भारतकोश
महाभारत (खंड २) - वन पर्व

महाभारत (खंड २) - वन पर्व

Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva

महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा

DevanagariSanskritpublished2,580 पृष्ठ

पृष्ठ 598, कुल 2580 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 598

ब्रह्मादिभिः सुरै राजन्नृषिभिश्च तपोधनैः ।
विज्ञाप्तो वै महादेव ऋषेरर्थे नराधिप ॥ ११९ ॥
राजन्! नरेश्वर! उस समय ब्रह्मा आदि देवता तथा तपोधन महर्षिगण—सबने मंकणक मुनिके विषयमें महादेवजीसे निवेदन किया— ॥ ११९ ॥

नायं नृत्येद यथा देव तथा त्वं कर्तुमर्हसि ।
तं प्रनृत्तं समासाद्य हर्षाविष्टेन चेतसा ।
सुराणां हितकामार्थमृषिं देवोऽभ्यभाषत ॥ १२० ॥
‘देव! आप कोई ऐसा उपाय करें, जिससे इनका यह नृत्य बंद हो जाय।’ महादेवजी देवताओंके हितकी इच्छासे हर्षविशसे नाचते हुए मुनिके पास गये और इस प्रकार बोले— ॥ १२० ॥

भो भो महर्षे धर्मज्ञ किमर्थं नृत्यते भवान् ।
हर्षस्थानं किमर्थं वा तवाद्य मुनिपुङ्गव ॥ १२१ ॥
‘धर्मज्ञ महर्षे! मुनिप्रवर! आप किसलिये नृत्य कर रहे हैं? आज आपके इस हर्षातिरेकका क्या कारण है?’ ॥

ऋषिरुवाच

तपस्विनो धर्मपथे स्थितस्य द्विजसत्तम ।
किं न पश्यसि मे ब्रह्मन् कराच्छाकरसं स्रुतम् ॥ १२२ ॥
यं दृष्ट्वा सम्प्रनृत्तोऽहं हर्षेण महतान्वितः ।
ऋषिने कहा—द्विजश्रेष्ठ! ब्रह्मन्! मैं धर्मके मार्गपर स्थिर रहनेवाला तपस्वी हूँ। मेरे हाथसे यह शाकका रस चू रहा है। क्या आप इसे नहीं देखते? इसीको देखकर मैं महान् हर्षसे नाच रहा हूँ ॥ १२२½ ॥

तं प्रहस्याब्रवीद् देव ऋषिं रागेण मोहितम् ॥ १२३ ॥
महर्षि रागसे मोहित हो रहे थे। महादेवजीने उनकी बात सुनकर हँसते हुए कहीं— ॥ १२३ ॥

अहं तु विस्मयं विप्र न गच्छामीति पश्य माम् ।
एवमुक्त्वा नरश्रेष्ठ महादेवेन धीमता ॥ १२४ ॥
अङ्गुल्यग्रेण राजेन्द्र स्वाङ्गुष्ठस्ताडितोऽनघ ।
ततो भस्म क्षताद् राजन् निर्गतं हिमसंनिभम् ॥ १२५ ॥
‘विप्रवर! मुझे तो यह देखकर कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है। मेरी ओर देखिये।’
नरश्रेष्ठ! निष्पाप राजेन्द्र! ऐसा कहकर परम बुद्धिमान् महादेवजीने अंगुलीके अग्रभागसे अपने अँगूठेको ठोंका। राजन्! उनके चोट करनेपर उस अँगूठेसे बर्फके समान सफेद भस्म गिरने लगा ॥ १२४-१२५ ॥