाप्नुयात् ॥ २३ ॥
महाराज! वहीं लोकविख्यात यक्षिणीतीर्थ है। राजेन्द्र! उसमें जानेसे और स्नान करनेसे सम्पूर्ण कामनाओंकी पूर्ति होती है ॥ २३ ॥

कुरुक्षेत्रस्य तद् द्वारं विश्रुतं भरतर्षभ ।
प्रदक्षिणमुपावृत्य तीर्थसेवी समाहितः ॥ २४ ॥
सम्मितं पुष्कराणां च स्नात्वार्च्य पितृदेवताः ।
जामदग्न्येन रामेण कृतं तत् सुमहात्मना ॥ २५ ॥
कृतकृत्यो भवेद् राजन्नश्वमेधं च विन्दति ।

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