भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 606, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 606

अभिगम्य महादेवं मुच्यते सर्वकिल्बिषैः ॥ १७१ ॥
महाराज! वहीं विश्वनाथ उमावल्लभ महादेवजीका स्थान है। वहाँकी यात्रा करके मनुष्य सब पापोंसे छूट जाता है॥ १७१ ॥
नारायणं चाभिगम्य पद्मनाभमरिंदम।
राजमानो महाराज विष्णुलोकं च गच्छति ॥ १७२ ॥
तीर्थेषु सर्वदेवानां स्नातः स पुरुषर्षभ।
सर्वदुःखैः परित्यक्तो द्योतते शशिवन्नरः ॥ १७३ ॥
शत्रुदमन महाराज! पद्मनाभ भगवान् नारायणके निकट जाकर (उनका दर्शन करके) मनुष्य तेजस्वी रूप धारण करके भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। पुरुषरत्न! सब देवताओंके तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य सब दुःखोंसे मुक्त हो चन्द्रमाके समान प्रकाशित होता है॥ १७२-१७३ ॥
ततः स्वस्तिपुरं गच्छेत् तीर्थसेवी नराधिप।
प्रदक्षिणमुपावृत्य गोसहस्रफलं लभेत् ॥ १७४ ॥
नरेश्वर! तदनन्तर तीर्थसेवी पुरुष स्वस्तिपुरमें जाय, उसकी परिक्रमा करनेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है॥ १७४ ॥
पावनं तीर्थमासाद्य तर्पयेत् पितृदेवताः।
अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फलं प्राप्नोति भारत ॥ १७५ ॥
तत्पश्चात् पावनतीर्थमें जाकर देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। भारत! ऐसा करनेवाले पुरुषको अग्निष्टोमयज्ञका फल मिलता है॥ १७५ ॥
गङ्गाह्रदश्च तत्रैव कूपश्च भरतर्षभ।
तिस्रः कोट्यस्तु तीर्थानां तस्मिन् कूपे महीपते ॥ १७६ ॥
भरतश्रेष्ठ! वहीं गंगाह्रद नामक कूप है। भूपाल! उस कूपमें तीन करोड़ तीर्थोंका वास है॥ १७६ ॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन् स्वर्गलोकं प्रपद्यते।
आपगायां नरः स्नात्वा अर्चयित्वा महेश्वरम् ॥ १७७ ॥
गाणपत्यमवाप्नोति कुलं चैव समुद्धरेत्।
राजन्! उसमें स्नान करके मानव स्वर्गलोकमें जाता है। जो मनुष्य आपगामें स्नान करके महादेवजीकी पूजा करता है, वह गणपति-पद पाता और अपने कुलका उद्धार कर देता है॥ १७७ १/२ ॥
ततः स्थाणुवटं गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् ॥ १७८ ॥
तत्र स्नात्वा स्थितो रात्रिं रुद्रलोकमवाप्नुयात्।
तदनन्तर त्रिभुवनविख्यात स्थाणुवटतीर्थमें जाय, वहाँ स्नान करके रातभर निवास करनेवाला मनुष्य रुद्रलोकमें जाता है॥ १७८ १/२ ॥

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