महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
तदनन्तर ब्रह्मचारी एवं जितेन्द्रिय पुरुष पंचवटी-तीर्थमें जाकर महान् पुण्यसे युक्त हो सत्पुरुषोंके लोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १६२ ॥ यत्र योगेश्वरः स्थाणुः स्वयमेव वृषध्वजः । तमर्चयित्वा देवेशं गमनादेव सिध्यति ॥ १६३ ॥ वहाँ योगेश्वर एवं वृषभध्वज स्वयं भगवान् शिव निवास करते हैं। उन देवेश्वरकी पूजा करके मनुष्य वहाँ जानेमात्रसे सिद्ध हो जाता है ॥ १६३ ॥ तैजसं वारुणं तीर्थं दीप्यमानं स्वतेजसा । यत्र ब्रह्मादिभिर्देवैर्ऋषिभिश्च तपोधनैः ॥ १६४ ॥ सैनापत्येन देवानाामभिषिक्तो गुहस्तदा । तैजसस्य तु पूर्वेण कुरुतीर्थं कुरूद्वह ॥ १६५ ॥ वहीं तैजस नामक वरुणदेवतासम्बन्धी तीर्थ है, जो अपने तेजसे प्रकाशित होता है। जहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं तथा तपस्वी ऋषियोंने कार्तिकेयको देवसेना-पतिके पदपर अभिषिक्त किया था। कुरुश्रेष्ठ! तैजसतीर्थके पूर्वभागमें कुरुतीर्थ है ॥ १६४-१६५ ॥ कुरुतीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ १६६ ॥ जो मनुष्य ब्रह्मचर्यपालन और इन्द्रियसंयमपूर्वक कुरुतीर्थमें स्नान करता है, वह सब पापोंसे शुद्ध होकर ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १६६ ॥ स्वर्गद्वारं ततो गच्छेन्नियतो नियताशनः । स्वर्गलोकमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ १६७ ॥ तदनन्तर नियमपरायण हो नियमित भोजन करते हुए स्वर्गद्वारको जाय। उस तीर्थके सेवनसे मनुष्य स्वर्गलोक पाता और ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १६७ ॥ ततो गच्छेदन्नरकं तीर्थसेवी नराधिप । तत्र स्नात्वा नरो राजन् न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ १६८ ॥ तत्र ब्रह्मा स्वयं नित्यं देवैः सह महीपते । अन्वास्ते पुरुषव्याघ्र नारायणपुरोगमैः ॥ १६९ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष अनरकतीर्थमें जाय। राजन्! उसमें स्नान करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। महीपते! पुरुषसिंह! वहाँ स्वयं ब्रह्मा नारायण आदि देवताओंके साथ नित्य निवास करते हैं ॥ सांनिध्यं तत्र राजेन्द्र रुद्रपत्न्याः कुरूद्वह । अभिगम्य च तां देवीं न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ १७० ॥ कुरुश्रेष्ठ! महाराज! वहाँ रुद्रपत्नी दुर्गाजीका स्थान भी है। उस देवीके निकट जानेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता ॥ १७० ॥ तत्रैव च महाराज विश्वेश्वरमुमापतिम् ।
अभिगम्य महादेवं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १७१ ॥
महाराज! वहीं विश्वनाथ उमावल्लभ महादेवजीका स्थान है। वहाँकी यात्रा करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है॥ १७१ ॥
नारायणं चाभिगम्य पद्मनाभमरिंदम।
राजमानो महाराज विष्णुलोकं च गच्छति ॥ १७२ ॥
तीर्थेषु सर्वदेवानां स्नातः स पुरुषर्षभ।
सर्वदुःखैः परित्यक्तो द्योतते शशिवन्नरः ॥ १७३ ॥
शत्रुदमन महाराज! पद्मनाभ भगवान् नारायणके निकट जाकर (उनका दर्शन करके) मनुष्य तेजस्वी रूप धारण करके भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। पुरुषरत्न! सब देवताओंके तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य सब दुःखोंसे मुक्त हो चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है॥ १७२-१७३ ॥
ततः स्वस्तिपुरं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप।
प्रदक्षिणमुपावृत्य गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १७४ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष स्वस्तिपुरमें जाय, उसकी परिक्रमा करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है॥ १७४ ॥
पावनं तीर्थमासाद्य तर्पयेत् पितृदेवताः।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥ १७५ ॥
तत्पश्चात् पावनतीर्थमें जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। भारत! ऐसा करनेवाले पुरुषको अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है॥ १७५ ॥
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव कूपश्च भरतर्षभ।
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां तस्मिन् कूपे महीपते ॥ १७६ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहीं गंगाह्रद नामक कूप है। भूपाल! उस कूपमें तीन करोड़ तीर्थोंका वास है॥ १७६ ॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोकं प्रपद्यते।
आपगायां नरः स्नात्वा अर्चयित्वा महेश्वरम् ॥ १७७ ॥
गाणपत्यमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत्।
राजन्! उसमें स्नान करके मानव स्वर्गलोकमें जाता है। जो मनुष्य आपगामें स्नान करके महादेवजीकी पूजा करता है, वह गणपति-पद पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है॥ १७७ १/२ ॥
ततः स्थाणुवटं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ १७८ ॥
तत्र स्नात्वा स्थितो रात्रिं रुद्रलोकमवाप्नुयात्।
तदनन्तर त्रिभुवनविख्यात स्थाणुवटतीर्थमें जाय, वहाँ स्नान करके रातभर निवास करनेवाला मनुष्य रुद्रलोकमें जाता है॥ १७८ १/२ ॥
बदरीपाचनं गच्छेद्वसिष्ठस्याश्रमं ततः ॥ १७९ ॥
बदरीं भक्षयेत् तत्र त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
सम्यग् द्वादशवर्षाणि बदरीं भक्षयेत् तु यः ॥ १८० ॥
त्रिरात्रोपोषितस्तेन भवेत् तुल्यो नराधिप ।
रुद्रमार्गं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप ॥ १८१ ॥
अहोरात्रोपवासेन शक्रलोके महीयते ।
तदनन्तर बदरीपाचन नामसे प्रसिद्ध वसिष्ठके आश्रमपर जाय और वहाँ तीन रात उपवासपूर्वक रहकर बेरका फल खाय। जो मनुष्य वहाँ बारह वर्षोंतक भलीभाँति त्रिरात्रोपवासपूर्वक बेरका फल खाता है, वह उन्हीं वसिष्ठके समान होता है। राजन्! नरेश्वर! तीर्थसेवी मनुष्य रुद्रमार्गमें जाकर एक दिन-रात उपवास करे। इससे वह इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १७९-१८१ १/२ ॥
