भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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तत्राभिषेकं कुर्वाणो गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ५० ॥
तदनन्तर तीर्थसेवी क्रमशः गोभवनतीर्थमें जाकर वहाँ स्नान करे। इससे उसको सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ५० ॥
शङ्खिनीतीर्थमासाद्य तीर्थसेवी कुरुद्वह ।
देव्यास्तीर्थे नरः स्नात्वा लभते रूपमुत्तमम् ॥ ५१ ॥
कुरुश्रेष्ठ! तीर्थयात्री पुरुष शांखिनीतीर्थमें जाकर वहाँ देवीतीर्थमें स्नान करनेसे उत्तम रूप प्राप्त करता है ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र द्वारपालमरन्तुकम् ।
तच्च तीर्थं सरस्वत्यां यक्षेन्द्रस्य महात्मनः ॥ ५२ ॥
तत्र स्नात्वा नरो राजन्नग्निष्टोमफलं लभेत् ।
राजेन्द्र! तदनन्तर अरन्तुक नामक द्वारपालके पास जाय। महात्मा यक्षराज कुबेरका वह तीर्थ सरस्वती नदीमें है। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मनुष्यको अग्निष्टोमयज्ञका फल प्राप्त होता है ॥ ५२ ½ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मावर्तं नरोत्तमः ॥ ५३ ॥
ब्रह्मावर्ते नरः स्नात्वा ब्रह्मलोकमवाप्नुयात् ।
राजेन्द्र! तदनन्तर श्रेष्ठ मानव ब्रह्मावर्ततीर्थको जाय। ब्रह्मावर्तमें स्नान करके मनुष्य ब्रह्मलोकको प्राप्त कर लेता है ॥ ५३ ½ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र सुतीर्थकमनुत्तमम् ॥ ५४ ॥
तत्र संनिहिता नित्यं पितरो दैवतैः सह ।
तत्राभिषेकं कुर्वीत पितृदेवार्चने रतः ॥ ५५ ॥
अश्वमेधमवाप्नोति पितृलोकं च गच्छति ।
राजेन्द्र! वहाँसे परम उत्तम सुतीर्थमें जाय। वहाँ देवतालोग पितरोंके साथ सदा विद्यमान रहते हैं। वहाँ पितरों और देवताओंके पूजनमें तत्पर हो स्नान करे। इससे तीर्थयात्री अश्वमेधयज्ञका फल पाता और पितृलोकमें जाता है ॥ ५४-५५ ½ ॥
ततोऽम्बुमतयां धर्मज्ञ सुतीर्थकमनुत्तमम् ॥ ५६ ॥
धर्मज्ञ! वहाँसे अम्बुमतीमें, जो परम उत्तम तीर्थ है, जाय ॥ ५६ ॥
काशीश्वरस्य तीर्थेषु स्नात्वा भरतसत्तम ।
सर्वव्याधिविनिर्मुक्तो ब्रह्मलोके महीयते ॥ ५७ ॥
भरतश्रेष्ठ! काशीश्वरके तीर्थोंमें स्नान करके मनुष्य सब रोगोंसे मुक्त हो जाता और ब्रह्मलोकमें प्रतिष्ठित होता है ॥ ५७ ॥
मातृतीर्थं च तत्रैव यत्र स्नातस्य भारत ।
प्रजा विवर्धते राजन्नतन्वीं श्रियमश्नुते ॥ ५८ ॥