भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 595

मनोजवे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९३ ॥ तत्पश्चात् नियमपूर्वक रहते हुए मिताहारी होकर व्यासवनकी यात्रा करे। वहाँ मनोजवतीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९३ ॥

गत्वा मधुवटीं चैव देव्यास्तीर्थे नरः शुचिः । तत्र स्नात्वार्चयित्वा च पितॄन् देवांश्च पूरुषः ॥ ९४ ॥ स देव्या समनुज्ञातो गोसहस्रफलं लभेत् । मधुवटीमें जाकर देवीतीर्थमें स्नान करके पवित्र हुआ मानव वहाँ देवता-पितरोंकी पूजा करके देवीकी आज्ञाके अनुसार सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९४ १/२ ॥

कौशिक्याः संगमे यस्तु दृषद्वत्याश्च भारत ॥ ९५ ॥ स्नाति वै नियताहारः सर्वपापैः प्रमुच्यते । भारत! कौशिकी और दृषद्वतीके संगममें जो स्नान करता है तथा नियमपालनपूर्वक संयमित भोजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है ॥ ९५ १/२ ॥

ततो व्यासस्थली नाम यत्र व्यासेन धीमता ॥ ९६ ॥ पुत्रशोकाभितप्तेन देहत्यागे कृता मतिः । ततो देवैस्तु राजेन्द्र पुनरुत्थापितस्तदा ॥ ९७ ॥ अभिगत्वा स्थलीं तस्य गोसहस्रफलं लभेत् । तत्पश्चात् व्यासस्थलीमें जाय, जहाँ परम बुद्धिमान् व्यासने पुत्रशोकसे संतप्त हो शरीर त्याग देनेका विचार किया था। राजेन्द्र! उस समय उन्हें देवताओंने पुनः उठाया था। उस स्थलमें जानेसे सहस्र गोदानका फल मिलता है ॥ ९६-९७ १/२ ॥

किंदत्तं कूपमासाद्य तिलप्रस्थं प्रदाय च ॥ ९८ ॥ गच्छेत परमां सिद्धिमृणैर्मुक्तः कुरुद्वह । वेदीतीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ॥ ९९ ॥ किंदत्त नामक कूपके समीप जाकर एक प्रस्थ अर्थात् सोलह मुट्ठी तिल दान करे। कुरुश्रेष्ठ! ऐसा करनेसे मनुष्य तीनों ऋणोंसे मुक्त हो परम सिद्धिको प्राप्त होता है। वेदीतीर्थमें स्नान करनेसे मनुष्य सहस्र गोदानका फल पाता है ॥ ९८-९९ ॥

अहश्च सुदिनं चैव द्वे तीर्थे लोकविश्रुते । तयोः स्नात्वा नरव्याघ्र सूर्यलोकमवाप्नुयात् ॥ १०० ॥ अहन् और सुदिन—ये दो लोकविख्यात तीर्थ हैं। नरश्रेष्ठ! उन दोनोंमें स्नान करके मनुष्य सूर्यलोकमें जाता है ॥ १०० ॥

मृगधूमं ततो गच्छेत् त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् । तत्राभिषेकं कुर्वीत गङ्गायां नृपसत्तम ॥ १०१ ॥ नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर तीनों लोकोंमें विख्यात मृगधूम-तीर्थमें जाय और वहाँ गंगाजीमें स्नान करे ॥ १०१ ॥