भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 605

तदनन्तर ब्रह्मचारी एवं जितेन्द्रिय पुरुष पंचवटी-तीर्थमें जाकर महान् पुण्यसे युक्त हो सत्पुरुषोंके लोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १६२ ॥ यत्र योगेश्वरः स्थाणुः स्वयमेव वृषध्वजः । तमर्चयित्वा देवेशं गमनादेव सिध्यति ॥ १६३ ॥ वहाँ योगेश्वर एवं वृषभध्वज स्वयं भगवान् शिव निवास करते हैं। उन देवेश्वरकी पूजा करके मनुष्य वहाँ जानेमात्रसे सिद्ध हो जाता है ॥ १६३ ॥ तैजसं वारुणं तीर्थं दीप्यमानं स्वतेजसा । यत्र ब्रह्मादिभिर्देवैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः ॥ १६४ ॥ सैनापत्येन देवानाामभिषिक्तो गुहस्तदा । तैजसस्य तु पूर्वेण कुरुतीर्थं कुरूद्वह ॥ १६५ ॥ वहीं तैजस नामक वरुणदेवतासम्बन्धी तीर्थ है, जो अपने तेजसे प्रकाशित होता है। जहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं तथा तपस्वी ऋषियोंने कार्तिकेयको देवसेना-पतिके पदपर अभिषिक्त किया था। कुरुश्रेष्ठ! तैजसतीर्थके पूर्वभागमें कुरुतीर्थ है ॥ १६४-१६५ ॥ कुरुतीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ १६६ ॥ जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपालन और इन्द्रियसंयमपूर्वक कुरुतीर्थमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे शुद्ध होकर ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १६६ ॥ स्वर्गद्वारं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः । स्वर्गलोकमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ १६७ ॥ तदनन्तर नियमपरायण हो नियमित भोजन करते हुए स्वर्गद्वारको जाय। उस तीर्थके सेवनसे मनुष्य स्वर्गलोक पाता और ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १६७ ॥ ततो गच्छेदन्नरकं तीर्थसेवी नराधिप । तत्र स्नात्वा नरो राजन् न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ १६८ ॥ तत्र ब्रह्मा स्वयं नित्यं देवैः सह महीपते । अन्वास्ते पुरुषव्याघ्र नारायणपुरोगमैः ॥ १६९ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष अनरकतीर्थमें जाय। राजन्! उसमें स्नान करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। महीपते! पुरुषसिंह! वहाँ स्वयं ब्रह्मा नारायण आदि देवताओंके साथ नित्य निवास करते हैं ॥ सांनिध्यं तत्र राजेन्द्र रुद्रपत्न्याः कुरूद्वह । अभिगम्य च तां देवीं न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ १७० ॥ कुरुश्रेष्ठ! महाराज! वहाँ रुद्रपत्नी दुर्गाजीका स्थान भी है। उस देवीके निकट जानेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता ॥ १७० ॥ तत्रैव च महाराज विश्वेश्वरमुमापतिम् ।