एकरात्रं समासाद्य एकरात्रोषितो नरः ॥ १८२ ॥
नियतः सत्यवादी च ब्रह्मलोके महीयते ।
तदनन्तर एकरात्रतीर्थमें जाकर मनुष्य नियमपूर्वक और सत्यवादी होकर एक रात निवास करनेपर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है ॥ १८२ १/२ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १८३ ॥
आदित्यस्याश्रमो यत्र तेजोरशेर्महात्मनः ।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयित्वा विभावसुम् ॥ १८४ ॥
आदित्यलोकं व्रजति कुलं चैव समुद्धरेत् ।
राजेन्द्र! तत्पश्चात् उस त्रैलोक्यविख्यात तीर्थमें जाय, जहाँ तेजोरशि महात्मा सूर्यका आश्रम है। उसमें स्नान करके सूर्यदेवकी पूजा करनेसे मनुष्य सूर्यके लोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार करता है ॥ १८३-१८४ १/२ ॥
सोमतीर्थे नरः स्नात्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥ १८५ ॥
सोमलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः ।
नरेश्वर! सोमतीर्थमें स्नान करके तीर्थसेवी मानव सोमलोकको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १८५ १/२ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ दधीचस्य महात्मनः ॥ १८६ ॥
तीर्थं पुण्यतमं राजन् पावनं लोकविश्रुतम् ।
यत्र सारस्वतो यातः सोऽङ्गिरास्तपसो निधिः ॥ १८७ ॥
धर्मज्ञ राजन्! तदनन्तर महात्मा दधीचके लोक-विख्यात परम पुण्यमय, पावन तीर्थकी यात्रा करे। जहाँ तपस्याके भण्डार सरस्वतीपुत्र अंगिराका जन्म हुआ ॥ १८६-१८७ ॥
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।
सारस्वतीं गतिं चैव लभते नात्र संशयः ॥ १८८ ॥
उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता है और सरस्वतीलोकको प्राप्त होता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १८८ ॥
ततः कन्याश्रमं गच्छेन्नियतो ब्रह्मचर्यवान् ।
त्रिरात्रोपोषितो राजन् नियतो नियताशनः ॥ १८९ ॥
लभेत् कन्याशतं दिव्यं स्वर्गलोकं च गच्छति ।
तदनन्तर नियमपूर्वक रहकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए कन्याश्रमतीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ तीन रात उपवास करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करनेसे सौ दिव्य कन्याओंकी प्राप्ति होती है और वह मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १८९½ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं संनिहतीमपि ॥ १९० ॥
धर्मज्ञ! तदनन्तर वहाँसे संनिहतीतीर्थकी यात्रा करे ॥ १९० ॥
तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
मासि मासि समायान्ति पुण्येन महतान्विताः ॥ १९१ ॥
उस तीर्थमें ब्रह्मा आदि देवता और तपोधन महर्षि प्रतिमास महान् पुण्यसे सम्पन्न होकर जाते हैं ॥ १९१ ॥
संनिहत्यामुपस्पृश्य राहुग्रस्ते दिवाकरे ।
अश्वमेधशतं तेन तत्रेष्टं शाश्वतं भवेत् ॥ १९२ ॥
सूर्यग्रहणके समय संनिहतीमें स्नान करनेसे सौ अश्वमेधयज्ञोंका अभीष्ट एवं शाश्वत फल प्राप्त होता है ॥ १९२ ॥
पृथिव्यां यानि तीर्थानि अन्तरिक्षचराणि च ।
नद्यो ह्रदास्तडागाश्च सर्वप्रस्रवणानि च ॥ १९३ ॥
उदपानानि वाप्यश्च तीर्थान्यायतनानि च ।
निःसंशयममावास्यां समेष्यन्ति नराधिप ॥ १९४ ॥
मासि मासि नरव्याघ्र संनिहत्यां न संशयः ।
तीर्थसंनिहनादेव संनिहतेति विश्रुता ॥ १९५ ॥
पृथिवीपर और आकाशमें जितने तीर्थ, नदी, ह्रद, तड़ाग, सम्पूर्ण झरने, उदपान, बावली, तीर्थ और मन्दिर हैं, वे प्रत्येक मासकी अमावस्याको संनिहतीमें अवश्य पधारेंगे। तीर्थोंका संघात या समूह होनेके कारण ही वह संनिहती नामसे विख्यात है ॥ १९३—१९५ ॥
तत्र स्नात्वा च पीत्वा च स्वर्गलोके महीयते ।
अमावास्यां तु तत्रैव राहुग्रस्ते दिवाकरे ॥ १९६ ॥
यः श्राद्धं कुरुते मर्त्यस्तस्य पुण्यफलं शृणु ।
अश्वमेधसहस्रस्य सम्यगिष्टस्य यत् फलम् ॥ १९७ ॥
स्नात एव समाप्नोति कृत्वा श्राद्धं च मानवः ।
यत् किंचिद् दुष्कृतं कर्म स्त्रिया वा पुरुषेण वा ॥ १९८ ॥
स्नातमात्रस्य तत् सर्वं नश्यते नात्र संशयः । पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ १९९ ॥
राजन्! उसमें स्नान और जलपान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो सूर्यग्रहणके समय अमावास्याको वहाँ पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पुण्यफलका वर्णन सुनो—। भलीभाँति सम्पन्न किये हुए सहस्र अश्वमेध यज्ञोंका जो फल होता है, उसे मनुष्य उस तीर्थमें स्नानमात्र करके अथवा श्राद्ध करके पा लेता है। स्त्री या पुरुषने जो कुछ भी दुष्कर्म किया हो, वह सब वहाँ स्नान करनेमात्रसे नष्ट हो जाता है; इसमें संशय नहीं है। वह पुरुष कमलके समान रंगवाले विमानद्वारा ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १९६—१९९ ॥
अभिवाद्य ततो यक्षं द्वारपालं मचक्रुकम् । कोटितीर्थमुपस्पृश्य लभेद बहुसुवर्णकम् ॥ २०० ॥
तदनन्तर मचक्रुक नामक द्वारपाल यक्षको प्रणाम करके कोटितीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको प्रचुर सुवर्ण-राशिकी प्राप्ति होती है ॥ २०० ॥
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव तीर्थं भरतसत्तम । तत्र स्नायीत धर्मज्ञ ब्रह्मचारी समाहितः ॥ २०१ ॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः ।
धर्मज्ञ भरतश्रेष्ठ! वहीं गंगाह्रद नामक तीर्थ है, उसमें ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो स्नान करे, इससे मनुष्यको राजसूय और अश्वमेध यज्ञोंद्वारा मिलनेवाले फलकी प्राप्ति होती है ॥ २०१ १/२ ॥
पृथिव्यां नैमिषं तीर्थमन्तरिक्षे च पुष्करम् ॥ २०२ ॥ त्रयाणामपि लोकानां कुरुक्षेत्रं विशिष्यते । पांसवोऽपि कुरुक्षेत्राद् वायुना समुदीरिताः ॥ २०३ ॥ अपि दुष्कृतकर्माणं नयन्ति परमां गतिम् । दक्षिणेन सरस्वत्या उत्तरेण दृषद्वतीम् ॥ २०४ ॥ ये वसन्ति कुरुक्षेत्रे ते वसन्ति त्रिविष्टपे ।
