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महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पद्मवर्णेन यानेन ब्रह्मलोकं प्रपद्यते ॥ ५८ ॥ इसके बाद इन्द्रियसंयम और ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक ब्राह्मणीतीर्थमें जानेसे मनुष्य कमलके समान कान्तिवाले विमानद्वारा ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ ५८ ॥ ततस्तु नैमिषं गच्छेत् पुण्यं सिद्धनिषेवितम् । तत्र नित्यं वसति ब्रह्मा देवगणैः सह ॥ ५९ ॥ तदनन्तर सिद्धसेवित पुण्यमय नैमिष (नैमिषारण्य)-तीर्थमें जाय। वहाँ देवताओंके साथ ब्रह्माजी नित्य निवास करते हैं ॥ ५९ ॥ नैमिषं मृगयानस्य पापस्यार्धं प्रणश्यति । प्रविष्टमात्रस्तु नरः सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ६० ॥ नैमिषकी खोज करनेवाले पुरुषका आधा पाप उसी समय नष्ट हो जाता है और उसमें प्रवेश करते ही वह सारे पापोंसे छुटकारा पा जाता है ॥ ६० ॥ तत्र मासं वसेद् धीरो नैमिषे तीर्थतत्परः । पृथिव्यां यानि तीर्थानि तानि तीर्थानि नैमिषे ॥ ६१ ॥ धीर पुरुष तीर्थसेवनमें तत्पर हो एक मासतक नैमिषमें निवास करे। पृथ्वीमें जितने तीर्थ हैं, वे सभी नैमिषमें विद्यमान हैं ॥ ६१ ॥ कृताभिषेकस्तत्रैव नियतो नियताशनः । गवां मेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥ ६२ ॥ भारत! जो वहाँ स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करता है, वह गोमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ६२ ॥ पुनात्यासप्तमं चैव कुलं भरतसत्तम । यस्त्यजेन्नैमिषे प्राणानुपवासपरायणः ॥ ६३ ॥ स मोदेत् सर्वलोकेषु एवमाहुर्मनीषिणः । नित्यं मेध्यं च पुण्यं च नैमिषं नृपसत्तम ॥ ६४ ॥ भरतश्रेष्ठ! अपने कुलकी सात पीढ़ियोंका भी वह उद्धार कर देता है। जो नैमिषमें उपवासपूर्वक प्राणत्याग करता है, वह सब लोकोंमें आनन्दका अनुभव करता है; ऐसा मनीषी पुरुषोंका कथन है। नृपश्रेष्ठ! नैमिषतीर्थ नित्य, पवित्र और पुण्यजनक है ॥ ६३-६४ ॥ गङ्गोद्भेदं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः । वाजपेयमवाप्नोति ब्रह्मभूतो भवेत् सदा ॥ ६५ ॥ गंगोद्भेदतीर्थमें जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और सदाके लिये ब्रह्मभूत हो जाता है ॥ ६५ ॥ सरस्वतीं समासाद्य तर्पयेत् पितृदेवताः । सारस्वतेषु लोकेषु मोदते नात्र संशयः ॥ ६६ ॥

सरस्वतीतीर्थमें जाकर देवता और पितरोंका तर्पण करे। इससे तीर्थयात्री सारस्वतलोकोंमें जाकर आनन्दका भागी होता है; इसमें संशय नहीं है॥ ६६॥

ततश्च बाहुदां गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः।
तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते॥ ६७॥
देवसत्रस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति कौरव।
तदनन्तर बाहुदातीर्थमें जाय और ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ एक रात उपवास करे; इससे वह स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। कुरुनन्दन! उसे देवसत्रयज्ञका भी फल प्राप्त होता है॥ ६७ ½॥

ततः क्षीरवतीं गच्छेत् पुण्यां पुण्यतरैर्वृताम्॥ ६८॥
पितृदेवार्चनपरो वाजपेयमवाप्नुयात्।
वहाँसे क्षीरवती नामक पुण्यतीर्थमें जाय, जो अत्यन्त पुण्यात्मा पुरुषोंसे भरी हुई है। वहाँ स्नान करके देवता और पितरोंके पूजनमें लगा हुआ मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता है॥ ६८ ½॥

विमलाशोकमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः॥ ६९॥
तत्रोष्य रजनीमेकां स्वर्गलोके महीयते।
वहीं विमलाशोक नामक उत्तम तीर्थ है, वहाँ जाकर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो एक रात निवास करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है॥

गोप्रतारं ततो गच्छेत् सरय्वास्तीर्थमुत्तमम्॥ ७०॥
यत्र रामो गतः स्वर्गं सभृत्यबलवाहनः।
स च वीरो महाराज तस्य तीर्थस्य तेजसा॥ ७१॥
वहाँसे सरयूके उत्तम तीर्थ गोप्रतारमें जाय। महाराज! वहाँ अपने सेवकों, सैनिकों और वाहनोंके साथ गोते लगाकर उस तीर्थके प्रभावसे वे वीर श्रीरामचन्द्रजी अपने नित्यधामको पधारे थे॥ ७०-७१॥

रामस्य च प्रसादेन व्यवसायाच्च भारत।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा गोप्रतारे नराधिप॥ ७२॥
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते।
भरतनन्दन! नरेश्वर! उस सरयूके गोप्रतारतीर्थमें स्नान करके मनुष्य श्रीरामचन्द्रजीकी कृपा और उद्योगसे सब पापोंसे शुद्ध होकर स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है॥

रामतीर्थे नरः स्नात्वा गोमत्यां कुरुनन्दन॥ ७३॥
अश्वमेधमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः।
कुरुनन्दन! गोमतीके रामतीर्थमें स्नान करके मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलको पवित्र कर देता है॥ ७३ ½॥

शतसाहस्रकं तीर्थं तत्रैव भरतर्षभ॥ ७४॥

तत्रोपस्पर्शनं कृत्वा नियतो नियताशनः । गोसहस्रफलं पुण्यं प्राप्नोति भरतर्षभ ॥ ७५ ॥ भरतकुलभूषण! वहीं शतसाहस्रकतीर्थ है। उसमें स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करते हुए मनुष्य सहस्र गोदानका पुण्यफल प्राप्त करता है ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र भर्तृस्थानमनुत्तमम् । अश्वमेधस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ ७६ ॥ राजेन्द्र! वहाँसे परम उत्तम भर्तृस्थानको जाय। वहाँ जानेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ७६ ॥ कोटितीर्थे नरः स्नात्वा अर्चयित्वा गुहं नृप । गोसहस्रफलं विद्यात् तेजस्वी च भवेन्नरः ॥ ७७ ॥ राजन्! मनुष्य कोटितीर्थमें स्नान करके कार्तिकेयजीका पूजन करनेसे सहस्र गोदानका फल पाता और तेजस्वी होता है ॥ ७७ ॥ ततो वाराणसीं गत्वा अर्चयित्वा वृषध्वजम् । कपिलाह्रदे नरः स्नात्वा राजसूयमवाप्नुयात् ॥ ७८ ॥ तदनन्तर वाराणसी (काशी)-तीर्थमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा करे और कपिलाह्रदमें गोता लगाये; इससे मनुष्यको राजसूययज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ७८ ॥ अविमुक्तं समासाद्य तीर्थसेवी कुरूद्वह । दर्शनाद् देवदेवस्य मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ ७९ ॥ प्राणानुत्सृज्य तत्रैव मोक्षं प्राप्नोति मानवः । कुरुश्रेष्ठ! अविमुक्त तीर्थमें जाकर तीर्थसेवी मनुष्य देवदेव महादेवजीका दर्शनमात्र करके ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। वहीं प्राणोत्सर्ग करके मनुष्य मोक्ष प्राप्त कर लेता है ॥ ७९ १/२ ॥ मार्कण्डेयस्य राजेन्द्र तीर्थमासाद्य दुर्लभम् ॥ ८० ॥ गोमतीगङ्गयोश्चैव संगमे लोकविश्रुते । अग्निष्टोममवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८१ ॥ राजेन्द्र! गोमती और गंगाके लोकविख्यात संगमके समीप मार्कण्डेयजीका दुर्लभ तीर्थ है। उसमें जाकर मनुष्य अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८०-८१ ॥ ततो गयां समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८२ ॥ तदनन्तर गयातीर्थमें जाकर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८२ ॥ तत्राक्षयवटो नाम त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ।

