महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 602, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंकपालमोचनतीर्थ सब पापोंसे छुड़ानेवाला है! नरश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। १३७ ।। अग्नितीर्थं ततो गच्छेत् तत्र स्नात्वा नरर्षभ । अग्निलोकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।। १३८ ।। नरश्रेष्ठ! वहाँसे अग्नितीर्थको जाय। उसमें स्नान करनेसे मनुष्य अग्निलोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ।। १३८ ।। विश्वामित्रस्य तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नात्वा नरश्रेष्ठ ब्राह्मण्यमधिगच्छति ।। १३९ ।। भरतसत्तम! वहीं विश्वामित्रतीर्थ है। नरश्रेष्ठ! वहाँ स्नान करनेसे ब्राह्मणत्वकी प्राप्ति होती है ।। १३९ ।। ब्रह्मयोनिं समासाद्य शुचिः प्रयतमानसः । तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ।। १४० ।। पुनात्यासप्तमं चैव कुलं नास्त्यत्र संशयः । नरश्रेष्ठ! ब्रह्मयोनितीर्थमें जाकर पवित्र एवं जितात्मा पुरुष वहाँ स्नान करनेसे ब्रह्मलोक प्राप्त कर लेता है। साथ ही अपने कुलकी सात पीढ़ियोंतकको पवित्र कर देता है, इसमें संशय नहीं है ।। १४० ½ ।। ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।। १४१ ।। पृथूदकमिति ख्यातं कार्तिकेयस्य वै नृप । तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ।। १४२ ।। राजेन्द्र! तदनन्तर कार्तिकेयके त्रिभुवनविख्यात पृथूदकतीर्थकी यात्रा करे और वहाँ स्नान करके देवताओं तथा पितरोंकी पूजामें संलग्न रहे ।। १४१-१४२ ।। अज्ञानाज्ज्ञानतो वापि स्त्रिया वा पुरुषेण वा । यत् किंचिदशुभं कर्म कृतं मानुषबुद्धिना ।। १४३ ।। तत् सर्वं नश्यते तत्र स्नातमात्रस्य भारत । अश्वमेधफलं चास्य स्वर्गलोकं च गच्छति ।। १४४ ।। भारत! स्त्री हो या पुरुष, उसने मानव-बुद्धिसे अनजानमें या जान-बूझकर जो कुछ भी पापकर्म किया है, वह सब पृथूदकतीर्थमें स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाता है और तीर्थसेवी पुरुषको अश्वमेधयज्ञके फल एवं स्वर्गलोककी प्राप्ति होती है ।। १४३-१४४ ।। पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात् सरस्वती । सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम् ।। १४५ ।। कुरुक्षेत्रतीर्थको सबसे पवित्र कहते हैं, कुरुक्षेत्रसे भी पवित्र है सरस्वती नदी, सरस्वतीसे भी पवित्र हैं उसके तीर्थ और उन तीर्थोंसे भी पवित्र हैं पृथूदक ।। १४५ ।। उत्तमं सर्वतीर्थानां यस्त्यजेदात्मनस्तनुम् ।