महाभारत (खंड २) - वन पर्व
Mahabharata (Vol 2) - Vana Parva
महर्षि कृष्णद्वैपायन वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउन्होंने सरस्वतीकुंजका निर्माण किया था (वही नैमिषकुंज कहलाता है) ।। १०९-११० ।। ऋषीणामवकाशः स्याद् यथा तुष्टिकरो महान् । तस्मिन् कुञ्जे नरः स्नात्वा अग्निष्टोमफलं लभेत् ।। १११ ।। वह ऋषियोंका स्थान है, जो उनके लिये महान् संतोषजनक है। उस कुंजमें स्नान करके मनुष्य अग्निष्टोमयज्ञका फल पाता है ।। १११ ।। ततो गच्छेत धर्मज्ञ कन्यातीर्थमनुत्तमम् । कन्यातीर्थे नरः स्नात्वा गोसहस्रफलं लभेत् ।। ११२ ।। धर्मज्ञ! तदनन्तर परम उत्तम कन्यातीर्थकी यात्रा करे। कन्यातीर्थमें स्नान करनेसे मानव सहस्र गोदानका फल पाता है ।। ११२ ।। ततो गच्छेत राजेन्द्र ब्रह्मणस्तीर्थमुत्तमम् । तत्र वर्णावरः स्नात्वा ब्राह्मण्यं लभते नरः ।। ११३ ।। ब्राह्मणश्च विशुद्धात्मा गच्छेत परमां गतिम् । राजेन्द्र! तदनन्तर परम उत्तम ब्रह्मतीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करनेसे ब्राह्मणेतर वर्णका मनुष्य भी ब्राह्मणत्व लाभ करता है। ब्राह्मण होनेपर शुद्धचित्त हो वह परम गतिको प्राप्त कर लेता है ।। ११३ १/२ ।। ततो गच्छेनरश्रेष्ठ सोमतीर्थमनुत्तमम् ।। ११४ ।। तत्र स्नात्वा नरो राजन् सोमलोकमवाप्नुयात् । नरश्रेष्ठ! तत्पश्चात् उत्तम सोमतीर्थकी यात्रा करे। राजन्! वहाँ स्नान करनेसे मानव सोमलोकको जाता है ।। ११४ १/२ ।। सप्तसारस्वतं तीर्थं ततो गच्छेन्नराधिप ।। ११५ ।। यत्र मङ्कणकः सिद्धो महर्षिर्लोकविश्रुतः । पुरा मङ्कणको राजन् कुशाग्रेणेति नः श्रुतम् ।। ११६ ।। क्षतः किल करे राजंस्तस्य शाकरसोऽस्रवत् । स वै शाकरसं दृष्ट्वा हर्षाविष्टःप्रनृत्तवान् ।। ११७ ।। नरेश्वर! इसके बाद सप्तसारस्वत नामक तीर्थकी यात्रा करे, जहाँ लोकविख्यात महर्षि मंकणकको सिद्धि प्राप्त हुई थी। राजन्! हमारे सुननेमें आया है कि पहले कभी महर्षि मंकणकके हाथमें कुशका अग्रभाग गड़ गया, जिससे उनके हाथमें घाव हो गया। महाराज! उस समय उस हाथसे शाकका रस चूने लगा। शाकका रस चूता देख महर्षि हर्षवेशसे मतवाले हो नृत्य करने लगे ।। ११५—११७ ।। ततस्तस्मिन् प्रनृत्ते तु स्थावरं जंगमं च यत् । प्रनृत्तमुभयं वीर तेजसा तस्य मोहितम् ।। ११८ ।। वीर! उनके नृत्य करते समय उनके तेजसे मोहित हो सारा चराचर जगत् नृत्य करने लगा ।। ११८ ।।