भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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तत्र वैतरणी पुण्या नदी पापप्रणाशिनी ॥ ८४ ॥

तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात त्रिविष्टपतीर्थमें जाय। वहाँ वैतरणी नामक पुण्यमयी

पापनाशिनी नदी है ॥

तत्र स्नात्वार्चयित्वा च शूलपाणिं वृषध्वजम् ।

सर्वपापविशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् ॥ ८५ ॥

उसमें स्नान करके शूलपाणि भगवान् शंकरकी पूजा करनेसे मनुष्य सब पापोंसे

शुद्धचित्त हो परम गतिको प्राप्त होता है ॥ ८५ ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र फलकीवनमुत्तमम् ।

तत्र देवाः सदा राजन् फलकीवनमाश्रिताः ॥ ८६ ॥

तपश्चरन्ति विपुलं बहु वर्षसहस्रकम् ।

दृषद्वत्यां नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८७ ॥

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ।

तीर्थे च सर्वदेवानां स्नात्वा भरतसत्तम ॥ ८८ ॥

गोसहस्रस्य राजेन्द्र फलं विन्दति मानवः ।

पाणिखाते नरः स्नात्वा तर्पयित्वा च देवताः ॥ ८९ ॥

अग्निष्टोमातिरात्राभ्यां फलं विन्दति भारत ।

राजसूयमवाप्नोति ऋषिलोकं च विन्दति ॥ ९० ॥

राजेन्द्र! वहाँसे फलकीवन नामक उत्तम तीर्थकी यात्रा करे। राजन्! देवतालोग

फलकीवनमें सदा निवास करते हैं और अनेक सहस्र वर्षोंतक वहाँ भारी तपस्यामें लगे रहते

हैं। भारत! दृषद्वतीमें स्नान करके देवता-पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और

अतिरात्र यज्ञोंका फल पाता है। भरतसत्तम राजेन्द्र! सर्वदेवतीर्थमें स्नान करनेसे मानव

सहस्र गोदानका फल पाता है। भारत! पाणिखाततीर्थमें स्नान करके देवता-पितरोंका तर्पण

करनेसे मनुष्य अग्निष्टोम और अतिरात्रयज्ञोंसे मिलनेवाले फलको प्राप्त कर लेता है; साथ

ही वह राजसूययज्ञका फल पाता एवं ऋषिलोकमें जाता है ॥

ततो गच्छेत राजेन्द्र मिश्रकं तीर्थमुत्तमम् ।

तत्र तीर्थानि राजेन्द्र मिश्रितानि महात्मना ॥ ९१ ॥

व्यासेन नृपशार्दूल द्विजार्थमिति नः श्रुतम् ।

सर्वतीर्थेषु स स्नाति मिश्रके स्नाति यो नरः ॥ ९२ ॥

राजेन्द्र! तत्पश्चात् परम उत्तम मिश्रकतीर्थमें जाय। महाराज! वहाँ महात्मा व्यासने

द्विजोंके लिये सभी तीर्थोंका सम्मिश्रण किया है; यह बात मेरे सुननेमें आयी है। जो मनुष्य

मिश्रकतीर्थमें स्नान करता है, उसका वह स्नान सभी तीर्थोंमें स्नान करनेके समान

है ॥ ९१-९२ ॥

ततो व्यासवनं गच्छेन्नियतो नियताशनः ।

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