महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 594, कुल 2580 में से
संदर्भ में पढ़ेंतत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रणाशिनी ॥ ८४ ॥
तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात त्रिविष्टपतीर्थमें जाय। वहाँ वैतरणी नामक पुण्यमयी
पापनाशिनी नदी है ॥
तत्र स्नात्वार्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् ।
सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ॥ ८५ ॥
उसमें स्नान करके शूलपाणि भगवान् शंकरकी पूजा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे
शुद्धचित्त हो परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ८५ ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र फलकीवनमुत्तमम् ।
तत्र देवाः सदा राजन् फलकीवनमाश्रिताः ॥ ८६ ॥
तपश्चरन्ति विपुलं बहु वर्षसहस्रकम् ।
दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८७ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ।
तीर्थे च सर्वदेवानां स्नात्वा भरतसत्तम ॥ ८८ ॥
गोसहस्रस्य राजेन्द्र फलं विन्दति मानवः ।
पाणिखाते नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८९ ॥
अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ।
राजसूयमवाप्नोति ऋषिलोकं च विन्दति ॥ ९० ॥
राजेन्द्र! वहाँसे फलकीवन नामक उत्तम तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! देवतालोग
फलकीवनमें सदा निवास करते हैं और अनेक सहस्र वर्षोंतक वहाँ भारी तपस्यामें लगे रहते
हैं। भारत! दृषद्वतीमें स्नान करके देवता-पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और
अतिरात्र यज्ञोंका फल पाता है। भरतसत्तम राजेन्द्र! सर्वदेवतीर्थमें स्नान करनेसे मानव
सहस्र गोदानका फल पाता है। भारत! पाणिखाततीर्थमें स्नान करके देवता-पितरोंका तर्पण
करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्रयज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त कर लेता है; साथ
ही वह राजसूययज्ञका फल पाता एवं ऋषिलोकमें जाता है ॥
ततो गच्छेत राजेन्द्र मिश्रकं तीर्थमुत्तमम् ।
तत्र तीर्थानि राजेन्द्र मिश्रितानि महात्मना ॥ ९१ ॥
व्यासेन नृपशार्दूल द्विजार्थमिति नः श्रुतम् ।
सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ॥ ९२ ॥
राजेन्द्र! तत्पश्चात् परम उत्तम मिश्रकतीर्थमें जाय। महाराज! वहाँ महात्मा व्यासने
द्विजोंके लिये सभी तीर्थोंका सम्मिश्रण किया है; यह बात मेरे सुननेमें आयी है। जो मनुष्य
मिश्रकतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान सभी तीर्थोंमें स्नान करनेके समान
है ॥ ९१-९२ ॥
ततो व्यासवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।