तत्र दत्तं पितृभ्यस्तु भवत्यक्षयमुच्यते ॥ ८३ ॥ वहाँ तीनों लोकोंमें विख्यात अक्षयवट है। उनके समीप पितरोंके लिये दिया हुआ सब कुछ अक्षय बताया जाता है ॥ ८३ ॥ महानद्यामुपस्पृश्य तर्पयेत् पितृदेवताः । अक्षयान् प्राप्नुयाल्लोकान् कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ८४ ॥ महानदीमें स्नान करके जो देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, वह अक्षय लोकोंको प्राप्त होता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ८४ ॥ ततो ब्रह्मसरो गत्वा धर्मारण्योपशोभितम् । ब्रह्मलोकमवाप्नोति प्रभातामेव शर्वरीम् ॥ ८५ ॥ तदनन्तर धर्मारण्यसे सुशोभित ब्रह्मसरोवरकी यात्रा करके वहाँ एक रात प्रातःकालतक निवास करनेसे मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ ८५ ॥ ब्रह्मणा तत्र सरसि यूपश्रेष्ठः समुच्छ्रितः । यूपं प्रदक्षिणं कृत्वा वाजपेयफलं लभेत् ॥ ८६ ॥ ब्रह्माजीने उस सरोवरमें एक श्रेष्ठ यूपकी स्थापना की थी। उसकी परिक्रमा करनेसे मानव वाजपेययज्ञका फल पा लेता है ॥ ८६ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र धेनुकं लोकविश्रुतम् । एकरात्रोषितो राजन् प्रयच्छेत् तिलधेनुकाम् ॥ ८७ ॥ सर्वपापविशुद्धात्मा सोमलोकं व्रजेद् ध्रुवम् । राजेन्द्र! वहाँसे लोकविख्यात धेनुतीर्थमें जाय। महाराज! वहाँ एक रात रहकर तिलकी गौका दान करे।* इससे तीर्थयात्री पुरुष सब पापोंसे शुद्धचित्त हो निश्चय ही सोमलोकमें जाता है ॥ ८७ १/२ ॥ तत्र चिह्नं महत् राजन्नद्यापि सुमहद् भृशम् ॥ ८८ ॥ कपिलायाः सवत्सायाश्चरन्त्याः पर्वते कृतम् । सवत्सायाः पदानि स्म दृश्यन्तेऽद्यापि भारत ॥ ८९ ॥ राजन्! वहाँ एक पर्वतपर चरनेवाली बछड़ेसहित कपिला गौका विशाल चरणचिह्न आज भी अंकित है। भरतनन्दन! बछड़ेसहित उस गौके चरणचिह्न आज भी वहाँ देखे जाते हैं ॥ ८८-८९ ॥ तेषूपस्पृश्य राजेन्द्र पदेषु नृपसत्तम । यत् किंचिदशुभं कर्म तत् प्रणश्यति भारत ॥ ९० ॥ भारत! नृपश्रेष्ठ! राजेन्द्र! उन चरणचिह्नोंका स्पर्श करके मनुष्यका जो कुछ भी अशुभ कर्म शेष रहता है, वह सब नष्ट हो जाता है ॥ ९० ॥ ततो गृध्रवटं गच्छेत् स्थानं देवस्य धीमतः ।

स्नायीत भस्मना तत्र अभिगम्य वृषध्वजम् ॥ ९१ ॥ तदनन्तर परम बुद्धिमान् महादेवजीके गृध्रवट नामक स्थानकी यात्रा करे और वहाँ भगवान् शंकरके समीप जाकर भस्मसे स्नान करे (अपने शरीरमें भस्म लगाये) ॥ ९१ ॥
ब्राह्मणेन भवेच्चीर्णं व्रतं द्वादशवार्षिकम् ।
इतरेषां तु वर्णानां सर्वपापं प्रणश्यति ॥ ९२ ॥
वहाँ यात्रा करनेसे ब्राह्मणको बारह वर्षोंतक व्रतके पालन करनेका फल प्राप्त होता है और अन्य वर्णके लोगोंके सारे पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ९२ ॥
उद्यन्तं च ततो गच्छेत् पर्वतं गीतनादितम् ।
सावित्र्यास्तु पदं तत्र दृश्यते भरतर्षभ ॥ ९३ ॥
भरतकुलभूषण! तदनन्तर संगीतकी ध्वनिसे गूँजते हुए उदयगिरिपर जाय। वहाँ सावित्रीका चरणचिह्न आज भी दिखायी देता है ॥ ९३ ॥
तत्र संध्यामुपासीत ब्राह्मणः संशितव्रतः ।
तेन ह्युपास्ता भवति संध्या द्वादशवार्षिकी ॥ ९४ ॥
उत्तम व्रतका पालन करनेवाला ब्राह्मण वहाँ संध्योपासना करे। इससे उसके द्वारा बारह वर्षोंतककी संध्योपासना सम्पन्न हो जाती है ॥ ९४ ॥
योनिद्वारं च तत्रैव विश्रुतं भरतर्षभ ।
तत्राभिगम्य मुच्येत पुरुषो योनिसंकटात् ॥ ९५ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहीं विख्यात योनिद्वारतीर्थ है, जहाँ जाकर मनुष्य योनिसंकटसे मुक्त हो जाता है—उसका पुनर्जन्म नहीं होता ॥ ९५ ॥
कृष्णशुक्लावुभौ पक्षौ गयायां यो वसेन्नरः ।
पुनात्यासप्तमं राजन् कुलं नास्त्यत्र संशयः ॥ ९६ ॥
राजन्! जो मानव कृष्ण और शुक्ल दोनों पक्षोंमें गयातीर्थमें निवास करता है, वह अपने कुलकी सातवीं पीढ़ींतकको पवित्र कर देता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ९६ ॥
एष्टव्या बहवः पुत्रा यद्येकोऽपि गयां व्रजेत् ।
यजेत वाश्वमेधेन नीलं वा वृषमुत्सृजेत् ॥ ९७ ॥
बहुत-से पुत्रोंकी इच्छा करे। सम्भव है, उनमेंसे एक भी गयामें जाय या अश्वमेधयज्ञ करे अथवा नील वृषका उत्सर्ग ही करे ॥ ९७ ॥
ततः फल्गुं व्रजेद् राजंस्तीर्थसेवी नराधिप ।
अश्वमेधमवाप्नोति सिद्धिं च महतीं व्रजेत् ॥ ९८ ॥
राजन्! नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी मानव फल्गुतीर्थमें जाय। वहाँ जानेसे उसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है और बहुत बड़ी सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ९८ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र धर्मप्रस्थं समाहितः ।
तत्र धर्मो महाराज नित्यमास्ते युधिष्ठिर ॥ ९९ ॥

