महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंराजन्! इस प्रकार वर देकर परशुरामजीके पितर प्रसन्नतापूर्वक उनसे अनुमति ले वहीं अन्तर्धान हो गये। इस प्रकार भृगुनन्दन महात्मा परशुरामके वे कुण्ड बड़े पुण्यमय माने गये हैं। राजन्! जो उत्तम व्रत एवं ब्रह्मचर्यका पालन करते हुए परशुरामजीके उन कुण्डोंके जलमें स्नान करके उनकी पूजा करता है, उसे प्रचुर सुवर्णराशिकी प्राप्ति होती है। कुरुश्रेष्ठ! तदनन्तर तीर्थसेवी मनुष्य वंशमूलकतीर्थमें जाय। राजन्! वंशमूलकमें स्नान करके मनुष्य अपने कुलका उद्धार कर देता है। भरतश्रेष्ठ! कायशोधनतीर्थमें जाकर स्नान करनेसे शरीरकी शुद्धि होती है, इसमें संशय नहीं। शरीर शुद्ध होनेपर मनुष्य परम उत्तम कल्याणमय लोकोंमें जाता है ॥ ३९—४३ ॥
ततो गच्छेत धर्मज्ञ तीर्थं त्रैलोक्यविश्रुतम् ।
लोका यत्रोद्धताः पूर्वं विष्णुना प्रभविष्णुना ॥ ४४ ॥
लोकोद्धारं समासाद्य तीर्थं त्रैलोक्यपूजितम् ।
स्नात्वा तीर्थवरे राजँल्लोकानुद्धरते स्वकान् ॥ ४५ ॥
धर्मज्ञ! तदनन्तर त्रिभुवनविख्यात लोकोद्धारतीर्थमें जाय, जो तीनों लोकोंमें पूजित है। वहाँ पूर्वकालमें सर्वशक्तिमान् भगवान् विष्णुने कितने ही लोकोंका उद्धार किया था। राजन्! लोकोद्धारमें जाकर उस उत्तम तीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य आत्मीय जनोंका उद्धार करता है ॥ ४४-४५ ॥
श्रीतीर्थं च समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः ।
अर्चयित्वा पितॄन् देवान् विन्दते श्रियमुत्तमाम् ॥ ४६ ॥
मनको वशमें करके श्रीतीर्थमें जाकर स्नान करके देवताओं और पितरोंकी पूजा करनेसे मनुष्य उत्तम सम्पत्ति प्राप्त करता है ॥ ४६ ॥
कपिलातीर्थमासाद्य ब्रह्मचारी समाहितः ।
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन् स्वान् दैवतान्यपि ॥ ४७ ॥
कपिलानां सहस्रस्य फलं विन्दति मानवः ।
कपिला-तीर्थमें जाकर ब्रह्मचर्यके पालनपूर्वक एकाग्रचित्त हो वहाँ स्नान और देवता-पितरोंका पूजन करके मानव सहस्र कपिला गौओंके दानका फल प्राप्त करता है ॥ ४७½ ॥
सूर्यतीर्थं समासाद्य स्नात्वा नियतमानसः ॥ ४८ ॥
अर्चयित्वा पितॄन् देवानुपवासपरायणः ।
अग्निष्टोममवाप्नोति सूर्यलोकं च गच्छति ॥ ४९ ॥
मनको वशमें करके सूर्यतीर्थमें जाकर स्नान और देवता-पितरोंका अर्चन करके उपवास करनेवाला मनुष्य अग्निष्टोमयक़ा फल पाता और सूर्यलोकमें जाता है ॥ ४८-४९ ॥
गवां भवनमासाद्य तीर्थसेवी यथाक्रमम् ।