महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 615, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्राभिषेकं कुर्वीत नागतीर्थे नराधिप । कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः ॥ ३३ ॥ महाराज! वहाँ नागतीर्थमें स्नान करना चाहिये। इससे मनुष्यको सहस्र कपिलादानका फल प्राप्त होता है ॥ ३३ ॥ ततो ललितकं गच्छेच्छान्तनोस्तीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा नरो राजन् न दुर्गतिमवाप्नुयात् ॥ ३४ ॥ तत्पश्चात् शान्तनुके उत्तम तीर्थ ललितकमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता ॥ ३४ ॥ गङ्गायमुनयोर्मध्ये स्नाति यः संगमे नरः । दशाश्वमेधानाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत् ॥ ३५ ॥ जो मनुष्य गंगा-यमुनाके बीच संगम (प्रयाग)-में स्नान करता है, उसे दस अश्वमेधयज्ञोंका फल मिलता है और वह अपने कुलका उद्धार कर देता है ॥ ३५ ॥ ततो गच्छेत राजेन्द्र सुगन्धां लोकविश्रुताम् । सर्वपापविशुद्धात्मा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ३६ ॥ राजेन्द्र! तदनन्तर लोकविख्यात सुगन्धातीर्थकी यात्रा करे। इससे सब पापोंसे विशुद्धचित्त हुआ मानव ब्रह्मलोकमें पूजित होता है ॥ ३६ ॥ रुद्रावर्तं ततो गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप । तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ३७ ॥ नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष रुद्रावर्ततीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें जाता है ॥ ३७ ॥ गङ्गायाश्च नरश्रेष्ठ सरस्वत्याश्च संगमे । स्नात्वाश्वमेधं प्राप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ३८ ॥ नरश्रेष्ठ! गंगा और सरस्वतीके संगममें स्नान करनेसे मनुष्य अश्वमेधयज्ञका फल पाता और स्वर्ग-लोकमें जाता है ॥ ३८ ॥ भद्रकर्णेश्वरं गत्वा देवमर्च्य यथाविधि । न दुर्गतिमवाप्नोति नाकपृष्ठे च पूज्यते ॥ ३९ ॥ भगवान् भद्रकर्णेश्वरके समीप जाकर विधिपूर्वक उनकी पूजा करनेवाला पुरुष कभी दुर्गतिमें नहीं पड़ता और स्वर्गलोकमें पूजित होता है ॥ ३९ ॥ ततः कुब्जाम्रकं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप । गोसहस्रमवाप्नोति स्वर्गलोकं च गच्छति ॥ ४० ॥ नरेन्द्र! तत्पश्चात् तीर्थसेवी मानव कुब्जाम्रक-तीर्थमें जाय। वहाँ उसे सहस्र गोदानका फल मिलता है और अन्तमें वह स्वर्गलोकको जाता है ॥ ४० ॥ अरुन्धतीवटं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप ।