महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 638, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंअग्निष्टोममवाप्नोति स्मृतिं मेधां च विन्दति ॥ ५५ ॥ तत्पश्चात् मेधाविकीतीर्थमें जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करे; ऐसा करनेवाला पुरुष अग्निष्टोमयागका फल पाता और स्मृति एवं बुद्धिको प्राप्त कर लेता है ॥
अत्र कालञ्जरं नाम पर्वतं लोकविश्रुतम् । तत्र देवह्रदे स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५६ ॥ इस तीर्थमें कालंजर नामक लोकविख्यात पर्वत है, वहाँ देवह्रद नामक तीर्थमें स्नान करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ५६ ॥
योः स्नातः साधयेत् तत्र गिरौ कालञ्जरे नृप । स्वर्गलोके महीयेत नरो नास्त्यत्र संशयः ॥ ५७ ॥ राजन्! जो कालंजर पर्वतपर स्नान करके वहाँ साधन करता है, वह मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है; इसमें संशय नहीं है ॥ ५७ ॥
ततो गिरिवरश्रेष्ठे चित्रकूट विशाम्पते । मन्दाकिनीं समासाद्य सर्वपापप्रणाशिनीम् ॥ ५८ ॥ तत्राभिषेकं कुर्वाणः पितृदेवार्चने रतः । अश्वमेधमवाप्नोति गतिं च परमां व्रजेत् ॥ ५९ ॥ राजन्! तदनन्तर पर्वतश्रेष्ठ चित्रकूटमें सब पापोंका नाश करनेवाली मन्दाकिनीके तटपर पहुँचकर उसमें स्नान करे और देवताओं तथा पितरोंकी पूजामें लग जाय। इससे वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता और परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ५८-५९ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ भर्तृस्थानमनुत्तमम् । यत्र नित्यं महासेनो गुहः संनिहितो नृप ॥ ६० ॥ तत्र गत्वा नृपश्रेष्ठ गमनादेव सिध्यति । धर्मज्ञ नरेश! तत्पश्चात् तीर्थयात्री परम उत्तम भर्तृस्थानकी यात्रा करे, जहाँ महासेन कार्तिकेयजी निवास करते हैं। नृपश्रेष्ठ! वहाँ जानेमात्रसे सिद्धि प्राप्त होती है ॥ ६०१/२ ॥
कोटितीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ६१ ॥ प्रदक्षिणमुपावृत्य ज्येष्ठस्थानं व्रजेन्नरः । अभिगम्य महादेवं विराजति यथा शशी ॥ ६२ ॥ कोटितीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है। उसकी परिक्रमा करके तीर्थयात्री मानव ज्येष्ठस्थानको जाय। वहाँ महादेवजीका दर्शन-पूजन करनेसे वह चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है ॥
तत्र कूपे महाराज विश्रुता भरतर्षभ । समुद्रास्तत्र चत्वारो निवसन्ति युधिष्ठिर ॥ ६३ ॥ भरतकुलभूषण महाराज युधिष्ठिर! वहाँ एक कूप है जिसमें चारों समुद्र निवास करते हैं ॥ ६३ ॥