भूमण्डलके निवासियोंके लिये नैमिष, अन्तरिक्ष-निवासियोंके लिये पुष्कर और तीनों लोकोंके निवासियोंके लिये कुरुक्षेत्र विशिष्ट तीर्थ हैं। कुरुक्षेत्रसे वायुद्वारा उड़ायी हुई धूल भी पापी-से-पापी मनुष्यपर भी पड़ जाय तो उसे परमगतिको पहुँचा देती है। सरस्वतीसे दक्षिण, दृषद्वतीसे उत्तर कुरुक्षेत्रमें जो लोग निवास करते हैं, वे मानो स्वर्गलोकमें बसते हैं ॥ २०२—२०४ १/२ ॥
कुरुक्षेत्रे गमिष्यामि कुरुक्षेत्रे वसाम्यहम् ॥ २०५ ॥ अप्येकां वाचमुत्सृज्य सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
‘मैं कुरुक्षेत्रमें जाऊँगा, कुरुक्षेत्रमें निवास करूँगा’ ऐसी बात एक बार मुँहसे कह देनेपर भी मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २०५ १/२ ॥
ब्रह्मवेदी कुरुक्षेत्रं पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम् ।। २०६ ।।
तस्मिन् वसन्ति ये मर्त्या न ते शोच्याः कथंचन ।। २०७ ।।
कुरुक्षेत्र ब्रह्माजीकी वेदी है, इस पुण्यक्षेत्रका ब्रह्मर्षिगण सेवन करते हैं। जो मानव उसमें निवास करते हैं, वे किसी प्रकार शोकजनक अवस्थामें नहीं पड़ते ।। २०६-२०७ ।।
तरन्तुकारन्तुकयोर्यदन्तरं
रामह्रदानां च मचक्रुकस्य च ।
एतत् कुरुक्षेत्रसमन्तपञ्चकं
पितामहस्योत्तरवेदिरुच्यते ।। २०८ ।।
तरन्तुक और अरन्तुकके तथा रामह्रद और मचक्रुकके बीचका जो भूभाग है, यही कुरुक्षेत्र एवं समन्तपञ्चक है। इसे ब्रह्माजीकी उत्तरवेदी कहते हैं ।। २०८ ।।
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां त्र्यशीतितमोऽध्यायः ।। ८३ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें पुलस्त्यतीर्थयात्राविषयक तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८३ ।।
अध्याय (पृष्ठ 611)
चतुरशीतितमोऽध्यायः
नाना प्रकारके तीर्थोंकी महिमा
पुलस्त्य उवाच
ततो गच्छेन्महाराज धर्मतीर्थमनुत्तमम् ।
यत्र धर्मो महाभागस्तप्तवानुत्तमं तपः ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी कहते हैं—महाराज! तदनन्तर परम उत्तम धर्मतीर्थकी यात्रा करे, जहाँ महाभाग धर्मने उत्तम तपस्या की थी ॥ १ ॥
तेन तीर्थं कृतं पुण्यं स्वेन नाम्ना च विश्रुतम् ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् धर्मशीलः समाहितः ॥ २ ॥
आसप्तमं कुलं चैव पुनीते नात्र संशयः ।
राजन्! उन्होंने ही अपने नामसे विख्यात पुण्य तीर्थकी स्थापना की है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य धर्मशील एवं एकाग्रचित्त होता है और अपने कुलकी सातवीं पीढ़ीतकके लोगोंको पवित्र कर देता है; इसमें संशय नहीं है ॥ २ ½ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र ज्ञानपावनमुत्तमम् ॥ ३ ॥
अग्निष्टोममवाप्नोति मुनिलोकं च गच्छति ।
राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम ज्ञानपावन तीर्थमें जाय। वहाँ जानेसे मनुष्य अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता और मुनिलोकमें जाता है ॥ ३ ½ ॥
सौगन्धिकवनं राजंस्ततो गच्छेत मानवः ॥ ४ ॥
राजन्! तत्पश्चात् मानव सौगन्धिक वनमें जाय ॥ ४ ॥
तत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
सिद्धचारणगन्धर्वाः किंनराश्च महोरगाः ॥ ५ ॥
वहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन ऋषि, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, किन्नर और बड़े-बड़े नाग निवास करते हैं ॥
तद् वनं प्रविशन्नेव सर्वपापैः प्रमुच्यते ।
ततश्चापि सरिच्छ्रेष्ठा नदीनामुत्तमा नदी ॥ ६ ॥
प्लक्षान्देवी सुता राजन् महापुण्या सरस्वती ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत वल्मीकान्निःसृते जले ॥ ७ ॥
उस वनमें प्रवेश करते ही मानव सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उससे आगे सरिताओंमें श्रेष्ठ और नदियोंमें उत्तम नदी परम पुण्यमयी सरस्वतीदेवीका उद्गम स्थान है, जहाँ वे प्लक्ष (पकड़ी) नामक वृक्षकी जड़से टपक रही हैं। राजन्! वहाँ बाँबीसे निकले हुए जलमें स्नान करना चाहिये ॥ ६-७ ॥
अर्चयित्वा पितॄन् देवानश्वमेधफलं लभेत् ।
ईशानाध्युषितं नाम तत्र तीर्थं सुदुर्लभम् ॥ ८ ॥
वहाँ देवताओं तथा पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है। वहीं ईशानाध्युषित नामक परम दुर्लभ तीर्थ है ॥ ८ ॥
षट्सु शम्यानिपातेषु वल्मीकादिति निश्चयः ।
कपिलानां सहस्रं च वाजिमेधं च विन्दति ॥ ९ ॥
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र दृष्टमेतत् पुरातनैः ।
जहाँ बाँबीका जल है, वहाँसे इसकी दूरी छः शम्यानिपात* है। यह निश्चित माप बताया गया है। नरश्रेष्ठ! उस तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र कपिलादान और अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है; इसे प्राचीन ऋषियोंने प्रत्यक्ष अनुभव किया है ॥ ९ १/२ ॥
सुगन्धां शतकुम्भां च पञ्चयज्ञां च भारत ॥ १० ॥
अभिगम्य नरश्रेष्ठ स्वर्गलोके महीयते ।
भारत! पुरुषरत्न! सुगन्धा, शतकुम्भा तथा पंचयज्ञा तीर्थमें जाकर मानव स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १० १/२ ॥
त्रिशूलखातं तत्रैव तीर्थमासाद्य भारत ॥ ११ ॥
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ।
गाणपत्यं च लभते देहं त्यक्त्वा न संशयः ॥ १२ ॥
भरतकुलतिलक! वहीं त्रिशूलखात नामक तीर्थ है; वहाँ जाकर स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंकी पूजामें लग जाय। ऐसा करनेवाला मनुष्य देहत्यागके अनन्तर गणपति-पद प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ११-१२ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र देव्याः स्थानं सुदुर्लभम् ।
शाकम्भरीति विख्याता त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ १३ ॥
राजेन्द्र! वहाँसे परमदुर्लभ देवीस्थानकी यात्रा करे, वह देवी तीनों लोकोंमें शाकम्भरीके नामसे विख्यात है ॥ १३ ॥
दिव्यं वर्षसहस्रं हि शाकेन किल सुव्रता ।
