भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 604

क्रियामन्त्रविहीनोऽपि तत्र स्नात्वा नरर्षभ । चीर्णव्रतो भवेद् विद्वान् दृष्टमेतत् पुरातनैः ॥ १५५ ॥ कुरुकुलशिरोमणे! वहीं अर्धकील नामक तीर्थ है, जिसे पूर्वकालमें दर्भी मुनिने ब्राह्मणोंपर कृपा करनेके लिये प्रकट किया था। वहाँ व्रत, उपनयन और उपवास करनेसे मनुष्य कर्मकाण्ड और मन्त्रोंका ज्ञाता ब्राह्मण होता है, इसमें संशय नहीं है। नरश्रेष्ठ! क्रियाविहीन और मन्त्रहीन पुरुष भी उसमें स्नान करके व्रतका पालन करनेसे विद्वान् होता है, यह बात प्राचीन महर्षियोंने प्रत्यक्ष देखी है ॥ १५३—१५५ ॥ समुद्राश्चापि चत्वारः समानीताश्च दर्भिणा । तेषु स्नातो नरश्रेष्ठ न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ १५६ ॥ फलानि गोसहस्राणां चतुर्णां विन्दते च सः । दर्भी मुनि वहाँ चार समुद्रोंको भी ले आये हैं। नरश्रेष्ठ! उनमें स्नान करनेवाला मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और उसे चार हजार गोदानका भी फल मिलता है ॥ १५६½ ॥ ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं शतसहस्रकम् ॥ १५७ ॥ साहस्रकं च तत्रैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते । उभयोर्हि नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १५८ ॥ दानं वाप्युपवासो वा सहस्रगुणितं भवेत् । धर्मज्ञ! तदनन्तर वहाँसे शतसहस्र और साहस्रक-तीर्थोंकी यात्रा करे। वे दोनों लोकविख्यात तीर्थ हैं। उनमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है। वहाँ किये हुए दान अथवा उपवासका महत्त्व अन्यत्रसे सहस्रगुना अधिक है ॥ १५७-१५८½ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र रेणुकातीर्थमुत्तमम् ॥ १५९ ॥ तीर्थाभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः । सर्वपापविशुद्धात्मा अग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ १६० ॥ राजेन्द्र! वहाँसे उत्तम रेणुकातीर्थकी यात्रा करे। पहले उस तीर्थमें स्नान करे; फिर देवताओं और पितरोंकी पूजामें तत्पर हो जाय। उससे तीर्थयात्री सब पापोंसे शुद्ध हो अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ १५९-१६० ॥ विमोचनमुपस्पृश्य जितमन्युर्जितेन्द्रियः । प्रतिग्रहकृतैर्दोषैः सर्वैः स परिमुच्यते ॥ १६१ ॥ विमोचनतीर्थमें स्नान और आचमन करके क्रोध और इन्द्रियोंको काबूमें रखनेवाला मनुष्य प्रतिग्रहजनित सारे दोषोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १६१ ॥ ततः पञ्चवटीं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । पुण्येन महता युक्तः सतां लोके महीयते ॥ १६२ ॥