महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंबदरीपाचनं गच्छेद्वसिष्ठस्याश्रमं ततः ॥ १७९ ॥
बदरीं भक्षयेत् तत्र त्रिरात्रोपोषितो नरः ।
सम्यग् द्वादशवर्षाणि बदरीं भक्षयेत् तु यः ॥ १८० ॥
त्रिरात्रोपोषितस्तेन भवेत् तुल्यो नराधिप ।
रुद्रमार्गं समासाद्य तीर्थसेवी नराधिप ॥ १८१ ॥
अहोरात्रोपवासेन शक्रलोके महीयते ।
तदनन्तर बदरीपाचन नामसे प्रसिद्ध वसिष्ठके आश्रमपर जाय और वहाँ तीन रात उपवासपूर्वक रहकर बेरका फल खाय। जो मनुष्य वहाँ बारह वर्षोंतक भलीभाँति त्रिरात्रोपवासपूर्वक बेरका फल खाता है, वह उन्हीं वसिष्ठके समान होता है। राजन्! नरेश्वर! तीर्थसेवी मनुष्य रुद्रमार्गमें जाकर एक दिन-रात उपवास करे। इससे वह इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ १७९-१८१ १/२ ॥
एकरात्रं समासाद्य एकरात्रोषितो नरः ॥ १८२ ॥
नियतः सत्यवादी च ब्रह्मलोके महीयते ।
तदनन्तर एकरात्रतीर्थमें जाकर मनुष्य नियमपूर्वक और सत्यवादी होकर एक रात निवास करनेपर ब्रह्मलोकमें पूजित होता है ॥ १८२ १/२ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ॥ १८३ ॥
आदित्यस्याश्रमो यत्र तेजोरशेर्महात्मनः ।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा पूजयित्वा विभावसुम् ॥ १८४ ॥
आदित्यलोकं व्रजति कुलं चैव समुद्धरेत् ।
राजेन्द्र! तत्पश्चात् उस त्रैलोक्यविख्यात तीर्थमें जाय, जहाँ तेजोरशि महात्मा सूर्यका आश्रम है। उसमें स्नान करके सूर्यदेवकी पूजा करनेसे मनुष्य सूर्यके लोकमें जाता और अपने कुलका उद्धार करता है ॥ १८३-१८४ १/२ ॥
सोमतीर्थे नरः स्नात्वा तीर्थसेवी नराधिप ॥ १८५ ॥
सोमलोकमवाप्नोति नरो नास्त्यत्र संशयः ।
नरेश्वर! सोमतीर्थमें स्नान करके तीर्थसेवी मानव सोमलोकको प्राप्त कर लेता है, इसमें संशय नहीं है ॥ १८५ १/२ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ दधीचस्य महात्मनः ॥ १८६ ॥
तीर्थं पुण्यतमं राजन् पावनं लोकविश्रुतम् ।
यत्र सारस्वतो यातः सोऽङ्गिरास्तपसो निधिः ॥ १८७ ॥
धर्मज्ञ राजन्! तदनन्तर महात्मा दधीचके लोक-विख्यात परम पुण्यमय, पावन तीर्थकी यात्रा करे। जहाँ तपस्याके भण्डार सरस्वतीपुत्र अंगिराका जन्म हुआ ॥ १८६-१८७ ॥
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा वाजिमेधफलं लभेत् ।
सारस्वतीं गतिं चैव लभते नात्र संशयः ॥ १८८ ॥