महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसरस्वतीतीर्थमें जाकर देवता और पितरोंका तर्पण करे। इससे तीर्थयात्री सारस्वतलोकोंमें जाकर आनन्दका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है॥ ६६॥
ततश्च बाहुदां गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः।
तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते॥ ६७॥
देवसत्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति कौरव।
तदनन्तर बाहुदातीर्थमें जाय और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ एक रात उपवास करे; इससे वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। कुरुनन्दन! उसे देवसत्रयज्ञका भी फल प्राप्त होता है॥ ६७ ½॥
ततः क्षीरवतीं गच्छेत् पुण्यां पुण्यतरैर्वृताम्॥ ६८॥
पितृदेवार्चनपरो वाजपेयमवाप्नुयात्।
वहाँसे क्षीरवती नामक पुण्यतीर्थमें जाय, जो अत्यन्त पुण्यात्मा पुरुषोंसे भरी हुई है। वहाँ स्नान करके देवता और पितरोंके पूजनमें लगा हुआ मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता है॥ ६८ ½॥
विमलाशोकमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः॥ ६९॥
तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते।
वहीं विमलाशोक नामक उत्तम तीर्थ है, वहाँ जाकर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो एक रात निवास करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥
गोप्रतारं ततो गच्छेत् सरय्वास्तीर्थमुत्तमम्॥ ७०॥
यत्र रामो गतः स्वर्गं सभृत्यबलवाहनः।
स च वीरो महाराज तस्य तीर्थस्य तेजसा॥ ७१॥
वहाँसे सरयूके उत्तम तीर्थ गोप्रतारमें जाय। महाराज! वहाँ अपने सेवकों, सैनिकों और वाहनोंके साथ गोते लगाकर उस तीर्थके प्रभावसे वे वीर श्रीरामचन्द्रजी अपने नित्यधामको पधारे थे॥ ७०-७१॥
रामस्य च प्रसादेन व्यवसायाच्च भारत।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा गोप्रतारे नराधिप॥ ७२॥
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते।
भरतनन्दन! नरेश्वर! उस सरयूके गोप्रतारतीर्थमें स्नान करके मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा और उद्योगसे सब पापोंसे शुद्ध होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है॥
रामतीर्थे नरः स्नात्वा गोमत्यां कुरुनन्दन॥ ७३॥
अश्वमेधमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः।
कुरुनन्दन! गोमतीके रामतीर्थमें स्नान करके मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलको पवित्र कर देता है॥ ७३ ½॥
शतसाहस्रकं तीर्थं तत्रैव भरतर्षभ॥ ७४॥