भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 618, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 618

पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ ५८ ॥ इसके बाद इन्द्रियसंयम और ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक ब्राह्मणीतीर्थमें जानेसे मनुष्य कमलके समान कान्तिवाले विमानद्वारा ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ ५८ ॥ ततस्तु नैमिषं गच्छेत् पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । तत्र नित्यं वसति ब्रह्मा देवगणैः सह ॥ ५९ ॥ तदनन्तर सिद्धसेवित पुण्यमय नैमिष (नैमिषारण्य)-तीर्थमें जाय। वहाँ देवताओंके साथ ब्रह्माजी नित्य निवास करते हैं ॥ ५९ ॥ नैमिषं मृगयानस्य पापस्यार्धं प्रणश्यति । प्रविष्टमात्रस्तु नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ६० ॥ नैमिषकी खोज करनेवाले पुरुषका आधा पाप उसी समय नष्ट हो जाता है और उसमें प्रवेश करते ही वह सारे पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ६० ॥ तत्र मासं वसेद् धीरो नैमिषे तीर्थतत्परः । पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि नैमिषे ॥ ६१ ॥ धीर पुरुष तीर्थसेवनमें तत्पर हो एक मासतक नैमिषमें निवास करे। पृथ्वीमें जितने तीर्थ हैं, वे सभी नैमिषमें विद्यमान हैं ॥ ६१ ॥ कृताभिषेकस्तत्रैव नियतो नियताशनः । गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥ ६२ ॥ भारत! जो वहाँ स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करता है, वह गोमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ६२ ॥ पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्तम । यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपरायणः ॥ ६३ ॥ स मोदेत् सर्वलोकेषु एवमाहुर्मनीषिणः । नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम ॥ ६४ ॥ भरतश्रेष्ठ! अपने कुलकी सात पीढ़ियोंका भी वह उद्धार कर देता है। जो नैमिषमें उपवासपूर्वक प्राणत्याग करता है, वह सब लोकोंमें आनन्दका अनुभव करता है; ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। नृपश्रेष्ठ! नैमिषतीर्थ नित्य, पवित्र और पुण्यजनक है ॥ ६३-६४ ॥ गङ्गोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत् सदा ॥ ६५ ॥ गंगोद्भेदतीर्थमें जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और सदाके लिये ब्रह्मभूत हो जाता है ॥ ६५ ॥ सरस्वतीं समासाद्य तर्पयेत् पितृदेवताः । सारस्वतेषु लोकेषु मोदते नात्र संशयः ॥ ६६ ॥