महाराज! तदनन्तर एकाग्रचित्त हो मनुष्य धर्मप्रस्थकी यात्रा करे। युधिष्ठिर! वहाँ धर्मराजका नित्य निवास है ॥ ९९ ॥ तत्र कूपोदकं कृत्वा तेन स्नातः शुचिस्तथा। पितॄन् देवांस्तु संतर्प्य मुक्तपापो दिवं व्रजेत् ॥ १०० ॥ वहाँ कुएँका जल लेकर उससे स्नान करके पवित्र हो देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्यके सारे पाप छूट जाते हैं और वह स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १०० ॥ मतङ्गस्याश्रमस्तत्र महर्षेर्भावितात्मनः। तं प्रविश्याश्रमं श्रीमच्छ्रमशोकविनाशनम् ॥ १०१ ॥ गवामयनयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः। धर्मं तत्राभिसंस्पृश्य वाजिमेधमवाप्नुयात् ॥ १०२ ॥ वहीं भावितात्मा महर्षि मतंगका आश्रम है। श्रम और शोकका विनाश करनेवाले उस सुन्दर आश्रममें प्रवेश करनेसे मनुष्य गवामयनयज्ञका फल पाता है। वहाँ धर्मके निकट जा उनके श्रीविग्रहका दर्शन और स्पर्श करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मस्थानमनुत्तमम्। तत्राभिगम्य राजेन्द्र ब्रह्माणं पुरुषर्षभ ॥ १०३ ॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः। राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम ब्रह्मस्थानको जाय। महाराज! पुरुषोत्तम! वहाँ ब्रह्माजीके समीप जाकर मनुष्य राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है ॥ १०३ १/२ ॥ ततो राजगृहं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ॥ १०४ ॥ उपस्पृश्य ततस्तत्र कक्षीवानिव मोदते। यक्षिण्या नैत्यकं तत्र प्राश्नीत पुरुषः शुचिः ॥ १०५ ॥ यक्षिण्यास्तु प्रसादेन मुच्यते ब्रह्महत्यया। नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी मनुष्य राजगृहको जाय। वहाँ स्नान करके वह कक्षीवान्‌के समान प्रसन्न होता है। उस तीर्थमें पवित्र होकर पुरुष यक्षिणीदेवीका नैवेद्य भक्षण करे। यक्षिणीके प्रसादसे वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ॥ १०४-१०५ १/२ ॥ मणिनागं ततो गत्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १०६ ॥ तदनन्तर मणिनागतीर्थमें जाकर तीर्थयात्री सहस्र गोदानका फल प्राप्त करे ॥ १०६ ॥ तैर्थिकं भुञ्जते यस्तु मणिनागस्य भारत। दष्टस्याशीविषेणापि न तस्य क्रमते विषम् ॥ १०७ ॥ तत्रोष्य जननीमेकां गोसहस्रफलं लभेत्। भरतनन्दन! जो मणिनागका तीर्थप्रसाद (नैवेद्य, चरणामृत आदि)-का भक्षण करता है, उसे साँप काट ले तो भी उसपर विषका असर नहीं होता। वहाँ एक रात रहनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १०७ १/२ ॥

ततो गच्छेत ब्रह्मर्षेर्गौतमस्य वनं प्रियम् ।। १०८ ।। अहल्याया हृदे स्नात्वा व्रजेत परमां गतिम् । अभिगम्याश्रमं राजन् विन्दते श्रियमात्मनः ।। १०९ ।। तत्पश्चात् ब्रह्मर्षि गौतमके प्रिय वनकी यात्रा करे। वहाँ अहल्याकुण्डमें स्नान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है। राजन्! गौतमके आश्रममें जाकर मनुष्य अपने लिये लक्ष्मी प्राप्त कर लेता है ।। १०८-१०९ ।। तत्रोदपानं धर्मज्ञ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राभिषेकं कृत्वा तु वाजिमेधमवाप्नुयात् ।। ११० ।। धर्मज्ञ! वहाँ एक त्रिभुवनविख्यात कूप है, जिसमें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ।। ११० ।। जनकस्य तु राजर्षेः कूपस्त्रिदशपूजितः । तत्राभिषेकं कृत्वा तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।। १११ ।। राजर्षि जनकका एक कूप है, जिसका देवता भी सम्मान करते हैं। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है ।। १११ ।। ततो विनशनं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनम् । वाजपेयमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ।। ११२ ।। तत्पश्चात् सब पापोंसे छुड़ानेवाले विनशनतीर्थको जाय, जिससे मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और सोमलोकको जाता है ।। ११२ ।। गण्डकीं तु समासाद्य सर्वतीर्थजलोद्भवाम् । वाजपेयमवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ।। ११३ ।। गण्डकी नदी सब तीर्थोंके जलसे उत्पन्न हुई है। वहाँ जाकर तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और सूर्यलोकमें जाता है ।। ११३ ।। ततो विशल्यामासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् । अग्निष्टोममवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ११४ ।। तत्पश्चात् त्रिलोकीमें विख्यात विशल्या नदीके तटपर जाकर स्नान करे। इससे वह अग्निष्टोमयनका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ११४ ।। ततोऽधिवङ्गं धर्मज्ञ समाविश्य तपोवनम् । गुह्यकेषु महाराज मोदते नात्र संशयः ।। ११५ ।। धर्मज्ञ महाराज! तदनन्तर वंगदेशीय तपोवनमें प्रवेश करके तीर्थयात्री इस शरीरके अन्तमें गुह्यकलोकमें जाकर निःसंदेह आनन्दका भागी होता है ।। ११५ ।। कम्पनां तु समासाद्य नदीं सिद्धनिषेविताम् । पुण्डरीकमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ११६ ।।

