भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 620, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 620

तत्रोपस्पर्शनं कृत्वा नियतो नियताशनः । गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नोति भरतर्षभ ॥ ७५ ॥ भरतकुलभूषण! वहीं शतसाहस्रकतीर्थ है। उसमें स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करते हुए मनुष्य सहस्र गोदानका पुण्यफल प्राप्त करता है ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र भर्तृस्थानमनुत्तमम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ७६ ॥ राजेन्द्र! वहाँसे परम उत्तम भर्तृस्थानको जाय। वहाँ जानेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥ कोटितीर्थे नरः स्नात्वा अर्चयित्वा गुहं नृप । गोसहस्रफलं विद्यात् तेजस्वी च भवेन्नरः ॥ ७७ ॥ राजन्! मनुष्य कोटितीर्थमें स्नान करके कार्तिकेयजीका पूजन करनेसे सहस्र गोदानका फल पाता और तेजस्वी होता है ॥ ७७ ॥ ततो वाराणसीं गत्वा अर्चयित्वा वृषध्वजम् । कपिलाह्रदे नरः स्नात्वा राजसूयमवाप्नुयात् ॥ ७८ ॥ तदनन्तर वाराणसी (काशी)-तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करे और कपिलाह्रदमें गोता लगाये; इससे मनुष्यको राजसूययज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥ अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह । दर्शनाद् देवदेवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ ७९ ॥ प्राणानुत्सृज्य तत्रैव मोक्षं प्राप्नोति मानवः । कुरुश्रेष्ठ! अविमुक्त तीर्थमें जाकर तीर्थसेवी मनुष्य देवदेव महादेवजीका दर्शनमात्र करके ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। वहीं प्राणोत्सर्ग करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ७९ १/२ ॥ मार्कण्डेयस्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् ॥ ८० ॥ गोमतीगङ्गयोश्चैव संगमे लोकविश्रुते । अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८१ ॥ राजेन्द्र! गोमती और गंगाके लोकविख्यात संगमके समीप मार्कण्डेयजीका दुर्लभ तीर्थ है। उसमें जाकर मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८०-८१ ॥ ततो गयां समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८२ ॥ तदनन्तर गयातीर्थमें जाकर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८२ ॥ तत्राक्षयवटो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।

महाभारत (खंड २) - वन पर्व · पृष्ठ 620, कुल 2580 में से · BharatKosha