भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 585

फलं प्राप्नोति च तदा राजसूयाश्वमेधयोः ॥ ८ ॥
कुरुश्रेष्ठ! श्रद्धासे युक्त होकर कुरुक्षेत्रकी यात्रा करनेपर मनुष्य राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है ॥ ८ ॥
ततो मचक्रुकं नाम द्वारपालं महाबलम् ।
यक्षं समभिवाद्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९ ॥
तदनन्तर, वहाँ मचक्रुक नामवाले द्वारपाल महाबली यक्षको नमस्कार करनेमात्रसे सहस्र गोदानका फल मिल जाता है ॥ ९ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ विष्णोः स्थानमनुत्तमम् ।
सततं नाम राजेन्द्र यत्र संनिहितो हरिः ॥ १० ॥
धर्मज्ञ राजेन्द्र! तत्पश्चात् भगवान् विष्णुके परम उत्तम सतत नामक तीर्थस्थानमें जाय, जहाँ श्रीहरि सदा निवास करते हैं ॥ १० ॥
तत्र स्नात्वा च नत्वा च त्रिलोकप्रभवं हरिम् ।
अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥ ११ ॥
ततः पारिप्लवं गच्छेत् तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं प्राप्नोति भारत ॥ १२ ॥
वहाँ स्नान और त्रिलोकभावन भगवान् श्रीहरिको नमस्कार करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। इसके बाद त्रिभुवनविख्यात पारिप्लव नामक तीर्थमें जाय। भारत! वहाँ स्नान करनेसे अग्निष्टोम और अतिरात्रयज्ञोंका फल प्राप्त होता है ॥ ११-१२ ॥
पृथिवितीर्थमासाद्य गोसहस्रफलं लभेत् ।
ततः शालूकिनीं गत्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥ १३ ॥
दशाश्वमेधे स्नात्वा च तदेव फलमाप्नुयात् ।
सर्पदेवीं समासाद्य नागानां तीर्थमुत्तमम् ॥ १४ ॥
अग्निष्टोममवाप्नोति नागलोकं च विन्दति ।
ततो गच्छेत धर्मज्ञ द्वारपालं तरन्तुकम् ॥ १५ ॥
तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ।
ततः पञ्चनदं गत्वा नियतो नियताशनः ॥ १६ ॥
कोटितीर्थमुपस्पृश्य हयमेधफलं लभेत् ।
अश्विनोस्तीर्थमासाद्य रूपवानभिजायते ॥ १७ ॥
महाराज! वहाँसे पृथिवितीर्थमें जाकर स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है। राजन्! वहाँसे तीर्थसेवी मनुष्य शालूकिनीमें जाकर दशाश्वमेधतीर्थमें स्नान करनेसे उसी फलका भागी होता है। सर्पदेवीमें जाकर उत्तम नागतीर्थका सेवन करनेसे मनुष्य अग्निष्टोमका फल पाता और नागलोकमें जाता है। धर्मज्ञ! वहाँसे तरन्तुक नामक