तत्पश्चात् सिद्धसेवित कम्पना नदीमें पहुँचकर मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ११६ ।। अथ माहेश्वरीं धारां समासाद्य धराधिप । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।। ११७ ।। राजन्! तत्पश्चात् माहेश्वरी धाराकी यात्रा करनेसे तीर्थयात्रीको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ।। ११७ ।। दिवौकसां पुष्करिणीं समासाद्य नराधिप । न दुर्गतिमवाप्नोति वाजिमेधं च विन्दति ।। ११८ ।। नरेश्वर! फिर देवपुष्करिणीमें जाकर मानव कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ।। ११८ ।। अथ सोमपदं गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः । माहेश्वरपदे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।। ११९ ।। तदनन्तर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो सोमपदतीर्थमें जाय। वहाँ माहेश्वरपदमें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ।। ११९ ।। तत्र कोटिस्तु तीर्थानां विश्रुता भरतर्षभ । कूर्मरूपेण राजेन्द्र ह्यसुरेण दुरात्मना ।। १२० ।। ह्रियमाणा हृता राजन् विष्णुना प्रभविष्णुना । तत्राभिषेकं कुर्वीत तीर्थकोट्यां युधिष्ठिर ।। १२१ ।। पुण्डरीकमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति । भरतकुलतिलक! वहाँ तीर्थोंकी विख्यात श्रेणीको एक दुरात्मा असुर कूर्मरूप धारण करके हरकर लिये जाता था। राजन्! यह देख सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने उस तीर्थश्रेणीका उद्धार किया। युधिष्ठिर! वहाँ उस तीर्थकोटिमें स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाले यात्रीको पुण्डरीकयज्ञका फल मिलता है और वह विष्णुलोकको जाता है ।। १२०-१२१ १/२ ।। ततो गच्छेत राजेन्द्र स्थानं नारायणस्य च ।। १२२ ।। सदा संनिहितो यत्र विष्णुर्वसति भारत । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।। १२३ ।। आदित्या वसवो रुद्रा जनार्दनमुपासते । शालग्राम इति ख्यातो विष्णुरद्भुतकर्मकः ।। १२४ ।। राजेन्द्र! तदनन्तर नारायण-स्थानको जाय। भरतनन्दन! वहाँ भगवान् विष्णु सदा निवास करते हैं। ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन ऋषि, आदित्य, वसु तथा रुद्र भी वहाँ रहकर जनार्दनकी उपासना करते हैं। उस तीर्थमें अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णु शालग्रामके नामसे प्रसिद्ध हैं ।।

अभिगम्य त्रिलोकेशं वरदं विष्णुमव्ययम् । अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥ १२५ ॥ तीनों लोकोंके स्वामी उन वरदायक अविनाशी भगवान् विष्णुके समीप जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और विष्णुलोकमें जाता है ॥ १२५ ॥ तत्रोदपानं धर्मज्ञ सर्वपापप्रमोचनम् । समुद्रास्तत्र चत्वारः कूपे संनिहिताः सदा ॥ १२६ ॥ धर्मज्ञ! वहाँ एक कूप है, जो सब पापोंको दूर करनेवाला है। उसमें सदा चारों समुद्र निवास करते हैं ॥ तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र न दुर्गतिमवाप्नुयात् । अभिगम्य महादेवं वरदं रुद्रमव्ययम् ॥ १२७ ॥ विराजति यथा सोमो मेघैर्मुक्तो नराधिप । जातिस्मरमुपस्पृश्य शुचिः प्रयतमानसः ॥ १२८ ॥ राजेन्द्र! उसमें निवास करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। सबको वर देनेवाले अविनाशी महादेव रुद्रके समीप जाकर मनुष्य मेघोंके आवरणसे मुक्त हुए चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होता है। नरेश्वर! वहीं जातिस्मरतीर्थ है; जिसमें स्नान करके मनुष्य पवित्र एवं शुद्धचित्त हो जाता है। अर्थात् उसके शरीर और मनकी शुद्धि हो जाती है ॥ १२७-१२८ ॥ जातिस्मरत्वमाप्नोति स्नात्वा तत्र न संशयः । माहेश्वरपुरं गत्वा अर्चयित्वा वृषध्वजम् ॥ १२९ ॥ ईप्सिताँल्लभते कामानुपवासान्न संशयः । ततस्तु वामनं गत्वा सर्वपापप्रमोचनम् ॥ १३० ॥ अभिगम्य हरिं देवं न दुर्गतिमवाप्नुयात् । कुशिकस्याश्रमं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनम् ॥ १३१ ॥ उस तीर्थमें स्नान करनेसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है, इसमें संशय नहीं है। माहेश्वरपुरमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा और उपवास करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओं-को प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तत्पश्चात् सब पापोंको दूर करनेवाले वामनतीर्थकी यात्रा करके भगवान् श्रीहरिके निकट जाय। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। इसके बाद सब पापोंसे छुड़ानेवाले कुशिकाश्रमकी यात्रा करे ॥ १२९-१३१ ॥ कौशिकीं तत्र गच्छेत महापापप्रणाशिनीम् । राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ १३२ ॥ वहीं बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाली कौशिकी (कोशी) नदी है। उसके तटपर जाकर स्नान करे। ऐसा करनेवाला मानव राजसूययज्ञका फल पाता है ॥ १३२ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र चम्पकारण्यमुत्तमम् ।

तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १३३ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम चम्पकारण्य (चम्पारन)-की यात्रा करे। वहाँ एक रात निवास करनेसे तीर्थयात्रीको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १३३ ॥

अथ ज्येष्ठिलमासाद्य तीर्थं परमदुर्लभम् । तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १३४ ॥ तत्पश्चात् परम दुर्लभ ज्येष्ठिलतीर्थमें जाकर एक रात निवास करनेसे मानव सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ १३४ ॥

तत्र विश्वेश्वरं दृष्ट्वा देव्या सह महाद्युतिम् । मित्रावरुणयोर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ ॥ १३५ ॥ त्रिरात्रोपोषितस्तत्र अग्निष्टोमफलं लभेत् । पुरुषरत्न! वहाँ पार्वतीदेवीके साथ महातेजस्वी भगवान् विश्वेश्वरका दर्शन करनेसे तीर्थयात्रीको मित्र और वरुण-देवताके लोकोंकी प्राप्ति होती है, वहाँ तीन रात उपवास करनेसे अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १३५ १/२ ॥

कन्यासंवेद्यमासाद्य नियतो नियताशनः ॥ १३६ ॥ मनोः प्रजापतेर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ । कन्यायां ये प्रयच्छन्ति दानमण्वपि भारत ॥ १३७ ॥ तदक्षय्यमिति प्राहुर्ऋषयः संशितव्रताः । पुरुषश्रेष्ठ! इसके बाद नियमपूर्वक नियमित भोजन करते हुए तीर्थयात्रीको कन्यासंवेद्य नामक तीर्थमें जाना चाहिये। इससे वह प्रजापति मनुके लोक प्राप्त कर लेता है। भरतनन्दन! जो लोग कन्यासंवेद्यतीर्थमें थोड़ा-सा भी दान देते हैं, उनके उस दानको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि अक्षय बताते हैं ॥

निश्चीरां च समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् ॥ १३८ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति । ये तु दानं प्रयच्छन्ति निश्चीरासंगमे नराः ॥ १३९ ॥ ते यान्ति नरशार्दूल शक्रलोकमनामयम् । तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ १४० ॥ तदनन्तर त्रिलोकविख्यात निश्चीरा नदीकी यात्रा करे। इससे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है और तीर्थयात्री पुरुष भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। नरश्रेष्ठ! जो मानव निश्चीरासंगममें दान देते हैं, वे रोग-शोकसे रहित इन्द्रलोकमें जाते हैं। वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात वसिष्ठ-आश्रम है ॥ १३८—१४० ॥

तत्राभिषेकं कुर्वाणो वाजपेयमवाप्नुयात् । देवकूटं समासाद्य ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ १४१ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।

वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता है। तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसे सेवित देवकूट-तीर्थमें जाकर स्नान करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अश्वमेध-यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ १४१ १/२ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र कौशिकस्य मुनेर्ह्रदम् ॥ १४२ ॥ यत्र सिद्धिं परां प्राप्तो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः । तत्र मासं वसेद् वीर कौशिकां भरतर्षभ ॥ १४३ ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् कौशिक मुनिके कुण्डमें स्नानके लिये जाय, जहाँ कुशिकनन्दन विश्वामित्रने उत्तम सिद्धि प्राप्त की थी। वीर! भरतकुलभूषण! उस तीर्थमें कौशिकी नदीके तटपर एक मासतक निवास करे ॥ १४२-१४३ ॥ अश्वमेधस्य यत् पुण्यं तन्मासेनाधिगच्छति । सर्वतीर्थवरे चैव यो वसेत महाह्रदे ॥ १४४ ॥ न दुर्गतिमवाप्नोति विन्देद् बहु सुवर्णकम् । ऐसा करनेसे एक मासमें ही अश्वमेधयज्ञका पुण्यफल प्राप्त हो जाता है। जो सब तीर्थोंमें उत्तम महाह्रदमें स्नान करता है वह कभी दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता और प्रचुर सुवर्णराशि प्राप्त कर लेता है ॥ १४४ १/२ ॥ कुमारमभिगम्याथ वीराश्रमनिवासिनम् ॥ १४५ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः । तदनन्तर वीराश्रमनिवासी कुमार कार्तिकेयके निकट जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४५ १/२ ॥ अग्निधारां समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् ॥ १४६ ॥ तत्राभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् । अग्निधारातीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ जाकर स्नान करनेवाला पुरुष अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ १४६ १/२ ॥ अधिगम्य महादेवं वरदं विष्णुमव्ययम् ॥ १४७ ॥ वहाँ वर देनेवाले महान् देवता अविनाशी भगवान् विष्णुके निकट जाकर उनका दर्शन और पूजन करे ॥ १४७ ॥ पितामहसरो गत्वा शैलराजसमीपतः । तत्राभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् ॥ १४८ ॥ गिरिराज हिमालयके निकट पितामहसरोवरमें जाकर स्नान करनेवाले पुरुषको अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १४८ ॥ पितामहस्य सरसः प्रस्रुता लोकपावनी । कुमारधारा तत्रैव त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ १४९ ॥

पितामहसरोवरसे सम्पूर्ण जगत्को पवित्र करनेवाली एक धारा प्रवाहित होती है, जो तीनों लोकोंमें कुमारधाराके नामसे विख्यात है ॥ १४९ ॥
यत्र स्नात्वा कृतार्थोऽस्मीत्यात्मानमवगच्छति ।
षष्ठकालोपवासेन मुच्यते ब्रह्महत्यया ॥ १५० ॥
उसमें स्नान करके मनुष्य अपने-आपको कृतार्थ मानने लगता है। वहाँ रहकर छठे समय उपवास करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे छुटकारा पा जाता है ॥ १५० ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थसेवनतत्परः ।
शिखरं वै महादेव्या गौर्यास्त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १५१ ॥
धर्मज्ञ! तदनन्तर तीर्थसेवनमें तत्पर मानव महादेवी गौरीके शिखरपर जाय, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है ॥ १५१ ॥
समारुह्य नरश्रेष्ठ स्तनकुण्डेषु संविशेत् ।
स्तनकुण्डमुपस्पृश्य वाजपेयफलं लभेत् ॥ १५२ ॥
नरश्रेष्ठ! उस शिखरपर चढ़कर मानव स्तनकुण्डमें स्नान करे। स्तनकुण्डमें अवगाहन करनेसे वाजपेययज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ १५२ ॥
तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः ।
हयमेधमवाप्नोति शक्रलोकं च गच्छति ॥ १५३ ॥
उस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंकी पूजा करनेवाला पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता और इन्द्रलोकमें पूजित होता है ॥ १५३ ॥
ताम्रारुणं समासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।
अश्वमेधमवाप्नोति ब्रह्मलोकं च गच्छति ॥ १५४ ॥
तदनन्तर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो ताम्रारुणतीर्थकी यात्रा करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और ब्रह्मलोकमें जाता है ॥ १५४ ॥
नन्दिन्यां च समासाद्य कूपं देवनिषेवितम् ।
नरमेधस्य यत् पुण्यं तदाप्नोति नराधिप ॥ १५५ ॥
नन्दिनीतीर्थमें देवताओंद्वारा सेवित एक कूप है। नरेश्वर! वहाँ जाकर स्नान करनेसे मानव नरमेधयज्ञका पुण्यफल प्राप्त करता है ॥ १५५ ॥
कालिकासंगमे स्नात्वा कौशिक्यरुणयोर्गतः ।
त्रिरात्रोपोषितो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ १५६ ॥
राजन्! कौशिकी-अरुणा-संगम और कालिका-संगममें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ १५६ ॥
उर्वशीतीर्थमासाद्य ततः सोमाश्रमं बुधः ।
कुम्भकर्णाश्रमं गत्वा पूज्यते भुवि मानवः ॥ १५७ ॥

तदनन्तर उर्वशीतीर्थ, सोमाश्रम और कुम्भ-कर्णाश्रमकी यात्रा करके मनुष्य इस भूतलपर पूजित होता है ।। १५७ ।। कोकामुखमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी यतव्रतः । जातिस्मरत्वमाप्नोति दृष्टमेतत् पुरातनैः ।। १५८ ।। कोकामुखतीर्थमें स्नान करके ब्रह्मचर्य एवं संयम-नियमका पालन करनेवाला पुरुष पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेकी शक्ति प्राप्त कर लेता है। यह बात प्राचीन पुरुषोंने प्रत्यक्ष देखी है ।। १५८ ।। प्राङ्नदीं च समासाद्य कृतात्मा भवति द्विजः । सर्वपापविशुद्धात्मा शक्रलोकं च गच्छति ।। १५९ ।। प्राङ्नदीतीर्थमें जानेसे द्विज कृतार्थ हो जाता है। वह सब पापोंसे शुद्धचित्त होकर इन्द्रलोकमें जाता है ।। ऋषभद्वीपमासाद्य मेध्यं क्रौञ्चनिषूदनम् । सरस्वत्यामुपस्पृश्य विमानस्थो विराजते ।। १६० ।। तीर्थसेवी मनुष्य पवित्र ऋषभद्वीप और क्रौञ्चनिषूदनतीर्थमें जाकर सरस्वतीमें स्नान करनेसे विमानपर विराजमान होता है ।। १६० ।। औद्दालकं महाराज तीर्थं मुनिनिषेवितम् । तत्राभिषेकं कृत्वा वै सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। १६१ ।। महाराज! मुनियोंसे सेवित औद्दालकतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ।। १६१ ।। धर्मतीर्थं समासाद्य पुण्यं ब्रह्मर्षिसेवितम् । वाजपेयमवाप्नोति विमानस्थश्च पूज्यते ।। १६२ ।। परम पवित्र ब्रह्मर्षिसेवित धर्मतीर्थमें जाकर स्नान करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और विमानपर बैठकर पूजित होता है ।। १६२ ।।