आहारं सा कृतवती मासि मासि नराधिप ॥ १४ ॥
ऋषयोऽभ्यागतास्तत्र देव्या भक्त्या तपोधनाः ।
आतिथ्यं च कृतं तेषां शाकेन किल भारत ॥ १५ ॥
नरेश्वर! कहते हैं उत्तम व्रतका पालन करनेवाली उस देवीने एक हजार दिव्य वर्षोंतक एक-एक महीनेपर केवल शाकका आहार किया था। देवीकी भक्तिसे प्रभावित होकर बहुत-से तपोधन महर्षि वहाँ आये। भारत! उस देवीने उन महर्षियोंका आतिथ्य-सत्कार भी शाकके ही द्वारा किया ॥ १४-१५ ॥
ततः शाकम्भरीत्येव नाम तस्याः प्रतिष्ठितम्।
शाकम्भरीं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः॥ १६॥
त्रिरात्रमुषितः शाकं भक्षयित्वा नरः शुचिः।
शाकाहारस्य यत् किंचिद् वर्षैर्द्वादशभिः कृतम्॥ १७॥
तत् फलं तस्य भवति देव्याश्छन्देन भारत।
भारत! तबसे उस देवीका 'शाकम्भरी' ही नाम प्रसिद्ध हो गया। शाकम्भरीके समीप जाकर मनुष्य ब्रह्मचर्य पालनपूर्वक एकाग्रचित्त और पवित्र हो वहाँ तीन राततक शाक खाकर रहे तो बारह वर्षोंतक शाकाहारी मनुष्यको जो पुण्य प्राप्त होता है, वह उसे देवीकी इच्छासे (तीन ही दिनोंमें) मिल जाता है॥ १६-१७ १/२॥
ततो गच्छेत् सुवर्णाख्यं त्रिषु लोकेषु विश्रुतम्॥ १८॥
तत्र विष्णुः प्रसादार्थं रुद्रमाराधयत् पुरा।
वरांश्च सुबहूँल्लेभे दैवतेषु सुदुर्लभान्॥ १९॥
तदनन्तर त्रिभुवनविख्यात सुवर्णतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने रुद्रदेवकी प्रसन्नताके लिये उनकी आराधना की और उनसे अनेक देवदुर्लभ उत्तम वर प्राप्त किये॥ १८-१९॥
उक्तश्च त्रिपुरघ्नेन परितुष्टेन भारत।
अपि च त्वं प्रियतरो लोके कृष्ण भविष्यसि॥ २०॥
त्वन्मुखं च जगत् सर्वं भविष्यति न संशयः।
तत्राभिगम्य राजेन्द्र पूजयित्वा वृषध्वजम्॥ २१॥
अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति।
धूमावतीं ततो गच्छेत् त्रिरात्रोपोषितो नरः॥ २२॥
मनसा प्रार्थितान् कामाँल्लभते नात्र संशयः।
भारत! उस समय संतुष्टचित्त त्रिपुरारि शिवने श्रीविष्णुसे कहा—'श्रीकृष्ण! तुम मुझे लोकमें अत्यन्त प्रिय होओगे। संसारमें सर्वत्र तुम्हारी ही प्रधानता होगी, इसमें संशय नहीं है।' राजेन्द्र! उस तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और गणपतिपद प्राप्त कर लेता है। वहाँसे मनुष्य धूमावतीतीर्थको जाए और तीन रात उपवास करे। इससे वह निःसंदेह मनोवाञ्छित कामनाओंको प्राप्त कर लेता है॥ २०—२२ १/२॥
देव्यास्तु दक्षिणार्धेन रथावर्तो नराधिप॥ २३॥
तत्रारोहेत धर्मज्ञ श्रद्दधानो जितेन्द्रियः।
महादेवप्रसादाद्धि गच्छेत परमां गतिम्॥ २४॥
नरेश्वर! देवीसे दक्षिणार्ध भागमें रथावर्त नामक तीर्थ है। धर्मज्ञ! जो श्रद्धालु एवं जितेन्द्रिय पुरुष उस तीर्थकी यात्रा करता है, वह महादेवजीके प्रसादसे परम गति प्राप्त कर
लेता है ।। २३-२४ ।। प्रदक्षिणमुपावृत्य गच्छेत भरतर्षभ । धारां नाम महाप्राज्ञः सर्वपापप्रमोचनीम् ।। २५ ।। भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर महाप्राज्ञ पुरुष उस तीर्थकी परिक्रमा करके धाराकी यात्रा करे, जो सब पापोंसे छुड़ानेवाली है ।। २५ ।। तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र न शोचति नराधिप । नरव्याघ्र! नराधिप! वहाँ स्नान करके मनुष्य कभी शोकमें नहीं पड़ता ।। २५½ ।। ततो गच्छेत धर्मज्ञ नमस्कृत्य महागिरिम् ।। २६ ।। स्वर्गद्वारेण यत् तुल्यं गङ्गाद्वारं न संशयः । तत्राभिषेकं कुर्वीत कोटितीर्थे समाहितः ।। २७ ।। धर्मज्ञ! वहाँसे महापर्वत हिमालयको नमस्कार करके गंगाद्वार (हरिद्वार)-की यात्रा करे, जो स्वर्गद्वारके समान है; इसमें संशय नहीं है। वहाँ एकाग्रचित्त हो कोटितीर्थमें स्नान करे ।। २६-२७ ।। पुण्डरीकमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् । उष्यैकां रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ।। २८ ।। ऐसा करनेवाला मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है। वहाँ एक रात निवास करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ।। २८ ।। सप्तगङ्गे त्रिगङ्गे च शक्रावर्ते च तर्पयन् । देवान् पितृंश्च विधिवत् पुण्ये लोके महीयते ।। २९ ।। सप्तगंग, त्रिगंग और शक्रावर्ततीर्थमें विधिपूर्वक देवताओं तथा पितरोंका तर्पण करनेवाला मनुष्य पुण्य-लोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। २९ ।। ततः कनखले स्नात्वा त्रिरात्रोपोषितो नरः । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ३० ।। तदनन्तर कनखलमें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्ग-लोकमें जाता है ।। ३० ।। कपिलावटं ततो गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप । उपोष्य रजनीं तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ।। ३१ ।। नरेश्वर! उसके बाद तीर्थसेवी मनुष्य कपिलावट-तीर्थमें जाय। वहाँ रातभर उपवास करनेसे उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ।। ३१ ।। नागराजस्य राजेन्द्र कपिलस्य महात्मनः । तीर्थं कुरुवरश्रेष्ठ सर्वलोकेषु विश्रुतम् ।। ३२ ।। राजेन्द्र! कुरुश्रेष्ठ! वहीं नागराज महात्मा कपिलका तीर्थ है, जो सम्पूर्ण लोकोंमें विख्यात है ।। ३२ ।।
