भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 601, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 601

'अनघ! ब्रह्मा आदि सब देवता आपहीमें दिखायी देते हैं। इस जगत्‌के करने और करानेवाले सब कुछ आप ही हैं ।। १२९ ।। त्वत्प्रसादात् सुराः सर्वे मोदन्तीहाकुतोभयाः । एवं स्तुत्वा महादेवमृषिर्वचनमब्रवीत् ॥ १३० ॥ 'आपके प्रसादसे सब देवता यहाँ निर्भय और प्रसन्न रहते हैं।' इस प्रकार स्तुति करके ऋषिने फिर महादेवजीसे कहा— ।। १३० ।। त्वत्प्रसादान्महादेव तपो मे न क्षरेत वै । ततो देवः प्रहृष्टात्मा ब्रह्मर्षिमिदमब्रवीत् ॥ १३१ ॥ 'महादेव! आपकी कृपासे मेरी तपस्या नष्ट न हो।' तब महादेवजीने प्रसन्नचित्त हो महर्षिसे कहा— ।। १३१ ।। तपस्ते वर्धतां विप्र मत्प्रसादात् सहस्रधा । आश्रमे चेह वत्स्यामि त्वया सह महामुने ॥ १३२ ॥ 'ब्रह्मन्! मेरे प्रसादसे आपकी तपस्या हजारगुनी बढ़े। महामुने! मैं तुम्हारे साथ इस आश्रममें रहूँगा ।। १३२ ।। सप्तसारस्वते स्नात्वा अर्चयिष्यन्ति ये तु माम् । न तेषां दुर्लभं किंचिदिहलोके परत्र च ॥ १३३ ॥ 'जो सप्तसारस्वततीर्थमें स्नान करके मेरी पूजा करेंगे, उनके लिये इहलोक और परलोकमें कोई भी वस्तु दुर्लभ नहीं होगी ।। १३३ ।। सारस्वतं च ते लोकं गमिष्यन्ति न संशयः । एवमुक्त्वा महादेवस्तत्रैवान्तरधीयत ॥ १३४ ॥ 'इतना ही नहीं, वे सरस्वतीके लोकमें जायँगे, इसमें संशय नहीं है।' ऐसा कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये ।। १३४ ।। ततस्त्वौशनसं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ॥ १३५ ॥ तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात औशनसतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ ब्रह्मा आदि देवता तथा तपस्वी ऋषि रहते हैं ।। १३५ ।। कार्तिकेयश्च भगवांस्त्रिसंध्यं किल भारत । सांनिध्यमकरोन्नित्यं भार्गवप्रियकाम्यया ॥ १३६ ॥ भारत! शुक्राचार्यजीका प्रिय करनेके लिये भगवान् कार्तिकेय भी वहाँ सदा तीनों संध्याओंके समय उपस्थित रहते हैं ।। १३६ ।। कपालमोचनं तीर्थं सर्वपापप्रमोचनम् । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १३७ ॥