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि तीर्थयात्रापर्वणि पुलस्त्यतीर्थयात्रायां चतुरशीतितमोऽध्यायः ।। ८४ ।। इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत तीर्थयात्रापर्वमें पुलस्त्यकी तीर्थयात्रासे सम्बन्ध रखनेवाला चौरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ८४ ।।


* शम्याका अर्थ है डंडा। कोई बलवान् पुरुष डंडेको खूब जोर लगाकर फेंके तो वह जहाँ गिरे, उतनी दूरके स्थानको एक शम्यानिपात कहते हैं। ऐसे ही छः शम्यानिपातकी दूरी समझ लेनी चाहिये।
* तिलोंसे गौकी आकृति बनाकर उसका दान करे।

गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य

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पञ्चाशीतितमोऽध्यायः

गंगासागर, अयोध्या, चित्रकूट, प्रयाग आदि विभिन्न तीर्थोंकी महिमाका वर्णन और गंगाका माहात्म्य

पुलस्त्य उवाच

अथ संध्यां समासाद्य संवेद्यं तीर्थमुत्तमम् ।
उपस्पृश्य नरो विद्यां लभते नात्र संशयः ॥ १ ॥
पुलस्त्यजी कहते हैं—भीष्म! तदनन्तर प्रातः-संध्याके समय उत्तम संवेद्यतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य विद्यालाभ करता है; इसमें संशय नहीं है ॥ १ ॥

रामस्य च प्रभावेण तीर्थं राजन् कृतं पुरा ।
तल्लौहित्यं समासाद्य विन्द्याद् बहु सुवर्णकम् ॥ २ ॥
राजन्! पूर्वकालमें श्रीरामके प्रभावसे जो तीर्थ प्रकट हुआ उसका नाम लौहित्यतीर्थ है। उसमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्यको बहुत-सी सुवर्णराशि प्राप्त होती है ॥ २ ॥

करतोयां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति प्रजापतिकृतो विधिः ॥ ३ ॥
करतोयामें जाकर स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता है। यह ब्रह्माजीद्वारा की हुई व्यवस्था है ॥ ३ ॥

गङ्गायास्तत्र राजेन्द्र सागरस्य च संगमे ।
अश्वमेधं दशगुणं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ४ ॥
राजेन्द्र! वहाँ गंगासागरसंगममें स्नान करनेसे दस अश्वमेधयज्ञोंके फलकी प्राप्ति होती है, ऐसा मनीषी पुरुष कहते हैं ॥ ४ ॥

गङ्गायास्त्वपरं पारं प्राप्य यः स्नाति मानवः ।
त्रिरात्रमुषितो राजन् सर्वपापैः प्रमुच्यते ॥ ५ ॥
राजन्! जो मानव गंगासागरसंगममें गंगाके दूसरे पार पहुँचकर स्नान करता है और तीन रात वहाँ निवास करता है, वह सब पापोंसे छूट जाता है ॥ ५ ॥

ततो वैतरणीं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनीम् ।
विरजं तीर्थमासाद्य विराजति यथा शशी ॥ ६ ॥
तदनन्तर सब पापोंसे छुड़ानेवाली वैतरणीकी यात्रा करे। वहाँ विरजतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥ ६ ॥

प्रतरेच्च कुलं पुण्यं सर्वपापं व्यपोहति ।
गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नरः ॥ ७ ॥

उसका पुण्यमय कुल संसारसागरसे तर जाता है। वह अपने सब पापोंका नाश कर देता है और सहस्र गोदानका फल प्राप्त करके अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ७ ॥

शोणस्य ज्योतिरथ्यायाः संगमे नियतः शुचिः ।
तर्पयित्वा पितॄन् देवानग्निष्टोमफलं लभेत् ॥ ८ ॥
शोण और ज्योतिरथ्याके संगममें स्नान करके जितेन्द्रिय एवं पवित्र पुरुष यदि देवताओं और पितरोंका तर्पण करे तो वह अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ ८ ॥

शोणस्य नर्मदायाश्च प्रभवे कुरुनन्दन ।
वंशगुल्म उपस्पृश्य वाजिमेधफलं लभेत् ॥ ९ ॥
कुरुनन्दन! शोण और नर्मदाके उत्पत्तिस्थान वंशगुल्मतीर्थमें स्नान करके तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ॥ ९ ॥

ऋषभं तीर्थमासाद्य कोसलायां नराधिप ।
वाजपेयमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ १० ॥
गोसहस्रफलं विन्द्यात् कुलं चैव समुद्धरेत् ।
नरेश्वर! कोसला (अयोध्या)-में ऋषभतीर्थमें जाकर स्नानपूर्वक तीन रात उपवास करनेवाला मानव वाजपेययज्ञका फल पाता है। इतना ही नहीं, वह सहस्र गोदानका फल पाता और अपने कुलका भी उद्धार कर देता है ॥ १० १/२ ॥

कोसलां तु समासाद्य कालतीर्थमुपस्पृशेत् ॥ ११ ॥
वृषभैकादशफलं लभते नात्र संशयः ।
पुष्पवत्यामुपस्पृश्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ॥ १२ ॥
गोसहस्रफलं लब्ध्वा पुनाति स्वकुलं नृप ।
कोसला नगरी (अयोध्या)-में जाकर कालतीर्थमें स्नान करे। ऐसा करनेसे ग्यारह वृषभ-दानका फल मिलता है, इसमें संशय नहीं है। पुष्पवतीमें स्नान करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता और अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ११-१२ १/२ ॥

ततो बदरिकातीर्थं स्नात्वा भरतसत्तम ॥ १३ ॥
दीर्घमायुरवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।
भरतकुलभूषण! तदनन्तर बदरिकातीर्थमें स्नान करके मनुष्य दीर्घायु पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ॥

अथ चम्पां समासाद्य भागीरथ्यां कृतोदकः ॥ १४ ॥
दण्डाख्यमभिगम्यैव गोसहस्रफलं लभेत् ।
तत्पश्चात् चम्पामें जाकर भागीरथीमें तर्पण करे और दण्ड नामक तीर्थमें जाकर सहस्र गोदानका फल प्राप्त करे ॥ १४ १/२ ॥