तत्राभिषेकं कुर्वीत नागतीर्थे नराधिप । कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः ॥ ३३ ॥ महाराज! वहाँ नागतीर्थमें स्नान करना चाहिये। इससे मनुष्यको सहस्र कपिलादानका फल प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ ततो ललितकं गच्छेच्छान्तनोस्तीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ ३४ ॥ तत्पश्चात् शान्तनुके उत्तम तीर्थ ललितकमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता ॥ ३४ ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नाति यः संगमे नरः । दशाश्वमेधानाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य गंगा-यमुनाके बीच संगम (प्रयाग)-में स्नान करता है, उसे दस अश्वमेधयज्ञोंका फल मिलता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ३५ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र सुगन्धां लोकविश्रुताम् । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३६ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर लोकविख्यात सुगन्धातीर्थकी यात्रा करे। इससे सब पापोंसे विशुद्धचित्त हुआ मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है ॥ ३६ ॥ रुद्रावर्तं ततो गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप । तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ३७ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष रुद्रावर्ततीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ३७ ॥ गङ्गायाश्च नरश्रेष्ठ सरस्वत्याश्च संगमे । स्नात्वाश्वमेधं प्राप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ३८ ॥ नरश्रेष्ठ! गंगा और सरस्वतीके संगममें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्ग-लोकमें जाता है ॥ ३८ ॥ भद्रकर्णेश्वरं गत्वा देवमर्च्य यथाविधि । न दुर्गतिमवाप्नोति नाकपृष्ठे च पूज्यते ॥ ३९ ॥ भगवान् भद्रकर्णेश्वरके समीप जाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करनेवाला पुरुष कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ३९ ॥ ततः कुब्जाम्रकं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप । गोसहस्रमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ४० ॥ नरेन्द्र! तत्पश्चात् तीर्थसेवी मानव कुब्जाम्रक-तीर्थमें जाय। वहाँ उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है और अन्तमें वह स्वर्गलोकको जाता है ॥ ४० ॥ अरुन्धतीवटं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ।
सामुद्रकमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी समाहितः ।। ४१ ।। अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः । गोसहस्रफलं विद्यात् कुलं चैव समुद्धरेत् ।। ४२ ।। नरपते! तत्पश्चात् तीर्थसेवी अरुन्धतीवटके समीप जाय और सामुद्रकतीर्थमें स्नान करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो तीन रात उपवास करे। इससे मनुष्य अश्वमेधयज्ञ और सहस्र गोदानका फल पाता तथा अपने कुलका उद्धार कर देता है ।। ४१-४२ ।। ब्रह्मावर्तं ततो गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ।। ४३ ।। तदनन्तर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक चित्तको एकाग्र करके ब्रह्मावर्ततीर्थमें जाय। इससे वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता और सोमलोकको जाता है ।। ४३ ।। यमुनाप्रभवं गत्वा समुपस्पृश्य यामुनम् । अश्वमेधफलं लब्ध्वा स्वर्गलोके महीयते ।। ४४ ।। यमुनाप्रभव नामक तीर्थमें जाकर यमुनाजलमें स्नान करके अश्वमेधयज्ञका फल पाकर मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। ४४ ।। दर्वीसंक्रमणं प्राप्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम् । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ४५ ।। दर्वीसंक्रमण नामक त्रिभुवनपूजित तीर्थमें जानेसे तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ४५ ।। सिन्धोश्च प्रभवं गत्वा सिद्धगन्धर्वसेवितम् । तत्रोष्य रजनीः पञ्च विन्देद् बहुसुवर्णकम् ।। ४६ ।। सिंधुके उद्गमस्थानमें जो सिद्ध-गन्धर्वोंद्वारा सेवित है, जाकर पाँच रात उपवास करनेसे प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है ।। ४६ ।। अथ वेदीं समासाद्य नरः परमदुर्गमाम् । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ४७ ।। तदनन्तर मनुष्य परम दुर्गम वेदीतीर्थमें जाकर अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ४७ ।। ऋषिकुल्यां समासाद्य वासिष्ठं चैव भारत । वासिष्ठीं समतिक्रम्य सर्वे वर्णा द्विजातयः ।। ४८ ।। भरतनन्दन! ऋषिकुल्या एवं वासिष्ठतीर्थमें जाकर स्नान आदि करके वासिष्ठीको लाँघकर जानेवाले क्षत्रिय आदि सभी वर्णोंके लोग द्विजाति हो जाते हैं ।। ४८ ।। ऋषिकुल्यां समासाद्य नरः स्नात्वा विकल्मषः । देवान् पितॄंश्चार्चयित्वा ऋषिलोकं प्रपद्यते ।। ४९ ।।
ऋषिकुल्यामें जाकर स्नान करके पापरहित मानव देवताओं और पितरोंकी पूजा करके ऋषिलोकमें जाता है ।। ४९ ।। यदि तत्र वसेन्मासं शाकाहारो नराधिप । भृगुतुङ्गं समासाद्य वाजिमेधफलं लभेत् ।। ५० ।। नरेश्वर! यदि मनुष्य भृगुतुंगमें जाकर शाकाहारी हो वहाँ एक मासतक निवास करे तो उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। ५० ।। गत्वा वीरप्रमोक्षं च सर्वपापैः प्रमुच्यते । कृत्तिकामघयोश्चैव तीर्थमासाद्य भारत ।। ५१ ।। अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलमाप्नोति मानवः । तत्र संध्यां समासाद्य विद्यातीर्थमनुत्तमम् ।। ५२ ।। उपस्पृश्य च वै विद्यां यत्र तत्रोपपद्यते । महाश्रमे वसेद् रात्रिं सर्वपापप्रमोचने ।। ५३ ।। एककालं निराहारो लोकानावसते शुभान् । वीरप्रमोक्षतीर्थमें जाकर मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। भारत! कृत्तिका और मघाके तीर्थमें जाकर मानव अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञोंका फल पाता है। वहीं प्रातः-संध्याके समय परम उत्तम विद्यातीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य जहाँ-कहीं भी विद्या प्राप्त कर लेता है। जो सब पापोंसे छुड़ानेवाले महाश्रमतीर्थमें एक समय उपवास करके एक रात वहीं निवास करता है, उसे शुभ लोकोंकी प्राप्ति होती है ।। ५१-५३ १/२ ।। षष्ठकालोपवासेन मासमुष्य महालये ।। ५४ ।। सर्वपापविशुद्धात्मा विन्देद् बहुसुवर्णकम् । दशापरान् दश पूर्वान् नरानुद्धरते कुलम् ।। ५५ ।। जो छठे समय उपवासपूर्वक एक मासतक महालयतीर्थमें निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो प्रचुर सुवर्णराशि प्राप्त करता है। साथ ही दस पहलेकी और दस बादकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ।। अथ वेतसिकां गत्वा पितामहनिषेविताम् । अश्वमेधमवाप्नोति गच्छेद्दौशनसीं गतिम् ।। ५६ ।। