महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता है। तदनन्तर ब्रह्मर्षियोंसे सेवित देवकूट-तीर्थमें जाकर स्नान करे। ऐसा करनेवाला पुरुष अश्वमेध-यज्ञका फल पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ १४१ १/२ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र कौशिकस्य मुनेर्ह्रदम् ॥ १४२ ॥ यत्र सिद्धिं परां प्राप्तो विश्वामित्रोऽथ कौशिकः । तत्र मासं वसेद् वीर कौशिकां भरतर्षभ ॥ १४३ ॥ राजेन्द्र! तत्पश्चात् कौशिक मुनिके कुण्डमें स्नानके लिये जाय, जहाँ कुशिकनन्दन विश्वामित्रने उत्तम सिद्धि प्राप्त की थी। वीर! भरतकुलभूषण! उस तीर्थमें कौशिकी नदीके तटपर एक मासतक निवास करे ॥ १४२-१४३ ॥ अश्वमेधस्य यत् पुण्यं तन्मासेनाधिगच्छति । सर्वतीर्थवरे चैव यो वसेत महाह्रदे ॥ १४४ ॥ न दुर्गतिमवाप्नोति विन्देद् बहु सुवर्णकम् । ऐसा करनेसे एक मासमें ही अश्वमेधयज्ञका पुण्यफल प्राप्त हो जाता है। जो सब तीर्थोंमें उत्तम महाह्रदमें स्नान करता है वह कभी दुर्गतिको नहीं प्राप्त होता और प्रचुर सुवर्णराशि प्राप्त कर लेता है ॥ १४४ १/२ ॥ कुमारमभिगम्याथ वीराश्रमनिवासिनम् ॥ १४५ ॥ अश्वमेधमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः । तदनन्तर वीराश्रमनिवासी कुमार कार्तिकेयके निकट जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १४५ १/२ ॥ अग्निधारां समासाद्य त्रिषु लोकेषु विश्रुताम् ॥ १४६ ॥ तत्राभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् । अग्निधारातीर्थ तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ जाकर स्नान करनेवाला पुरुष अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ॥ १४६ १/२ ॥ अधिगम्य महादेवं वरदं विष्णुमव्ययम् ॥ १४७ ॥ वहाँ वर देनेवाले महान् देवता अविनाशी भगवान् विष्णुके निकट जाकर उनका दर्शन और पूजन करे ॥ १४७ ॥ पितामहसरो गत्वा शैलराजसमीपतः । तत्राभिषेकं कुर्वाणो ह्यग्निष्टोममवाप्नुयात् ॥ १४८ ॥ गिरिराज हिमालयके निकट पितामहसरोवरमें जाकर स्नान करनेवाले पुरुषको अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है ॥ १४८ ॥ पितामहस्य सरसः प्रस्रुता लोकपावनी । कुमारधारा तत्रैव त्रिषु लोकेषु विश्रुता ॥ १४९ ॥