लपेटिकां ततो गच्छेत् पुण्यां पुण्योपशोभिताम् ॥ १५ ॥

वाजपेयमवाप्नोति देवैः सर्वैश्च पूज्यते ।
तदनन्तर पुण्यशोभिता पुण्यमयी लपेटिकामें जाकर स्नान करे। ऐसा करनेसे तीर्थयात्री वाजपेययज्ञका फल पाता और सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित होता है ।। १५ १/२ ।।
ततो महेन्द्रमासाद्य जामदग्न्यनिषेवितम् ।। १६ ।।
रामतीर्थे नरः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् ।
इसके बाद परशुरामसेवित महेन्द्रपर्वतपर जाकर वहाँके रामतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ।। १६ १/२ ।।
मतङ्गस्य तु केदारस्तत्रैव कुरुनन्दन ।। १७ ।।
तत्र स्नात्वा कुरुश्रेष्ठ गोसहस्रफलं लभेत् ।
कुरुश्रेष्ठ कुरुनन्दन! वहीं मतंगका केदार है, उसमें स्नान करनेसे मनुष्यको सहस्र गोदानका फल मिलता है ।। १७ १/२ ।।
श्रीपर्वतं समासाद्य नदीतीरमुपस्पृशेत् ।। १८ ।।
अश्वमेधमवाप्नोति पूजयित्वा वृषध्वजम् ।
श्रीपर्वतपर जाकर वहाँकी नदीके तटपर स्नान करे। वहाँ भगवान् शंकरकी पूजा करके मनुष्यको अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ।। १८ १/२ ।।
श्रीपर्वते महादेवो देव्या सह महाद्युतिः ।। १९ ।।
न्यवसत् परमप्रीतो ब्रह्मा च त्रिदशैः सह ।
तत्र देवह्रदे स्नात्वा शुचिः प्रयतमानसः ।। २० ।।
अश्वमेधमवाप्नोति परां सिद्धिं च गच्छति ।
ऋषभं पर्वतं गत्वा पाण्ड्ये देवतपूजितम् ।
वाजपेयमवाप्नोति नाकपृष्ठे च मोदते ।। २१ ।।
श्रीपर्वतपर देवी पार्वतीके साथ महातेजस्वी महादेवजी बड़ी प्रसन्नताके साथ निवास करते हैं। देवताओंके साथ ब्रह्माजी भी वहाँ रहते हैं। वहाँ देवकुण्डमें स्नान करके पवित्र हो जितात्मा पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता और परम सिद्धि लाभ करता है। पाण्ड्यदेशमें देवपूजित ऋषभ पर्वतपर जाकर तीर्थयात्री वाजपेययज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें आनन्दित होता है ।। १९—२१ ।।
ततो गच्छेत कावेरीं वृतामप्सरसां गणैः ।
तत्र स्नात्वा नरो राजन् गोसहस्रफलं लभेत् ।। २२ ।।
राजन्! तदनन्तर अप्सराओंसे आवृत कावेरी नदीकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ।। २२ ।।
ततस्तीरे समुद्रस्य कन्यातीर्थमुपस्पृशेत् ।
तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र सर्वपापैः प्रमुच्यते ।। २३ ।।

राजेन्द्र! तत्पश्चात् समुद्रके तटपर विद्यमान कन्यातीर्थ (कन्याकुमारी)-में जाकर स्नान करे। उस तीर्थमें स्नान करते ही मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ २३ ॥

अथ गोकर्णमासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ।
समुद्रमध्ये राजेन्द्र सर्वलोकनमस्कृतम् ॥ २४ ॥
यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।
भूतयक्षपिशाचाश्च किंनराः समहोरगाः ॥ २५ ॥
सिद्धचारणगन्धर्वमानुषाः पन्नगास्तथा ।
सरितः सागराः शैला उपासन्त उमापतिम् ॥ २६ ॥
महाराज! इसके बाद समुद्रके मध्यमें विद्यमान त्रिभुवनविख्यात अखिल लोकवन्दित गोकर्णतीर्थमें जाकर स्नान करे। जहाँ ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन महर्षि, भूत, यक्ष, पिशाच, किन्नर, महानाग, सिद्ध, चारण, गन्धर्व, मनुष्य, सर्प, नदी, समुद्र और पर्वत—ये सभी उमावल्लभ भगवान् शंकरकी उपासना करते हैं ॥ २४—२६ ॥

तत्रेशानं समभ्यर्च्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
अश्वमेधमवाप्नोति गाणपत्यं च विन्दति ॥ २७ ॥
वहाँ भगवान् शिवकी पूजा करके तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और गणपतिपद प्राप्त कर लेता है ॥ २७ ॥

उष्य द्वादशरात्रं तु पूतात्मा च भवेन्नरः ।
तत एव च गायत्र्याः स्थानं त्रैलोक्यपूजितम् ॥ २८ ॥
वहाँ बारह रात निवास करनेसे मनुष्यका अन्तःकरण पवित्र हो जाता है। वहीं गायत्रीका त्रिलोक-पूजित स्थान है ॥ २८ ॥

त्रिरात्रमुषितस्तत्र गोसहस्रफलं लभेत् ।
निदर्शनं च प्रत्यक्षं ब्राह्मणानां नराधिप ॥ २९ ॥
वहाँ तीन रात निवास करनेवाला पुरुष सहस्र गोदानका फल प्राप्त करता है। नरेश्वर! ब्राह्मणोंकी पहचानके लिये वहाँ प्रत्यक्ष उदाहरण है ॥ २९ ॥

गायत्रीं पठते यस्तु योनिसंकरजस्तथा ।
गाथा च गाथिका चापि तस्य सम्पद्यते नृप ॥ ३० ॥
राजन्! जो वर्णसंकर योनिमें उत्पन्न हुआ है, वह यदि गायत्रीमन्त्रका पाठ करता है तो उसके मुखसे वह गाथा या गीतकी तरह स्वर और वर्णोंके नियमसे रहित होकर निकलती है; अर्थात् वह गायत्रीका उच्चारण ठीक नहीं कर सकता ॥ ३० ॥

अब्राह्मणस्य सावित्रीं पठतस्तु प्रणश्यति ।
जो सर्वथा ब्राह्मण नहीं है, ऐसा मनुष्य यदि वहाँ गायत्रीमन्त्रका पाठ करे तो वहाँ वह मन्त्र लुप्त हो जाता है; अर्थात् उसे भूल जाता है ॥ ३० १/२ ॥

संवर्तस्य तु विप्रर्षेर्वापीमासाद्य दुर्लभाम् ॥ ३१ ॥

रूपस्य भागी भवति सुभगश्च प्रजापते । राजन्! वहाँ ब्रह्मर्षि संवर्तकी दुर्लभ बावली है। उसमें स्नान करके मनुष्य सुन्दररूपका भागी और सौभाग्यशाली होता है ।। ३१ १/२ ।। ततो वेणां समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।। ३२ ।। मयूरहंससंयुक्तं विमानं लभते नरः । तदनन्तर वेणा नदीके तटपर जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य (मृत्युके पश्चात्) मोर और हंसोंसे जुता हुआ विमानको प्राप्त करता है ।। ३२ १/२ ।। ततो गोदावरीं प्राप्य नित्यं सिद्धनिषेविताम् ।। ३३ ।। गवां मेधमवाप्नोति वासुकेर्लोकमुत्तमम् । वेणायाः संगमे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।। ३४ ।। तत्पश्चात् सदा सिद्ध पुरुषोंसे सेवित गोदावरीके तटपर जाकर स्नान करनेसे तीर्थयात्री गोमेधयज्ञका फल पाता और वासुकिके लोकमें जाता है। वेणासंगममें स्नान करके मनुष्य अश्वमेधयज्ञके फलका भागी होता है ।। वरदासंगमे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् । ब्रह्मस्थानं समासाद्य त्रिरात्रोपोषितो नरः ।। ३५ ।। गोसहस्रफलं विन्द्यात् स्वर्गलोकं च गच्छति । वरदासंगमतीर्थमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। ब्रह्मस्थानमें जाकर तीन रात उपवास करनेवाला मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ३५ १/२ ।। कुशप्लवनमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।। ३६ ।। त्रिरात्रमुषितः स्नात्वा अश्वमेधफलं लभेत् । कुशप्लवनतीर्थमें जाकर स्नान करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो तीन रात निवास करनेवाला पुरुष अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ।। ३६ १/२ ।। ततो देवह्रदेऽरण्ये कृष्णवेणाजलोद्भवे ।। ३७ ।। जातिस्मरह्रदे स्नात्वा भवेज्जातिस्मरो नरः । तदनन्तर कृष्णवेणाके जलसे उत्पन्न हुए रमणीय देवकुण्डमें, जिसे जातिस्मर ह्रद कहते हैं, स्नान करे। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य जातिस्मर (पूर्वजन्मकी बातोंको स्मरण करनेकी शक्तिवाला) होता है ।। ३७ १/२ ।। यत्र क्रतुशतैरिष्ट्वा देवराजो दिवं गतः ।। ३८ ।। अग्निष्टोमफलं विन्द्याद् गमनादेव भारत । सर्वदेवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।। ३९ ।।