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा सेवित वेतसिकातीर्थमें जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और शुक्राचार्यके लोकमें जाता है ।। ५६ ।। अथ सुन्दरिकातीर्थं प्राप्य सिद्धनिषेवितम् । रूपस्य भागी भवति दृष्टमेतत् पुरातनैः ।। ५७ ।। तदनन्तर सिद्धसेवित सुन्दरिकातीर्थमें जाकर मनुष्य रूपका भागी होता है, यह बात प्राचीन ऋषियोंने देखी है ।। ५७ ।। ततो वै ब्राह्मणीं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ ५८ ॥ इसके बाद इन्द्रियसंयम और ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक ब्राह्मणीतीर्थमें जानेसे मनुष्य कमलके समान कान्तिवाले विमानद्वारा ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ ५८ ॥ ततस्तु नैमिषं गच्छेत् पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । तत्र नित्यं वसति ब्रह्मा देवगणैः सह ॥ ५९ ॥ तदनन्तर सिद्धसेवित पुण्यमय नैमिष (नैमिषारण्य)-तीर्थमें जाय। वहाँ देवताओंके साथ ब्रह्माजी नित्य निवास करते हैं ॥ ५९ ॥ नैमिषं मृगयानस्य पापस्यार्धं प्रणश्यति । प्रविष्टमात्रस्तु नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ६० ॥ नैमिषकी खोज करनेवाले पुरुषका आधा पाप उसी समय नष्ट हो जाता है और उसमें प्रवेश करते ही वह सारे पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ६० ॥ तत्र मासं वसेद् धीरो नैमिषे तीर्थतत्परः । पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि नैमिषे ॥ ६१ ॥ धीर पुरुष तीर्थसेवनमें तत्पर हो एक मासतक नैमिषमें निवास करे। पृथ्वीमें जितने तीर्थ हैं, वे सभी नैमिषमें विद्यमान हैं ॥ ६१ ॥ कृताभिषेकस्तत्रैव नियतो नियताशनः । गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥ ६२ ॥ भारत! जो वहाँ स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करता है, वह गोमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ६२ ॥ पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्तम । यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपरायणः ॥ ६३ ॥ स मोदेत् सर्वलोकेषु एवमाहुर्मनीषिणः । नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम ॥ ६४ ॥ भरतश्रेष्ठ! अपने कुलकी सात पीढ़ियोंका भी वह उद्धार कर देता है। जो नैमिषमें उपवासपूर्वक प्राणत्याग करता है, वह सब लोकोंमें आनन्दका अनुभव करता है; ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। नृपश्रेष्ठ! नैमिषतीर्थ नित्य, पवित्र और पुण्यजनक है ॥ ६३-६४ ॥ गङ्गोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत् सदा ॥ ६५ ॥ गंगोद्भेदतीर्थमें जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और सदाके लिये ब्रह्मभूत हो जाता है ॥ ६५ ॥ सरस्वतीं समासाद्य तर्पयेत् पितृदेवताः । सारस्वतेषु लोकेषु मोदते नात्र संशयः ॥ ६६ ॥
सरस्वतीतीर्थमें जाकर देवता और पितरोंका तर्पण करे। इससे तीर्थयात्री सारस्वतलोकोंमें जाकर आनन्दका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है॥ ६६॥
ततश्च बाहुदां गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः।
तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते॥ ६७॥
देवसत्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति कौरव।
तदनन्तर बाहुदातीर्थमें जाय और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ एक रात उपवास करे; इससे वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। कुरुनन्दन! उसे देवसत्रयज्ञका भी फल प्राप्त होता है॥ ६७ ½॥
ततः क्षीरवतीं गच्छेत् पुण्यां पुण्यतरैर्वृताम्॥ ६८॥
पितृदेवार्चनपरो वाजपेयमवाप्नुयात्।
वहाँसे क्षीरवती नामक पुण्यतीर्थमें जाय, जो अत्यन्त पुण्यात्मा पुरुषोंसे भरी हुई है। वहाँ स्नान करके देवता और पितरोंके पूजनमें लगा हुआ मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता है॥ ६८ ½॥
विमलाशोकमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः॥ ६९॥
तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते।
वहीं विमलाशोक नामक उत्तम तीर्थ है, वहाँ जाकर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो एक रात निवास करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥
गोप्रतारं ततो गच्छेत् सरय्वास्तीर्थमुत्तमम्॥ ७०॥
यत्र रामो गतः स्वर्गं सभृत्यबलवाहनः।
स च वीरो महाराज तस्य तीर्थस्य तेजसा॥ ७१॥
वहाँसे सरयूके उत्तम तीर्थ गोप्रतारमें जाय। महाराज! वहाँ अपने सेवकों, सैनिकों और वाहनोंके साथ गोते लगाकर उस तीर्थके प्रभावसे वे वीर श्रीरामचन्द्रजी अपने नित्यधामको पधारे थे॥ ७०-७१॥
रामस्य च प्रसादेन व्यवसायाच्च भारत।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा गोप्रतारे नराधिप॥ ७२॥
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते।
भरतनन्दन! नरेश्वर! उस सरयूके गोप्रतारतीर्थमें स्नान करके मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा और उद्योगसे सब पापोंसे शुद्ध होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है॥
रामतीर्थे नरः स्नात्वा गोमत्यां कुरुनन्दन॥ ७३॥
अश्वमेधमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः।
कुरुनन्दन! गोमतीके रामतीर्थमें स्नान करके मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलको पवित्र कर देता है॥ ७३ ½॥
शतसाहस्रकं तीर्थं तत्रैव भरतर्षभ॥ ७४॥
