महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 623, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंमहाराज! तदनन्तर एकाग्रचित्त हो मनुष्य धर्मप्रस्थकी यात्रा करे। युधिष्ठिर! वहाँ धर्मराजका नित्य निवास है ॥ ९९ ॥ तत्र कूपोदकं कृत्वा तेन स्नातः शुचिस्तथा। पितॄन् देवांस्तु संतर्प्य मुक्तपापो दिवं व्रजेत् ॥ १०० ॥ वहाँ कुएँका जल लेकर उससे स्नान करके पवित्र हो देवताओं और पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्यके सारे पाप छूट जाते हैं और वह स्वर्गलोकमें जाता है ॥ १०० ॥ मतङ्गस्याश्रमस्तत्र महर्षेर्भावितात्मनः। तं प्रविश्याश्रमं श्रीमच्छ्रमशोकविनाशनम् ॥ १०१ ॥ गवामयनयज्ञस्य फलं प्राप्नोति मानवः। धर्मं तत्राभिसंस्पृश्य वाजिमेधमवाप्नुयात् ॥ १०२ ॥ वहीं भावितात्मा महर्षि मतंगका आश्रम है। श्रम और शोकका विनाश करनेवाले उस सुन्दर आश्रममें प्रवेश करनेसे मनुष्य गवामयनयज्ञका फल पाता है। वहाँ धर्मके निकट जा उनके श्रीविग्रहका दर्शन और स्पर्श करनेसे अश्वमेधयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मस्थानमनुत्तमम्। तत्राभिगम्य राजेन्द्र ब्रह्माणं पुरुषर्षभ ॥ १०३ ॥ राजसूयाश्वमेधाभ्यां फलं विन्दति मानवः। राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम ब्रह्मस्थानको जाय। महाराज! पुरुषोत्तम! वहाँ ब्रह्माजीके समीप जाकर मनुष्य राजसूय और अश्वमेधयज्ञोंका फल पाता है ॥ १०३ १/२ ॥ ततो राजगृहं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ॥ १०४ ॥ उपस्पृश्य ततस्तत्र कक्षीवानिव मोदते। यक्षिण्या नैत्यकं तत्र प्राश्नीत पुरुषः शुचिः ॥ १०५ ॥ यक्षिण्यास्तु प्रसादेन मुच्यते ब्रह्महत्यया। नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी मनुष्य राजगृहको जाय। वहाँ स्नान करके वह कक्षीवान्के समान प्रसन्न होता है। उस तीर्थमें पवित्र होकर पुरुष यक्षिणीदेवीका नैवेद्य भक्षण करे। यक्षिणीके प्रसादसे वह ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है ॥ १०४-१०५ १/२ ॥ मणिनागं ततो गत्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १०६ ॥ तदनन्तर मणिनागतीर्थमें जाकर तीर्थयात्री सहस्र गोदानका फल प्राप्त करे ॥ १०६ ॥ तैर्थिकं भुञ्जते यस्तु मणिनागस्य भारत। दष्टस्याशीविषेणापि न तस्य क्रमते विषम् ॥ १०७ ॥ तत्रोष्य जननीमेकां गोसहस्रफलं लभेत्। भरतनन्दन! जो मणिनागका तीर्थप्रसाद (नैवेद्य, चरणामृत आदि)-का भक्षण करता है, उसे साँप काट ले तो भी उसपर विषका असर नहीं होता। वहाँ एक रात रहनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ १०७ १/२ ॥