महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंतत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १३३ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम चम्पकारण्य (चम्पारन)-की यात्रा करे। वहाँ एक रात निवास करनेसे तीर्थयात्रीको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १३३ ॥
अथ ज्येष्ठिलमासाद्य तीर्थं परमदुर्लभम् । तत्रोष्य रजनीमेकां गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १३४ ॥ तत्पश्चात् परम दुर्लभ ज्येष्ठिलतीर्थमें जाकर एक रात निवास करनेसे मानव सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ १३४ ॥
तत्र विश्वेश्वरं दृष्ट्वा देव्या सह महाद्युतिम् । मित्रावरुणयोर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ ॥ १३५ ॥ त्रिरात्रोपोषितस्तत्र अग्निष्टोमफलं लभेत् । पुरुषरत्न! वहाँ पार्वतीदेवीके साथ महातेजस्वी भगवान् विश्वेश्वरका दर्शन करनेसे तीर्थयात्रीको मित्र और वरुण-देवताके लोकोंकी प्राप्ति होती है, वहाँ तीन रात उपवास करनेसे अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १३५ १/२ ॥
कन्यासंवेद्यमासाद्य नियतो नियताशनः ॥ १३६ ॥ मनोः प्रजापतेर्लोकानाप्नोति पुरुषर्षभ । कन्यायां ये प्रयच्छन्ति दानमण्वपि भारत ॥ १३७ ॥ तदक्षय्यमिति प्राहुर्ऋषयः संशितव्रताः । पुरुषश्रेष्ठ! इसके बाद नियमपूर्वक नियमित भोजन करते हुए तीर्थयात्रीको कन्यासंवेद्य नामक तीर्थमें जाना चाहिये। इससे वह प्रजापति मनुके लोक प्राप्त कर लेता है। भरतनन्दन! जो लोग कन्यासंवेद्यतीर्थमें थोड़ा-सा भी दान देते हैं, उनके उस दानको उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि अक्षय बताते हैं ॥
निश्चीरां च समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् ॥ १३८ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति । ये तु दानं प्रयच्छन्ति निश्चीरासंगमे नराः ॥ १३९ ॥ ते यान्ति नरशार्दूल शक्रलोकमनामयम् । तत्राश्रमो वसिष्ठस्य त्रिषु लोकेषु विश्रुतः ॥ १४० ॥ तदनन्तर त्रिलोकविख्यात निश्चीरा नदीकी यात्रा करे। इससे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है और तीर्थयात्री पुरुष भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। नरश्रेष्ठ! जो मानव निश्चीरासंगममें दान देते हैं, वे रोग-शोकसे रहित इन्द्रलोकमें जाते हैं। वहीं तीनों लोकोंमें विख्यात वसिष्ठ-आश्रम है ॥ १३८—१४० ॥
तत्राभिषेकं कुर्वाणो वाजपेयमवाप्नुयात् । देवकूटं समासाद्य ब्रह्मर्षिगणसेवितम् ॥ १४१ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।