भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

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पृष्ठ 617

ऋषिकुल्यामें जाकर स्नान करके पापरहित मानव देवताओं और पितरोंकी पूजा करके ऋषिलोकमें जाता है ।। ४९ ।। यदि तत्र वसेन्मासं शाकाहारो नराधिप । भृगुतुङ्गं समासाद्य वाजिमेधफलं लभेत् ।। ५० ।। नरेश्वर! यदि मनुष्य भृगुतुंगमें जाकर शाकाहारी हो वहाँ एक मासतक निवास करे तो उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है ।। ५० ।। गत्वा वीरप्रमोक्षं च सर्वपापैः प्रमुच्यते । कृत्तिकामघयोश्चैव तीर्थमासाद्य भारत ।। ५१ ।। अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलमाप्नोति मानवः । तत्र संध्यां समासाद्य विद्यातीर्थमनुत्तमम् ।। ५२ ।। उपस्पृश्य च वै विद्यां यत्र तत्रोपपद्यते । महाश्रमे वसेद् रात्रिं सर्वपापप्रमोचने ।। ५३ ।। एककालं निराहारो लोकानावसते शुभान् । वीरप्रमोक्षतीर्थमें जाकर मनुष्य सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है। भारत! कृत्तिका और मघाके तीर्थमें जाकर मानव अग्निष्टोम और अतिरात्र यज्ञोंका फल पाता है। वहीं प्रातः-संध्याके समय परम उत्तम विद्यातीर्थमें जाकर स्नान करनेसे मनुष्य जहाँ-कहीं भी विद्या प्राप्त कर लेता है। जो सब पापोंसे छुड़ानेवाले महाश्रमतीर्थमें एक समय उपवास करके एक रात वहीं निवास करता है, उसे शुभ लोकोंकी प्राप्ति होती है ।। ५१-५३ १/२ ।। षष्ठकालोपवासेन मासमुष्य महालये ।। ५४ ।। सर्वपापविशुद्धात्मा विन्देद् बहुसुवर्णकम् । दशापरान् दश पूर्वान् नरानुद्धरते कुलम् ।। ५५ ।। जो छठे समय उपवासपूर्वक एक मासतक महालयतीर्थमें निवास करता है, वह सब पापोंसे शुद्धचित्त हो प्रचुर सुवर्णराशि प्राप्त करता है। साथ ही दस पहलेकी और दस बादकी पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है ।। अथ वेतसिकां गत्वा पितामहनिषेविताम् । अश्वमेधमवाप्नोति गच्छेद्दौशनसीं गतिम् ।। ५६ ।। तत्पश्चात् ब्रह्माजीके द्वारा सेवित वेतसिकातीर्थमें जाकर मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और शुक्राचार्यके लोकमें जाता है ।। ५६ ।। अथ सुन्दरिकातीर्थं प्राप्य सिद्धनिषेवितम् । रूपस्य भागी भवति दृष्टमेतत् पुरातनैः ।। ५७ ।। तदनन्तर सिद्धसेवित सुन्दरिकातीर्थमें जाकर मनुष्य रूपका भागी होता है, यह बात प्राचीन ऋषियोंने देखी है ।। ५७ ।। ततो वै ब्राह्मणीं गत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रियः ।