भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 625

तत्पश्चात् सिद्धसेवित कम्पना नदीमें पहुँचकर मनुष्य पुण्डरीकयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ११६ ।। अथ माहेश्वरीं धारां समासाद्य धराधिप । अश्वमेधमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ।। ११७ ।। राजन्! तत्पश्चात् माहेश्वरी धाराकी यात्रा करनेसे तीर्थयात्रीको अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ।। ११७ ।। दिवौकसां पुष्करिणीं समासाद्य नराधिप । न दुर्गतिमवाप्नोति वाजिमेधं च विन्दति ।। ११८ ।। नरेश्वर! फिर देवपुष्करिणीमें जाकर मानव कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और अश्वमेधयज्ञका फल पाता है ।। ११८ ।। अथ सोमपदं गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः । माहेश्वरपदे स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।। ११९ ।। तदनन्तर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो सोमपदतीर्थमें जाय। वहाँ माहेश्वरपदमें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल मिलता है ।। ११९ ।। तत्र कोटिस्तु तीर्थानां विश्रुता भरतर्षभ । कूर्मरूपेण राजेन्द्र ह्यसुरेण दुरात्मना ।। १२० ।। ह्रियमाणा हृता राजन् विष्णुना प्रभविष्णुना । तत्राभिषेकं कुर्वीत तीर्थकोट्यां युधिष्ठिर ।। १२१ ।। पुण्डरीकमवाप्नोति विष्णुलोकं च गच्छति । भरतकुलतिलक! वहाँ तीर्थोंकी विख्यात श्रेणीको एक दुरात्मा असुर कूर्मरूप धारण करके हरकर लिये जाता था। राजन्! यह देख सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने उस तीर्थश्रेणीका उद्धार किया। युधिष्ठिर! वहाँ उस तीर्थकोटिमें स्नान करना चाहिये। ऐसा करनेवाले यात्रीको पुण्डरीकयज्ञका फल मिलता है और वह विष्णुलोकको जाता है ।। १२०-१२१ १/२ ।। ततो गच्छेत राजेन्द्र स्थानं नारायणस्य च ।। १२२ ।। सदा संनिहितो यत्र विष्णुर्वसति भारत । यत्र ब्रह्मादयो देवा ऋषयश्च तपोधनाः ।। १२३ ।। आदित्या वसवो रुद्रा जनार्दनमुपासते । शालग्राम इति ख्यातो विष्णुरद्भुतकर्मकः ।। १२४ ।। राजेन्द्र! तदनन्तर नारायण-स्थानको जाय। भरतनन्दन! वहाँ भगवान् विष्णु सदा निवास करते हैं। ब्रह्मा आदि देवता, तपोधन ऋषि, आदित्य, वसु तथा रुद्र भी वहाँ रहकर जनार्दनकी उपासना करते हैं। उस तीर्थमें अद्भुतकर्मा भगवान् विष्णु शालग्रामके नामसे प्रसिद्ध हैं ।।