भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 599, कुल 2580 में से

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पृष्ठ 599

तद् दृष्ट्वा व्रीडितो राजन् स मुनिः पादयोर्गतः ।
नान्यद् देवात् परं मेने रुद्रात् परतरं महत् ॥ १२६ ॥

महाराज! यह अद्भुत बात देखकर मुनि लज्जित हो महादेवजीके चरणोंमें पड़ गये और उन्होंने दूसरे किसी देवताको महादेवजीसे बढ़कर नहीं माननेका निश्चय किया ॥ १२६ ॥

सुरासुरस्य जगतो गतिस्त्वमसि शूलधृक् ।
त्वया सर्वमिदं सृष्टं त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ १२७ ॥

वे बोले—‘भगवन्! देवता और असुरोंसहित सम्पूर्ण जगत्के आश्रय आप ही हैं। त्रिशूलधारी महेश्वर! आपने ही चराचर जीवोंसहित सम्पूर्ण त्रिलोकीको उत्पन्न किया है ॥ १२७ ॥

त्वमेव सर्वान् ग्रससि पुनरेव युगक्षये ।
देवैरपि न शक्यस्त्वं परिज्ञातुं कुतो मया ॥ १२८ ॥

‘फिर प्रलयकाल आनेपर आप ही सब जीवोंको अपना ग्रास बना लेते हैं। देवता भी आपके स्वरूपको नहीं जान सकते, फिर मेरी तो बात ही क्या? ॥ १२८ ॥

त्वयि सर्वे प्रदृश्यन्ते सुरा ब्रह्मादयोऽनघ ।
सर्वस्त्वमसि लोकानां कर्ता कारयिता च ह ॥ १२९ ॥

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