महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 616, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंसामुद्रकमुपस्पृश्य ब्रह्मचारी समाहितः ।। ४१ ।। अश्वमेधमवाप्नोति त्रिरात्रोपोषितो नरः । गोसहस्रफलं विद्यात् कुलं चैव समुद्धरेत् ।। ४२ ।। नरपते! तत्पश्चात् तीर्थसेवी अरुन्धतीवटके समीप जाय और सामुद्रकतीर्थमें स्नान करके ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो तीन रात उपवास करे। इससे मनुष्य अश्वमेधयज्ञ और सहस्र गोदानका फल पाता तथा अपने कुलका उद्धार कर देता है ।। ४१-४२ ।। ब्रह्मावर्तं ततो गच्छेद् ब्रह्मचारी समाहितः । अश्वमेधमवाप्नोति सोमलोकं च गच्छति ।। ४३ ।। तदनन्तर ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक चित्तको एकाग्र करके ब्रह्मावर्ततीर्थमें जाय। इससे वह अश्वमेधयज्ञका फल पाता और सोमलोकको जाता है ।। ४३ ।। यमुनाप्रभवं गत्वा समुपस्पृश्य यामुनम् । अश्वमेधफलं लब्ध्वा स्वर्गलोके महीयते ।। ४४ ।। यमुनाप्रभव नामक तीर्थमें जाकर यमुनाजलमें स्नान करके अश्वमेधयज्ञका फल पाकर मनुष्य स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ।। ४४ ।। दर्वीसंक्रमणं प्राप्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम् । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ४५ ।। दर्वीसंक्रमण नामक त्रिभुवनपूजित तीर्थमें जानेसे तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ४५ ।। सिन्धोश्च प्रभवं गत्वा सिद्धगन्धर्वसेवितम् । तत्रोष्य रजनीः पञ्च विन्देद् बहुसुवर्णकम् ।। ४६ ।। सिंधुके उद्गमस्थानमें जो सिद्ध-गन्धर्वोंद्वारा सेवित है, जाकर पाँच रात उपवास करनेसे प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है ।। ४६ ।। अथ वेदीं समासाद्य नरः परमदुर्गमाम् । अश्वमेधमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ।। ४७ ।। तदनन्तर मनुष्य परम दुर्गम वेदीतीर्थमें जाकर अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्गलोकमें जाता है ।। ४७ ।। ऋषिकुल्यां समासाद्य वासिष्ठं चैव भारत । वासिष्ठीं समतिक्रम्य सर्वे वर्णा द्विजातयः ।। ४८ ।। भरतनन्दन! ऋषिकुल्या एवं वासिष्ठतीर्थमें जाकर स्नान आदि करके वासिष्ठीको लाँघकर जानेवाले क्षत्रिय आदि सभी वर्णोंके लोग द्विजाति हो जाते हैं ।। ४८ ।। ऋषिकुल्यां समासाद्य नरः स्नात्वा विकल्मषः । देवान् पितॄंश्चार्चयित्वा ऋषिलोकं प्रपद्यते ।। ४९ ।।