भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 603, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 603

पृथूदके जप्यपरो नैव श्वो मरणं तपेत् ॥ १४६ ॥ वह सब तीर्थोंमें उत्तम है, जो पृथूदकतीर्थमें जपपरायण होकर अपने शरीरका त्याग करता है, उसे पुनर्मृत्युका भय नहीं होता ॥ १४६ ॥ गीतं सनत्कुमारेण व्यासेन च महात्मना । एवं स नियतं राजन्नभिगच्छेत् पृथूदकम् ॥ १४७ ॥ यह बात भगवान् सनत्कुमार तथा महात्मा व्यासने कही है। राजन्! इस प्रकार तीर्थयात्री नियमपूर्वक पृथूदकतीर्थकी यात्रा करे ॥ १४७ ॥ पृथूदकात् तीर्थतमं नान्यत् तीर्थं कुरूद्वह । तन्मेध्यं तत् पवित्रं च पावनं च न संशयः ॥ १४८ ॥ कुरुश्रेष्ठ! पृथूदकसे श्रेष्ठतम तीर्थ दूसरा कोई नहीं है। वही मेध्य, पवित्र और पावन है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४८ ॥ तत्र स्नात्वा दिवं यान्ति येऽपि पापकृतो नराः । पृथूदके नरश्रेष्ठ एवमाहुर्मनीषिणः ॥ १४९ ॥ नरश्रेष्ठ! पापी मनुष्य भी वहाँ पृथूदकतीर्थमें स्नान करनेसे स्वर्गलोकमें चले जाते हैं, ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ १४९ ॥ मधुस्रवं च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १५० ॥ भरतश्रेष्ठ! वहीं मधुस्रव तीर्थ है। राजन्! उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १५० ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं मेध्यं यथाक्रमम् । सरस्वत्यरुणायाश्च संगमं लोकविश्रुतम् ॥ १५१ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर क्रमशः लोकविख्यात सरस्वती-अरुणासंगम नामक पवित्र तीर्थकी यात्रा करे ॥ १५१ ॥ त्रिरात्रोपोषितः स्नात्वा मुच्यते ब्रह्महत्यया । अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति मानवः ॥ १५२ ॥ आसप्तमं कुलं चैव पुनाति भरतर्षभ । वहाँ स्नान करके तीन रात उपवास करनेसे ब्रह्महत्यासे छुटकारा मिल जाता है। इतना ही नहीं, वह मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्रयज्ञोंसे मिलनेवाले फलको भी पा लेता है। भरतश्रेष्ठ! वह अपने कुलकी सात पीढ़ियोंको पवित्र कर देता है ॥ १५२ १/२ ॥ अर्धकीलं च तत्रैव तीर्थं कुरुकुलोद्वह ॥ १५३ ॥ विप्राणामनुकम्पार्थं दर्भिणा निर्मितं पुरा । व्रतोपनयनाभ्यां चाप्युपवासेन वाप्युत ॥ १५४ ॥ क्रियामन्त्रैश्च संयुक्तो ब्राह्मणः स्यान्न संशयः ।