तत्रोपस्पर्शनं कृत्वा नियतो नियताशनः । गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नोति भरतर्षभ ॥ ७५ ॥ भरतकुलभूषण! वहीं शतसाहस्रकतीर्थ है। उसमें स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करते हुए मनुष्य सहस्र गोदानका पुण्यफल प्राप्त करता है ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र भर्तृस्थानमनुत्तमम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ७६ ॥ राजेन्द्र! वहाँसे परम उत्तम भर्तृस्थानको जाय। वहाँ जानेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥ कोटितीर्थे नरः स्नात्वा अर्चयित्वा गुहं नृप । गोसहस्रफलं विद्यात् तेजस्वी च भवेन्नरः ॥ ७७ ॥ राजन्! मनुष्य कोटितीर्थमें स्नान करके कार्तिकेयजीका पूजन करनेसे सहस्र गोदानका फल पाता और तेजस्वी होता है ॥ ७७ ॥ ततो वाराणसीं गत्वा अर्चयित्वा वृषध्वजम् । कपिलाह्रदे नरः स्नात्वा राजसूयमवाप्नुयात् ॥ ७८ ॥ तदनन्तर वाराणसी (काशी)-तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करे और कपिलाह्रदमें गोता लगाये; इससे मनुष्यको राजसूययज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥ अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह । दर्शनाद् देवदेवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ ७९ ॥ प्राणानुत्सृज्य तत्रैव मोक्षं प्राप्नोति मानवः । कुरुश्रेष्ठ! अविमुक्त तीर्थमें जाकर तीर्थसेवी मनुष्य देवदेव महादेवजीका दर्शनमात्र करके ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। वहीं प्राणोत्सर्ग करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ७९ १/२ ॥ मार्कण्डेयस्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् ॥ ८० ॥ गोमतीगङ्गयोश्चैव संगमे लोकविश्रुते । अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८१ ॥ राजेन्द्र! गोमती और गंगाके लोकविख्यात संगमके समीप मार्कण्डेयजीका दुर्लभ तीर्थ है। उसमें जाकर मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८०-८१ ॥ ततो गयां समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८२ ॥ तदनन्तर गयातीर्थमें जाकर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८२ ॥ तत्राक्षयवटो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।
तत्र दत्तं पितृभ्यस्तु भवत्यक्षयमुच्यते ॥ ८३ ॥ वहाँ तीनों लोकोंमें विख्यात अक्षयवट है। उनके समीप पितरोंके लिये दिया हुआ सब कुछ अक्षय बताया जाता है ॥ ८३ ॥ महानद्यामुपस्पृश्य तर्पयेत् पितृदेवताः । अक्षयान् प्राप्नुयाल्लोकान् कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८४ ॥ महानदीमें स्नान करके जो देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, वह अक्षय लोकोंको प्राप्त होता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८४ ॥ ततो ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् । ब्रह्मलोकमवाप्नोति प्रभातामेव शर्वरीम् ॥ ८५ ॥ तदनन्तर धर्मारण्यसे सुशोभित ब्रह्मसरोवरकी यात्रा करके वहाँ एक रात प्रातःकालतक निवास करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ ८५ ॥ ब्रह्मणा तत्र सरसि यूपश्रेष्ठः समुच्छ्रितः । यूपं प्रदक्षिणं कृत्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥ ८६ ॥ ब्रह्माजीने उस सरोवरमें एक श्रेष्ठ यूपकी स्थापना की थी। उसकी परिक्रमा करनेसे मानव वाजपेययज्ञका फल पा लेता है ॥ ८६ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र धेनुकं लोकविश्रुतम् । एकरात्रोषितो राजन् प्रयच्छेत् तिलधेनुकाम् ॥ ८७ ॥ सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं व्रजेद् ध्रुवम् । राजेन्द्र! वहाँसे लोकविख्यात धेनुतीर्थमें जाय। महाराज! वहाँ एक रात रहकर तिलकी गौका दान करे।* इससे तीर्थयात्री पुरुष सब पापोंसे शुद्धचित्त हो निश्चय ही सोमलोकमें जाता है ॥ ८७ १/२ ॥ तत्र चिह्नं महत् राजन्नद्यापि सुमहद् भृशम् ॥ ८८ ॥ कपिलायाः सवत्सायाश्चरन्त्याः पर्वते कृतम् । सवत्सायाः पदानि स्म दृश्यन्तेऽद्यापि भारत ॥ ८९ ॥ राजन्! वहाँ एक पर्वतपर चरनेवाली बछड़ेसहित कपिला गौका विशाल चरणचिह्न आज भी अंकित है। भरतनन्दन! बछड़ेसहित उस गौके चरणचिह्न आज भी वहाँ देखे जाते हैं ॥ ८८-८९ ॥ तेषूपस्पृश्य राजेन्द्र पदेषु नृपसत्तम । यत् किंचिदशुभं कर्म तत् प्रणश्यति भारत ॥ ९० ॥ भारत! नृपश्रेष्ठ! राजेन्द्र! उन चरणचिह्नोंका स्पर्श करके मनुष्यका जो कुछ भी अशुभ कर्म शेष रहता है, वह सब नष्ट हो जाता है ॥ ९० ॥ ततो गृध्रवटं गच्छेत् स्थानं देवस्य धीमतः ।
स्नायीत भस्मना तत्र अभिगम्य वृषध्वजम् ॥ ९१ ॥
तदनन्तर परम बुद्धिमान् महादेवजीके गृध्रवट नामक स्थानकी यात्रा करे और वहाँ भगवान् शंकरके समीप जाकर भस्मसे स्नान करे (अपने शरीरमें भस्म लगाये) ॥ ९१ ॥
ब्राह्मणेन भवेच्चीर्णं व्रतं द्वादशवार्षिकम् ।
इतरेषां तु वर्णानां सर्वपापं प्रणश्यति ॥ ९२ ॥
वहाँ यात्रा करनेसे ब्राह्मणको बारह वर्षोंतक व्रतके पालन करनेका फल प्राप्त होता है और अन्य वर्णके लोगोंके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ९२ ॥
उद्यन्तं च ततो गच्छेत् पर्वतं गीतनादितम् ।
सावित्र्यास्तु पदं तत्र दृश्यते भरतर्षभ ॥ ९३ ॥
भरतकुलभूषण! तदनन्तर संगीतकी ध्वनिसे गूँजते हुए उदयगिरिपर जाय। वहाँ सावित्रीका चरणचिह्न आज भी दिखायी देता है ॥ ९३ ॥
तत्र संध्यामुपासीत ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
तेन ह्युपास्ता भवति संध्या द्वादशवार्षिकी ॥ ९४ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण वहाँ संध्योपासना करे। इससे उसके द्वारा बारह वर्षोंतककी संध्योपासना सम्पन्न हो जाती है ॥ ९४ ॥
योनिद्वारं च तत्रैव विश्रुतं भरतर्षभ ।
तत्राभिगम्य मुच्येत पुरुषो योनिसंकटात् ॥ ९५ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहीं विख्यात योनिद्वारतीर्थ है, जहाँ जाकर मनुष्य योनिसंकटसे मुक्त हो जाता है—उसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ९५ ॥
कृष्णशुक्लावुभौ पक्षौ गयायां यो वसेन्नरः ।
पुनात्यासप्तमं राजन् कुलं नास्त्यत्र संशयः ॥ ९६ ॥
