महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंततो गच्छेत ब्रह्मर्षेर्गौतमस्य वनं प्रियम् ।। १०८ ।। अहल्याया हृदे स्नात्वा व्रजेत परमां गतिम् । अभिगम्याश्रमं राजन् विन्दते श्रियमात्मनः ।। १०९ ।। तत्पश्चात् ब्रह्मर्षि गौतमके प्रिय वनकी यात्रा करे। वहाँ अहल्याकुण्डमें स्नान करनेसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होता है। राजन्! गौतमके आश्रममें जाकर मनुष्य अपने लिये लक्ष्मी प्राप्त कर लेता है ।। १०८-१०९ ।। तत्रोदपानं धर्मज्ञ त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राभिषेकं कृत्वा तु वाजिमेधमवाप्नुयात् ।। ११० ।। धर्मज्ञ! वहाँ एक त्रिभुवनविख्यात कूप है, जिसमें स्नान करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ।। ११० ।। जनकस्य तु राजर्षेः कूपस्त्रिदशपूजितः । तत्राभिषेकं कृत्वा तु विष्णुलोकमवाप्नुयात् ।। १११ ।। राजर्षि जनकका एक कूप है, जिसका देवता भी सम्मान करते हैं। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य विष्णुलोकमें जाता है ।। १११ ।। ततो विनशनं गच्छेत् सर्वपापप्रमोचनम् । वाजपेयमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ।। ११२ ।। तत्पश्चात् सब पापोंसे छुड़ानेवाले विनशनतीर्थको जाय, जिससे मनुष्य वाजपेययज्ञका फल पाता और सोमलोकको जाता है ।। ११२ ।। गण्डकीं तु समासाद्य सर्वतीर्थजलोद्भवाम् । वाजपेयमवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ।। ११३ ।। गण्डकी नदी सब तीर्थोंके जलसे उत्पन्न हुई है। वहाँ जाकर तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और सूर्यलोकमें जाता है ।। ११३ ।। ततो विशल्यामासाद्य नदीं त्रैलोक्यविश्रुताम् । अग्निष्टोममवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ११४ ।। तत्पश्चात् त्रिलोकीमें विख्यात विशल्या नदीके तटपर जाकर स्नान करे। इससे वह अग्निष्टोमयनका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ११४ ।। ततोऽधिवङ्गं धर्मज्ञ समाविश्य तपोवनम् । गुह्यकेषु महाराज मोदते नात्र संशयः ।। ११५ ।। धर्मज्ञ महाराज! तदनन्तर वंगदेशीय तपोवनमें प्रवेश करके तीर्थयात्री इस शरीरके अन्तमें गुह्यकलोकमें जाकर निःसंदेह आनन्दका भागी होता है ।। ११५ ।। कम्पनां तु समासाद्य नदीं सिद्धनिषेविताम् । पुण्डरीकमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ११६ ।।