भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 626

अभिगम्य त्रिलोकेशं वरदं विष्णुमव्ययम् । अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति ॥ १२५ ॥ तीनों लोकोंके स्वामी उन वरदायक अविनाशी भगवान् विष्णुके समीप जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और विष्णुलोकमें जाता है ॥ १२५ ॥ तत्रोदपानं धर्मज्ञ सर्वपापप्रमोचनम् । समुद्रास्तत्र चत्वारः कूपे संनिहिताः सदा ॥ १२६ ॥ धर्मज्ञ! वहाँ एक कूप है, जो सब पापोंको दूर करनेवाला है। उसमें सदा चारों समुद्र निवास करते हैं ॥ तत्रोपस्पृश्य राजेन्द्र न दुर्गतिमवाप्नुयात् । अभिगम्य महादेवं वरदं रुद्रमव्ययम् ॥ १२७ ॥ विराजति यथा सोमो मेघैर्मुक्तो नराधिप । जातिस्मरमुपस्पृश्य शुचिः प्रयतमानसः ॥ १२८ ॥ राजेन्द्र! उसमें निवास करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। सबको वर देनेवाले अविनाशी महादेव रुद्रके समीप जाकर मनुष्य मेघोंके आवरणसे मुक्त हुए चन्द्रमाकी भाँति सुशोभित होता है। नरेश्वर! वहीं जातिस्मरतीर्थ है; जिसमें स्नान करके मनुष्य पवित्र एवं शुद्धचित्त हो जाता है। अर्थात् उसके शरीर और मनकी शुद्धि हो जाती है ॥ १२७-१२८ ॥ जातिस्मरत्वमाप्नोति स्नात्वा तत्र न संशयः । माहेश्वरपुरं गत्वा अर्चयित्वा वृषध्वजम् ॥ १२९ ॥ ईप्सिताँल्लभते कामानुपवासान्न संशयः । ततस्तु वामनं गत्वा सर्वपापप्रमोचनम् ॥ १३० ॥ अभिगम्य हरिं देवं न दुर्गतिमवाप्नुयात् । कुशिकस्याश्रमं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनम् ॥ १३१ ॥ उस तीर्थमें स्नान करनेसे पूर्वजन्मकी बातोंका स्मरण करनेकी शक्ति प्राप्त हो जाती है, इसमें संशय नहीं है। माहेश्वरपुरमें जाकर भगवान् शंकरकी पूजा और उपवास करनेसे मनुष्य सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाओं-को प्राप्त कर लेता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तत्पश्चात् सब पापोंको दूर करनेवाले वामनतीर्थकी यात्रा करके भगवान् श्रीहरिके निकट जाय। उनका दर्शन करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता। इसके बाद सब पापोंसे छुड़ानेवाले कुशिकाश्रमकी यात्रा करे ॥ १२९-१३१ ॥ कौशिकीं तत्र गच्छेत महापापप्रणाशिनीम् । राजसूयस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः ॥ १३२ ॥ वहीं बड़े-बड़े पापोंका नाश करनेवाली कौशिकी (कोशी) नदी है। उसके तटपर जाकर स्नान करे। ऐसा करनेवाला मानव राजसूययज्ञका फल पाता है ॥ १३२ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र चम्पकारण्यमुत्तमम् ।