वहीं सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके देवराज इन्द्र स्वर्गके सिंहासनपर आसीन हुए थे। भरतनन्दन! वहाँ जानेमात्रसे यात्री अग्निष्टोमयज्ञका फल पा लेता है। तत्पश्चात् सर्वदेवह्रदमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ३८-३९ ॥

ततो वापीं महापुण्यां पयोष्णीं सरितां वराम्।
पितृदेवार्चनरतो गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ४० ॥
तदनन्तर परम पुण्यमयी वापी और सरिताओंमें श्रेष्ठ पयोष्णीमें जाकर स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंके पूजनमें तत्पर रहे, ऐसा करनेसे तीर्थसेवीको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ४० ॥

दण्डकारण्यमासाद्य पुण्यं राजन्युपस्पृशेत् ।
गोसहस्रफलं तस्य स्नातमात्रस्य भारत ॥ ४१ ॥
राजन्! भरतनन्दन! जो दण्डकारण्यमें जाकर स्नान करता है, उसे स्नान करनेमात्रसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है ॥ ४१ ॥

शरभङ्गाश्रमं गत्वा शुकस्य च महात्मनः ।
न दुर्गतिमवाप्नोति पुनाति च कुलं नरः ॥ ४२ ॥
शरभंग मुनि तथा महात्मा शुकके आश्रमपर जानेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और अपने कुलको पवित्र कर देता है ॥ ४२ ॥

ततः शूर्पार कं गच्छेज्जामदग्न्यनिषेवितम् ।
रामतीर्थे नरः स्नात्वा विन्द्याद् बहुसुवर्णकम् ॥ ४३ ॥
तदनन्तर परशुरामसेवित शूर्पार कतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ रामतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्यको प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है ॥ ४३ ॥

सप्तगोदावरे स्नात्वा नियतो नियताशनः ।
महत् पुण्यमवाप्नोति देवलोकं च गच्छति ॥ ४४ ॥
सप्तगोदावरतीर्थमें स्नान करके नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करनेवाला पुरुष महान् पुण्यलाभ करता और देवलोकमें जाता है ॥ ४४ ॥

ततो देवपथं गत्वा नियतो नियताशनः ।
देवसत्रस्य यत् पुण्यं तदेवाप्नोति मानवः ॥ ४५ ॥
तत्पश्चात् नियमपालनके साथ-साथ नियमित आहार ग्रहण करनेवाला मानव देवपथमें जाकर देवसत्रका जो पुण्य है, उसे पा लेता है ॥ ४५ ॥

तुङ्गकारण्यमासाद्य ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।
वेदानध्यापयत् तत्र ऋषिः सारस्वतः पुरा ॥ ४६ ॥
तुंगकारण्यमें जाकर ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए इन्द्रियोंको अपने वशमें रखे। प्राचीनकालमें वहाँ सारस्वत ऋषिने अन्य ऋषियोंको वेदोंका अध्ययन कराया था ॥ ४६ ॥

तत्र वेदेषु नष्टेषु मुनेरङ्गिरसः सुतः ।

ऋषीणामुत्तरीयेषु सूपविष्टो यथासुखम् ॥ ४७ ॥ एक समय उन ऋषियोंको सारा वेद भूल गया। इस प्रकार वेदोंके नष्ट होने (भूल जाने)-पर अंगिरा मुनिका पुत्र ऋषियोंके उत्तरीय वस्त्रों (चादरों)-में छिपकर सुखपूर्वक बैठ गया (और विधिपूर्वक ॐकारका उच्चारण करने लगा) ॥ ४७ ॥ ओङ्कारेण यथान्यायं सम्यगुच्चारितेन ह । येन यत् पूर्वमभ्यस्तं तत् सर्वं समुपस्थितम् ॥ ४८ ॥ नियमके अनुसार ॐकारका ठीक-ठीक उच्चारण होनेपर, जिसने पूर्वकालमें जिस वेदका अध्ययन एवं अभ्यास किया था, उसे वह सब स्मरण हो आया ॥ ४८ ॥ ऋषयस्तत्र देवाश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः । हर्निरायणस्तत्र महादेवस्तथैव च ॥ ४९ ॥ उस समय वहाँ बहुत-से ऋषि, देवता, वरुण, अग्नि, प्रजापति, भगवान् नारायण और महादेवजी भी उपस्थित हुए ॥ ४९ ॥ पितामहश्च भगवान् देवैः सह महाद्युतिः । भृगुं नियोजयामास याजनार्थं महाद्युतिम् ॥ ५० ॥ महातेजस्वी भगवान् ब्रह्माने देवताओंके साथ जाकर परम कान्तिमान् भृगुको यज्ञ करानेके कामपर नियुक्त किया ॥ ५० ॥ ततः स चक्रे भगवानृषीणां विधिवत् तदा । सर्वेषां पुनराधानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ५१ ॥ आज्यभागेन तत्राग्निं तर्पयित्वा यथाविधि । देवाः स्वभवनं याता ऋषयश्च यथाक्रमम् ॥ ५२ ॥ तदनन्तर भगवान् भृगुने वहाँ सब ऋषियोंके यहाँ शास्त्रीय विधिके अनुसार पुनः भलीभाँति अग्निस्थापन कराया। उस समय आज्यभागके द्वारा विधिपूर्वक अग्निको तृप्त करके सब देवता और ऋषि क्रमशः अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ५१-५२ ॥ तदरण्यं प्रविष्टस्य तुङ्गकं राजसत्तम । पापं प्रणश्यत्यखिलं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा ॥ ५३ ॥ नृपश्रेष्ठ! उस तुंगकारण्यमें प्रवेश करते ही स्त्री या पुरुष सबके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ५३ ॥ तत्र मासं वसेद् धीरो नियतो नियताशनः । ब्रह्मलोकं व्रजेद् राजन् कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ५४ ॥ धीर पुरुषको चाहिये कि वह नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करते हुए एक मासतक वहाँ रहे। राजन् ऐसा करनेवाला तीर्थयात्री ब्रह्मलोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५४ ॥ मेधाविकं समासाद्य पितॄन् देवांश्च तर्पयेत् ।