राजन्! जो मानव कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षोंमें गयातीर्थमें निवास करता है, वह अपने कुलकी सातवीं पीढ़ींतकको पवित्र कर देता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९६ ॥
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।
यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ ९७ ॥
बहुत-से पुत्रोंकी इच्छा करे। सम्भव है, उनमेंसे एक भी गयामें जाय या अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषका उत्सर्ग ही करे ॥ ९७ ॥
ततः फल्गुं व्रजेद् राजंस्तीर्थसेवी नराधिप ।
अश्वमेधमवाप्नोति सिद्धिं च महतीं व्रजेत् ॥ ९८ ॥
राजन्! नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी मानव फल्गुतीर्थमें जाय। वहाँ जानेसे उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ९८ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र धर्मप्रस्थं समाहितः ।
तत्र धर्मो महाराज नित्यमास्ते युधिष्ठिर ॥ ९९ ॥
महाराज! तदनन्तर एकाग्रचित्त हो मनुष्य धर्मप्रस्थकी यात्रा करे। युधिष्ठिर! वहाँ धर्मराजका नित्य निवास है ॥ ९९ ॥ तत्र कूपोदकं कृत्वा तेन स्नातः शुचिस्तथा। पितॄन् देवांस्तु संतर्प्य मुक्तपापो दिवं व्रजेत् ॥ १०० ॥ वहाँ कुएँका जल लेकर उससे स्नान करके पवित्र हो देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्यके सारे पाप छूट जाते हैं और वह स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १०० ॥ मतङ्गस्याश्रमस्तत्र महर्षेर्भावितात्मनः। तं प्रविश्याश्रमं श्रीमच्छ्रमशोकविनाशनम् ॥ १०१ ॥ गवामयनयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः। धर्मं तत्राभिसंस्पृश्य वाजिमेधमवाप्नुयात् ॥ १०२ ॥ वहीं भावितात्मा महर्षि मतंगका आश्रम है। श्रम और शोकका विनाश करनेवाले उस सुन्दर आश्रममें प्रवेश करनेसे मनुष्य गवामयनयज्ञका फल पाता है। वहाँ धर्मके निकट जा उनके श्रीविग्रहका दर्शन और स्पर्श करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मस्थानमनुत्तमम्। तत्राभिगम्य राजेन्द्र ब्रह्माणं पुरुषर्षभ ॥ १०३ ॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः। राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम ब्रह्मस्थानको जाय। महाराज! पुरुषोत्तम! वहाँ ब्रह्माजीके समीप जाकर मनुष्य राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है ॥ १०३ १/२ ॥ ततो राजगृहं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ॥ १०४ ॥ उपस्पृश्य ततस्तत्र कक्षीवानिव मोदते। यक्षिण्या नैत्यकं तत्र प्राश्नीत पुरुषः शुचिः ॥ १०५ ॥ यक्षिण्यास्तु प्रसादेन मुच्यते ब्रह्महत्यया। नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी मनुष्य राजगृहको जाय। वहाँ स्नान करके वह कक्षीवान्के समान प्रसन्न होता है। उस तीर्थमें पवित्र होकर पुरुष यक्षिणीदेवीका नैवेद्य भक्षण करे। यक्षिणीके प्रसादसे वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ॥ १०४-१०५ १/२ ॥ मणिनागं ततो गत्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १०६ ॥ तदनन्तर मणिनागतीर्थमें जाकर तीर्थयात्री सहस्र गोदानका फल प्राप्त करे ॥ १०६ ॥ तैर्थिकं भुञ्जते यस्तु मणिनागस्य भारत। दष्टस्याशीविषेणापि न तस्य क्रमते विषम् ॥ १०७ ॥ तत्रोष्य जननीमेकां गोसहस्रफलं लभेत्। भरतनन्दन! जो मणिनागका तीर्थप्रसाद (नैवेद्य, चरणामृत आदि)-का भक्षण करता है, उसे साँप काट ले तो भी उसपर विषका असर नहीं होता। वहाँ एक रात रहनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १०७ १/२ ॥
ततो गच्छेत ब्रह्मर्षेर्गौतमस्य वनं प्रियम् ।। १०८ ।। अहल्याया हृदे स्नात्वा व्रजेत परमां गतिम् । अभिगम्याश्रमं राजन् विन्दते श्रियमात्मनः ।। १०९ ।। तत्पश्चात् ब्रह्मर्षि गौतमके प्रिय वनकी यात्रा करे। वहाँ अहल्याकुण्डमें स्नान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है। राजन्! गौतमके आश्रममें जाकर मनुष्य अपने लिये लक्ष्मी प्राप्त कर लेता है ।। १०८-१०९ ।। तत्रोदपानं धर्मज्ञ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राभिषेकं कृत्वा तु वाजिमेधमवाप्नुयात् ।। ११० ।। धर्मज्ञ! वहाँ एक त्रिभुवनविख्यात कूप है, जिसमें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ।। ११० ।। जनकस्य तु राजर्षेः कूपस्त्रिदशपूजितः । तत्राभिषेकं कृत्वा तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।। १११ ।। राजर्षि जनकका एक कूप है, जिसका देवता भी सम्मान करते हैं। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है ।। १११ ।। ततो विनशनं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनम् । वाजपेयमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ।। ११२ ।। तत्पश्चात् सब पापोंसे छुड़ानेवाले विनशनतीर्थको जाय, जिससे मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और सोमलोकको जाता है ।। ११२ ।। गण्डकीं तु समासाद्य सर्वतीर्थजलोद्भवाम् । वाजपेयमवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ।। ११३ ।। गण्डकी नदी सब तीर्थोंके जलसे उत्पन्न हुई है। वहाँ जाकर तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और सूर्यलोकमें जाता है ।। ११३ ।। ततो विशल्यामासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् । अग्निष्टोममवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ११४ ।। तत्पश्चात् त्रिलोकीमें विख्यात विशल्या नदीके तटपर जाकर स्नान करे। इससे वह अग्निष्टोमयनका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ११४ ।। ततोऽधिवङ्गं धर्मज्ञ समाविश्य तपोवनम् । गुह्यकेषु महाराज मोदते नात्र संशयः ।। ११५ ।। धर्मज्ञ महाराज! तदनन्तर वंगदेशीय तपोवनमें प्रवेश करके तीर्थयात्री इस शरीरके अन्तमें गुह्यकलोकमें जाकर निःसंदेह आनन्दका भागी होता है ।। ११५ ।। कम्पनां तु समासाद्य नदीं सिद्धनिषेविताम् । पुण्डरीकमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ११६ ।।