भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 591

भरतवंशी महाराज! वहीं मातृतीर्थ है, जिसमें स्नान करनेवाले पुरुषकी संतति बढती है और वह कभी क्षीण न होनेवाली सम्पत्तिका उपभोग करता है ॥

ततः सीतवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।
तीर्थं तत्र महाराज महदन्यत्र दुर्लभम् ॥ ५९ ॥
तदनन्तर नियमसे रहकर नियमित भोजन करते हुए सीतवनमें जाय। महाराज! वहाँ महान् तीर्थ है, जो अन्यत्र दुर्लभ है ॥ ५९ ॥

पुनाति गमनादेव दृष्टमेकं नराधिप ।
केशानभ्युक्ष्य वै तस्मिन् पूतो भवति भारत ॥ ६० ॥
नरेश्वर! वह तीर्थ एक बार जाने या दर्शन करनेसे ही पवित्र कर देता है। भारत! उसमें केशोंको धो लेने मात्रसे ही मनुष्य पवित्र हो जाता है ॥ ६० ॥

तीर्थं तत्र महाराज श्वाविल्लोमापहं स्मृतम् ।
यत्र विप्रा नरव्याघ्र विद्वांसस्तीर्थतत्पराः ॥ ६१ ॥
प्रीतिं गच्छन्ति परमां स्नात्वा भरतसत्तम ।
श्वाविल्लोमापनयने तीर्थे भरतसत्तम ॥ ६२ ॥
प्राणायामैर्निर्हरन्ति स्वलोमानि द्विजोत्तमाः ।
पूतात्मानश्च राजेन्द्र प्रयान्ति परमां गतिम् ॥ ६३ ॥
महाराज! वहाँ श्वाविल्लोमापह नामक तीर्थ है। नरव्याघ्र! उसमें तीर्थपरायण हुए विद्वान् ब्राह्मण स्नान करके बड़े प्रसन्न होते हैं। भरतसत्तम! श्वाविल्लोमापनयनतीर्थमें प्राणायाम (योगकी क्रिया) करनेसे श्रेष्ठ द्विज अपने रोएँ झाड़ देते हैं तथा राजेन्द्र! वे शुद्धचित्त होकर परमगतिको प्राप्त होते हैं ॥ ६१—६३ ॥

दशाश्वमेधिकं चैव तस्मिंस्तीर्थे महीपते ।
तत्र स्नात्वा नरव्याघ्र गच्छेत परमां गतिम् ॥ ६४ ॥
भूपाल! वहीं दशाश्वमेधिकतीर्थ भी है। पुरुषसिंह! उसमें स्नान करके मनुष्य उत्तम गति प्राप्त करता है ॥ ६४ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र मानुषं लोकविश्रुतम् ।
यत्र कृष्णमृगा राजन् व्याधेन शरपीडिताः ॥ ६५ ॥
विगाह्य तस्मिन् सरसि मानुषत्वमुपागताः ।
तस्मिंस्तीर्थे नरः स्नात्वा ब्रह्मचारी समाहितः ॥ ६६ ॥
सर्वपापविशुद्धात्मा स्वर्गलोके महीयते ।
राजेन्द्र! तदनन्तर लोकविख्यात मानुषतीर्थमें जाय। राजन्! वहाँ व्याधके बाणोंसे पीडित हुए कृष्णमृग उस सरोवरमें गोते लगाकर मनुष्य-शरीर पा गये थे, इसीलिये उसका नाम मानुषतीर्थ है। ब्रह्मचर्यपालन-पूर्वक एकाग्रचित्त हो उस तीर्थमें स्नान करनेवाला मानव सब पापोंसे मुक्त हो स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ६५-६६ ½ ॥