भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 637

ऋषीणामुत्तरीयेषु सूपविष्टो यथासुखम् ॥ ४७ ॥ एक समय उन ऋषियोंको सारा वेद भूल गया। इस प्रकार वेदोंके नष्ट होने (भूल जाने)-पर अंगिरा मुनिका पुत्र ऋषियोंके उत्तरीय वस्त्रों (चादरों)-में छिपकर सुखपूर्वक बैठ गया (और विधिपूर्वक ॐकारका उच्चारण करने लगा) ॥ ४७ ॥ ओङ्कारेण यथान्यायं सम्यगुच्चारितेन ह । येन यत् पूर्वमभ्यस्तं तत् सर्वं समुपस्थितम् ॥ ४८ ॥ नियमके अनुसार ॐकारका ठीक-ठीक उच्चारण होनेपर, जिसने पूर्वकालमें जिस वेदका अध्ययन एवं अभ्यास किया था, उसे वह सब स्मरण हो आया ॥ ४८ ॥ ऋषयस्तत्र देवाश्च वरुणोऽग्निः प्रजापतिः । हर्निरायणस्तत्र महादेवस्तथैव च ॥ ४९ ॥ उस समय वहाँ बहुत-से ऋषि, देवता, वरुण, अग्नि, प्रजापति, भगवान् नारायण और महादेवजी भी उपस्थित हुए ॥ ४९ ॥ पितामहश्च भगवान् देवैः सह महाद्युतिः । भृगुं नियोजयामास याजनार्थं महाद्युतिम् ॥ ५० ॥ महातेजस्वी भगवान् ब्रह्माने देवताओंके साथ जाकर परम कान्तिमान् भृगुको यज्ञ करानेके कामपर नियुक्त किया ॥ ५० ॥ ततः स चक्रे भगवानृषीणां विधिवत् तदा । सर्वेषां पुनराधानं विधिदृष्टेन कर्मणा ॥ ५१ ॥ आज्यभागेन तत्राग्निं तर्पयित्वा यथाविधि । देवाः स्वभवनं याता ऋषयश्च यथाक्रमम् ॥ ५२ ॥ तदनन्तर भगवान् भृगुने वहाँ सब ऋषियोंके यहाँ शास्त्रीय विधिके अनुसार पुनः भलीभाँति अग्निस्थापन कराया। उस समय आज्यभागके द्वारा विधिपूर्वक अग्निको तृप्त करके सब देवता और ऋषि क्रमशः अपने-अपने स्थानको चले गये ॥ ५१-५२ ॥ तदरण्यं प्रविष्टस्य तुङ्गकं राजसत्तम । पापं प्रणश्यत्यखिलं स्त्रियो वा पुरुषस्य वा ॥ ५३ ॥ नृपश्रेष्ठ! उस तुंगकारण्यमें प्रवेश करते ही स्त्री या पुरुष सबके पाप नष्ट हो जाते हैं ॥ ५३ ॥ तत्र मासं वसेद् धीरो नियतो नियताशनः । ब्रह्मलोकं व्रजेद् राजन् कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ५४ ॥ धीर पुरुषको चाहिये कि वह नियमपालनपूर्वक नियमित भोजन करते हुए एक मासतक वहाँ रहे। राजन् ऐसा करनेवाला तीर्थयात्री ब्रह्मलोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ५४ ॥ मेधाविकं समासाद्य पितॄन् देवांश्च तर्पयेत् ।